उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपने ही बड़े भाई के परिवार पर तेजाब से हमला करने वाले एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। इस बर्बर हमले में परिवार की एक महिला सदस्य की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रवींद्र मैथानी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की बेंच ने आरोपी रघुनाथ सिंह की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने निचली अदालत के जुलाई 2022 के फैसले को चुनौती दी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि आरोपी ने बेहद क्रूर और अमानवीय तरीके से इस वारदात को अंजाम दिया और उसने मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा।
साल 2018 की आपसी रंजिश और हमला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 10 सितंबर 2018 की शाम करीब 6 बजे की है। आरोपी रघुनाथ सिंह का अपने बड़े भाई शेर सिंह के साथ व्यक्तिगत रंजिश को लेकर विवाद चल रहा था। घटना वाले दिन शराब के नशे में दोनों भाइयों के बीच जमकर गाली-गलौज हुई। इसके बाद रघुनाथ सिंह अपने घर के भीतर गया और तेजाब से भरा एक जरीकेन व मग उठा लाया। उसने अपने भाई शेर सिंह और वहां मौजूद परिवार के अन्य सदस्यों पर तेजाब उड़ेल दिया।
इस रासायनिक हमले में पूरा परिवार गंभीर रूप से झुलस गया। घायलों में से एक महिला, जया देवी की हालत बेहद नाजुक थी। उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां करीब दो महीने तक चले इलाज के बाद नवंबर 2018 में उन्होंने दम तोड़ दिया। वारदात के अगले दिन पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई गई थी, जिसके बाद रघुनाथ सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई 2022 में निचली अदालत ने उसे हत्या और तेजाब हमले का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
बचाव और सरकारी पक्ष की दलीलें
हाईकोर्ट में अपील के दौरान आरोपी की तरफ से पेश एमिकस क्यूरी (अदालत के मददगार) वकील मोहम्मद मतलूब ने दलील दी कि पुलिस की जांच में कई खामियां थीं और जांच अधिकारी ने जरूरी तथ्यों को छुपाया। उन्होंने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी को आई चोटों का कारण स्पष्ट करने में विफल रहा। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि पीड़िता की मौत हमले के करीब दो महीने बाद दिल्ली में इलाज के दौरान हुई थी, इसलिए आरोपी पर हत्या का मामला नहीं बनता।
वहीं, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए डिप्टी एडवोकेट जनरल मनीषा राणा सिंह ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और चश्मदीदों के बयान आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इस घटना में खुद घायल हुए लोगों के बयान अदालत में बेहद विश्वसनीय और निर्णायक माने जाते हैं।
हाईकोर्ट ने खारिज की आरोपी की दलीलें
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियों या पुलिस जांच में रह गई छोटी-मोटी कमियों से अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर नहीं पड़ जाता।
एफआईआर दर्ज करने में हुई एक दिन की देरी को लेकर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना के तुरंत बाद पूरा परिवार अस्पताल में भर्ती था और उनका पूरा ध्यान इलाज पर था। ऐसे में एफआईआर में देरी का इस मामले पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। अदालत ने माना कि रघुनाथ सिंह का कृत्य स्पष्ट रूप से जानलेवा चोट पहुंचाने के इरादे को दर्शाता है। कोर्ट ने निचली अदालत के जुलाई 2022 के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए आरोपी की अपील को खारिज कर दिया।

