विदेश मंत्रालय का दिल्ली में होना मात्र पासपोर्ट विवादों पर क्षेत्राधिकार का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने पासपोर्ट में जन्मतिथि सुधारने और ‘इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड’ (ईसीआर) स्टेटस हटाने की मांग करने वाली एक रिट याचिका को प्रादेशिक क्षेत्राधिकार की कमी के आधार पर खारिज कर दिया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह निर्णय दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता का जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट उत्तर प्रदेश में स्थित अधिकारियों द्वारा जारी, संशोधित और संचालित किए गए थे, इसलिए केवल दिल्ली में विदेश मंत्रालय (एमईए) का मुख्यालय होने से दिल्ली हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं मिल जाता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चिंतन अग्रवाल का जन्म 9 नवंबर 2003 को आगरा के जी.जी. मेडिकल इंस्टीट्यूट सेंटर में हुआ था। आगरा नगर निगम के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रार द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र (पंजीकरण संख्या 56) में उनकी जन्मतिथि गलती से 9 सितंबर 2003 दर्ज हो गई थी। इस भूल को 28 अक्टूबर 2006 को जन्म रिकॉर्ड में सुधारकर सही जन्मतिथि 9 नवंबर 2003 दर्ज की गई।

साल 2011 में जब याचिकाकर्ता के माता-पिता ने उसके पहले पासपोर्ट के लिए आवेदन किया, तो उन्होंने भूलवश गलत जन्मतिथि वाला पुराना जन्म प्रमाण पत्र जमा कर दिया। इसके कारण गलत जन्मतिथि के साथ ही पासपोर्ट जारी कर दिया गया। इसके बाद साल 2016 और 2021 में क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, गाजियाबाद द्वारा बिना किसी सुधार के इस पासपोर्ट का नवीनीकरण भी कर दिया गया।

वयस्क होने के बाद, चिंतन अग्रवाल ने अपनी सही जन्मतिथि दर्ज कराने के लिए संशोधित जन्म प्रमाण पत्र के साथ पासपोर्ट नवीनीकरण का आवेदन किया। हालांकि, क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, गाजियाबाद ने इस सुधार को करने से इनकार कर दिया और पुनः गलत जन्मतिथि वाला नया पासपोर्ट (नंबर C1486940) जारी कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 24 जुलाई 2025 को कानूनी नोटिस भेजा, जिसे पासपोर्ट अधिकारियों ने 4 अगस्त 2025 के जवाब के जरिए खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

पक्षों की दलीलें

सुनवाई की शुरुआत में ही प्रतिवादियों के वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार को लेकर प्रारंभिक आपत्ति उठाई।

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याचिकाकर्ता के वकील मनु पडालिया ने तर्क किया कि सुधार के अनुरोध को खारिज करने वाला नोटिस रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों (जैसे संशोधित जन्म प्रमाण पत्र, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, कक्षा 10वीं की अंकतालिका और पैन कार्ड) पर विचार किए बिना जारी किया गया था। उन्होंने दलील दी कि चूंकि विदेश मंत्रालय का मुख्य कार्यालय दिल्ली में स्थित है और गाजियाबाद का क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय इसी मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के पास इस याचिका पर सुनवाई करने का पूरा क्षेत्राधिकार है।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील विजय जोशी (सीजीएससी) और विनय कौशिक (जीपी) ने दलील दी कि याचिकाकर्ता की शिकायत और वाद का कारण पूरी तरह से उत्तर प्रदेश में उत्पन्न हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश का निवासी है और उसके सभी प्राथमिक दस्तावेज उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा ही जारी किए गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि दिल्ली में विदेश मंत्रालय के मुख्यालय की मौजूदगी मात्र से दिल्ली हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं बन जाता, क्योंकि मुख्य विवाद उत्तर प्रदेश के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के दायरे का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि जन्म प्रमाण पत्र जारी और संशोधित करने वाले स्थानीय प्राधिकरण और सुधार के अनुरोध को खारिज करने वाला क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, दोनों ही उत्तर प्रदेश में स्थित हैं।

क्षेत्राधिकार तय करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘कुसुम इंगोट्स एंड अलॉयज लिमिटेड बनाम भारत संघ (2004)’ का सहारा लिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केंद्र सरकार या किसी प्राधिकरण के मुख्यालय का केवल किसी स्थान पर स्थित होना ही स्वतः रूप से किसी हाईकोर्ट को प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं करता। क्षेत्राधिकार इस बात से तय होता है कि क्या वाद के कारण (कॉज ऑफ एक्शन) का कोई भी हिस्सा उस हाईकोर्ट की क्षेत्रीय सीमा के भीतर उत्पन्न हुआ है या नहीं।

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कोर्ट ने ‘फोरम कनविनियंस’ (सुविधाजनक मंच) के सिद्धांत पर भी चर्चा की, जिसे ‘कुसुम इंगोट्स’ मामले में स्थापित किया गया था और ‘गोवा राज्य बनाम समिट ऑनलाइन ट्रेड सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (2023)’ मामले में दोहराया गया था। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि वाद के कारण का एक छोटा हिस्सा भी कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है, तब भी कोर्ट सुनवाई से इनकार कर सकता है यदि कोई दूसरा मंच विवाद के निपटारे के लिए अधिक उपयुक्त और सुविधाजनक हो।

इसके अलावा, कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की ही खंडपीठ द्वारा ‘गौतम मंडल बनाम भारत संघ (2026)’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था: “उपरोक्त मिसालों के संचयी अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि वादी (डोमिनस लिटिस) होने के नाते याचिकाकर्ता अपनी पसंद के क्षेत्राधिकार का रुख करने का हकदार है, जहां वाद का कारण दो या अधिक क्षेत्राधिकारों में उत्पन्न होता है। हालांकि, यह कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है कि वह ऐसे क्षेत्राधिकार का उपयोग करे या नहीं, और कोर्ट को यह ध्यान में रखना चाहिए कि क्या यह विवाद के निपटारे के लिए एक उपयुक्त और सुविधाजनक मंच है या नहीं।”

अंत में, कोर्ट ने ‘सुरेश कुमार बनाम भारत संघ’ के मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने त्रिवेंद्रम (केरल) के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय से जुड़े विवाद पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था और माना था कि इस मामले से निपटने के लिए केरल हाईकोर्ट अधिक उपयुक्त मंच है क्योंकि याचिकाकर्ता केरल का निवासी था।

कोर्ट का निर्णय

इन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि इस मामले के सभी महत्वपूर्ण तथ्य उत्तर प्रदेश से जुड़े हुए हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की: “उपरोक्त सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में, केवल यह तथ्य कि विदेश मंत्रालय का कार्यालय दिल्ली में स्थित है, स्वतः ही इस कोर्ट को इस याचिका पर सुनवाई करने का प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकता।”

प्रतिवादियों द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना: “तदनुसार, इस कोर्ट का यह मानना है कि वाद के कारण का कोई भी हिस्सा इसके प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर उत्पन्न नहीं हुआ है।”

परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इलाहाबाद हाईकोर्ट सहित उपयुक्त कानूनी मंच का रुख करने की स्वतंत्रता दी।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: चिंतन अग्रवाल बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यू.पी.(सी) 8743/2026
पीठ: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा
निर्णय की तिथि: 09.07.2026

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