मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर के एक निलंबित सिविल जज की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही विभागीय जांच (अनुशासनिक कार्रवाई) को रोकने की मांग की थी। आरोपी जज पर आरोप है कि उन्होंने मुकदमा पूरा हुए बिना ही एक आरोपी को बरी करने का फैसला पहले से लिखकर तैयार कर लिया था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास सबसे ऊपर है और ऐसे गंभीर आरोपों की जांच को टाला नहीं जा सकता।
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी पी शर्मा की डिवीजन बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर इस याचिका पर फैसला सुनाया। बेंच ने रेखांकित किया कि न्यायपालिका के प्रति आम लोगों का भरोसा हमारे संवैधानिक ढांचे के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है। जज के आचरण की शुचिता और ईमानदारी को सुनिश्चित करना अनुशासनिक संस्था की जिम्मेदारी है, जिसे लंबित आपराधिक मामलों के नाम पर अनिश्चितकाल के लिए रोका नहीं जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला साल 2019 के एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा है। उस समय याचिकाकर्ता इंदौर में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात थे। आरोप है कि उन्होंने 6 अक्टूबर 2020 को एक आपराधिक मामले में कानूनन सुनवाई पूरी होने से पहले ही बरी करने का आदेश (अक्विटल जजमेंट) तैयार कर लिया था। हाईकोर्ट की प्रशासनिक जांच के अनुसार, यह कदम एक साजिश का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य एक आईएएस अधिकारी को अनुचित लाभ पहुंचाना था। दरअसल, लंबित आपराधिक मामले की वजह से उस आईएएस अधिकारी की पदोन्नति (आईएएस अवॉर्ड) रुकी हुई थी।
सतर्कता विभाग (विजिलेंस) की जांच और सबूतों की समीक्षा के बाद अनुशासनिक विभाग ने जज को निलंबित कर दिया था। इसके बाद 19 दिसंबर 2025 को उनके खिलाफ चार्जशीट जारी कर औपचारिक विभागीय जांच शुरू की गई थी, जिसे जज ने अदालत में चुनौती दी थी।
देरी और अस्पष्ट आरोपों के तर्क खारिज
निलंबित जज ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि करीब पांच साल की लंबी देरी के बाद चार्जशीट जारी की गई है, जिससे उन्हें अपना बचाव करने में दिक्कत आ रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को नामंजूर करते हुए कहा कि मुकदमा पूरा होने से पहले ही बरी करने का फैसला लिखने जैसे गंभीर मामलों में कोई भी कदम उठाने से पहले सतर्कता विभाग को बेहद बारीकी और गहराई से जांच करनी पड़ती है। बेंच ने यह भी जोड़ा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे कि इस समयसीमा के बीतने से उनके बचाव पर क्या वास्तविक प्रतिकूल असर पड़ा है।
अदालत ने आगे कहा कि चार्जशीट में आरोपों की पूरी जानकारी दी गई है, जिसमें गवाहों के बयान और दस्तावेजी सबूत भी शामिल हैं। इसलिए आरोपों को अस्पष्ट नहीं कहा जा सकता। ये आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला विभागीय जांच के दौरान ही होगा।
विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा दोनों अलग
याचिकाकर्ता की एक मुख्य दलील यह भी थी कि जब तक इसी मामले से जुड़े आपराधिक मुकदमे का फैसला नहीं आ जाता, तब तक विभागीय जांच पर रोक लगा दी जानी चाहिए।
अदालत ने इस तर्क को भी पूरी तरह खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने दोहराया कि प्रशासनिक अनुशासनिक कार्रवाई और आपराधिक मुकदमा दोनों पूरी तरह से अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और दोनों के उद्देश्य भी अलग होते हैं। अदालत ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी के आचरण और ईमानदारी से जुड़ी जांच को आपराधिक मामले के नतीजे के लिए अनिश्चितकाल तक नहीं लटकाया जा सकता, क्योंकि अदालती मुकदमों के निपटारे में कितना समय लगेगा, यह पहले से तय नहीं किया जा सकता।

