कर्नाटक हाईकोर्ट ने आयकर कानून के उस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसके तहत समलैंगिक जोड़ों को टैक्स-फ्री गिफ्ट (कर-मुक्त उपहार) की छूट नहीं मिलती है। बेंगलुरु के एक समलैंगिक जोड़े ने इस टैक्स नियम को भेदभावपूर्ण बताते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
यह याचिका बेंगलुरु के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुराग कालिया और अखिलेश गोदी ने दायर की है। दोनों आईआईटी के पूर्व छात्र हैं और पिछले सात सालों से अधिक समय से साथ रह रहे हैं। याचिका में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 56(2)(x) के पांचवें प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। मौजूदा नियमों के अनुसार, पति-पत्नी के बीच दिए जाने वाले तोहफों पर टैक्स नहीं लगता, लेकिन कानूनी तौर पर ‘पति-पत्नी’ (स्पाउस) शब्द के दायरे में समलैंगिक जोड़े नहीं आते हैं।
विवाद की वजह
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब अखिलेश गोदी ने अपने रिश्ते की सालगिरह पर अनुराग कालिया को 14.41 ग्राम का 22-कैरेट सोने का ब्रेसलेट तोहफे में दिया। यह ब्रेसलेट अखिलेश को उनके पिता से पारिवारिक विरासत के रूप में मिला था, जिसकी अनुमानित कीमत 1,15,500 रुपये थी।
टैक्स का नियम और देनदारी
आयकर कानून की धारा 56(2)(x) के तहत, बिना किसी वित्तीय लेनदेन के मिली 50,000 रुपये से अधिक की संपत्ति को ‘अन्य स्रोतों से आय’ मानकर उस पर टैक्स लगाया जाता है। हालांकि, रिश्तेदारों से मिलने वाले तोहफों को इससे छूट दी गई है, और रिश्तेदारों की इस परिभाषा में ‘पति-पत्नी’ शामिल हैं। अनुराग कालिया को सलाह दी गई थी कि वे कर निर्धारण वर्ष 2025-26 के टैक्स रिटर्न में इस ब्रेसलेट के बाजार मूल्य को अपनी आय के रूप में घोषित करें। इसके चलते उन पर 25 प्रतिशत टैक्स के साथ 15 प्रतिशत सरचार्ज और 4 प्रतिशत सेस की देनदारी बन गई।
संवैधानिक अधिकार और शादी पर स्टैंड
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वे साल 2019 से बेंगलुरु में अपने साझा घर में रह रहे हैं। उन्हें केवल उनके लिंग (सेक्स) के आधार पर इस टैक्स छूट से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने दलील दी कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है, जो लिंग और यौन रुझान (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) के आधार पर भेदभाव को रोकते हैं। साथ ही, प्यार के इजहार पर टैक्स लगाना अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 का उल्लंघन है।
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि वे समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने, शादी की धारणा बनाने या अपनी वैवाहिक स्थिति की किसी आधिकारिक घोषणा की मांग नहीं कर रहे हैं।
उनका कहना है कि लंबे समय से साथ रह रहे विपरीत लिंगी (हेटरोसेक्सुअल) जोड़ों को अदालती मिसालों के तहत विवाहित मान लिया जाता है, जिससे उन्हें टैक्स छूट मिल जाती है। याचिका में प्रिवी काउंसिल के 1927 के एक फैसले (ए दीनोहामी बनाम बालहामी) और सुप्रीम कोर्ट के 2023 के एक फैसले (श्रीमती शिरामाबाई बनाम ओआईसी रिकॉर्ड्स) का हवाला दिया गया, जो लंबे समय तक साथ रहने वाले महिला-पुरुष जोड़ों के अधिकारों का संरक्षण करते हैं। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 15 के तहत ‘लिंग’ शब्द में यौन रुझान भी शामिल है।
अदालत की टिप्पणी और कानूनी सवाल
कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस बी एम श्याम प्रसाद ने सुनवाई के दौरान मामले को एक मुख्य कानूनी सवाल पर केंद्रित कर दिया। उन्होंने पूछा कि जब विधायिका (संसद) ने कानून में ‘स्पाउस’ (पति-पत्नी) शब्द को परिभाषित नहीं किया है, तो क्या अदालतें न्यायिक व्याख्या के जरिए इसका दायरा बढ़ा सकती हैं?
जस्टिस प्रसाद ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत केवल इसी कानूनी पहलू पर सुनवाई करना चाहती है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भेदभाव को रोकने के लिए इस परिभाषा का दायरा बढ़ाया जाता है, तो क्या इससे अन्य रिश्तों, जैसे कि पालक बच्चों (फॉस्टर चिल्ड्रन) के लिए भी रास्ता नहीं खुल जाएगा?
बॉम्बे हाईकोर्ट में भी लंबित है ऐसा ही मामला
आयकर विभाग के इसी नियम को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में भी लंबित है। वह याचिका पायियो अशीहो और उनके पार्टनर विवेक दीवान ने दायर की है।

