केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने 12 वर्षीय बच्चे की करंट लगने से हुई दर्दनाक मौत के मामले में राज्य बिजली बोर्ड को जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने केरल राज्य विद्युत बोर्ड (KSEB) और दो अन्य संबंधित पक्षों को निर्देश दिया है कि वे मृतक बच्चे की मां को कुल 10.35 लाख रुपये के मुआवजे का भुगतान करें।
आयोग के अध्यक्ष कृष्णन के और सदस्य बीना के.जी. की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केएसईबी उपभोक्ताओं को सुरक्षित तरीके से बिजली प्रदान करने में विफल रहा, जिसके कारण शॉर्ट सर्किट हुआ और बच्चे की असमय मौत हो गई। इस लापरवाही के लिए बोर्ड सीधे तौर पर उत्तरदायी है।
कुल मुआवजे के तहत आयोग ने 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, शिकायतकर्ता मां को हुई मानसिक प्रताड़ना के एवज में 25,000 रुपये और उनके कानूनी खर्च की भरपाई के लिए 10,000 रुपये अतिरिक्त देने का निर्देश दिया गया है।
हादसे की जांच में लापरवाही की पुष्टि
यह दुखद घटना 26 दिसंबर 2020 को हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हुआ था कि बच्चे की मौत बिजली का तेज झटका लगने से हुई थी। इसके बाद कासरगोड के विद्युत निरीक्षक द्वारा की गई आधिकारिक जांच में भी यह बात सामने आई कि दुर्घटना का मुख्य कारण करंट का रिसाव (लीकेज) होना था।
मृतक की मां ने आयोग में दायर अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि बिजली के बुनियादी ढांचे का खराब रखरखाव, सिस्टम की तकनीकी कमियां और अर्थ वायर से हो रहा करंट का रिसाव ही उनके बेटे की मौत की वजह बना। उन्होंने सेवा में इस गंभीर कमी और लापरवाही के खिलाफ उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया था।
बिजली बोर्ड की दलीलें और कोर्ट का रुख
केएसईबी ने आयोग के समक्ष इन आरोपों का पुरजोर विरोध किया था। सरकारी बिजली कंपनी ने सबसे पहले आयोग के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठाए। बोर्ड का तर्क था कि इतने बड़े मुआवजे के दावों का निपटारा केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है, उपभोक्ता फोरम को इसकी सुनवाई का अधिकार नहीं है। इसके अलावा बोर्ड ने यह भी दलील दी कि हादसा बच्चे की खुद की लापरवाही और उस संपत्ति के मालिक की अनदेखी के कारण हुआ था जहां यह घटना घटी।
हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने बिजली बोर्ड के इन सभी तर्कों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि बिजली आपूर्ति करने वाली संस्थाओं की ओर से सेवा में कमी से जुड़े मामलों की सुनवाई करना पूरी तरह से उपभोक्ता अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अधिकार क्षेत्र पर आयोग का स्पष्टीकरण
आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून उपभोक्ताओं को एक अतिरिक्त कानूनी विकल्प प्रदान करता है, जो सिविल कोर्ट जाने के अधिकार को सीमित या समाप्त नहीं करता। आयोग ने साफ किया कि अगर बिजली अधिनियम 2003 और उपभोक्ता संरक्षण कानून के बीच किसी भी तरह का विरोधाभास या टकराव होता है, तो उपभोक्ता हितों की रक्षा करने वाले उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
आयोग ने आगे कहा कि केवल इस आधार पर उपभोक्ता फोरम के अधिकार क्षेत्र को खारिज नहीं किया जा सकता कि मांगे गए हर्जाने की राशि बहुत बड़ी है या मामले में विस्तृत साक्ष्यों की आवश्यकता है।
अपने फैसले के अंत में आयोग ने उल्लेख किया कि यह घातक दुर्घटना केएसईबी की अपनी ‘विद्युत सुरक्षा योजना’ (Vidyuth Suraksha Scheme) के ‘कैटेगरी ए’ के दायरे में आती है। इसके तहत मृतक के कानूनी वारिस 10 लाख रुपये की पूरी अनुग्रह राशि प्राप्त करने के हकदार हैं।

