जज पर आरोप लगाने का मामला: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिना शर्त माफी के बाद वकीलों और याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना केस बंद किया

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के जज के खिलाफ आरोप लगाने के मामले में तीन वकीलों और एक याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। कोर्ट ने इन सभी की बिना शर्त माफी को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। हालांकि, कोर्ट ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि जजों पर बिना सोचे-समझे या लापरवाही से आरोप नहीं लगाए जा सकते।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत में दाखिल किए जाने वाले किसी भी कानूनी दस्तावेज (प्लीडिंग्स) को बेहद सावधानी, संयम और जिम्मेदारी के साथ तैयार किया जाना चाहिए। पीठ ने 2 जुलाई को जारी अपने फैसले में कहा कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के आचरण, निष्पक्षता या काम करने के तरीके पर आरोप लगाने के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए ऐसे कदम बेहद हल्के में नहीं उठाए जाने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बार के सदस्यों और याचिकाकर्ताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे न्यायिक कार्यवाही की गरिमा को बनाए रखेंगे और अदालत के खिलाफ किसी भी तरह के आपत्तिजनक या बेबुनियाद आरोपों से बचेंगे।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद की शुरुआत

यह पूरा विवाद महासमुंद जिले के बागबाहरा में सीनियर सिविल जज की अदालत में साल 2023 में दायर एक सिविल मुकदमे से शुरू हुआ था। इस मामले की सुनवाई के दौरान, मुख्य प्रतिवादी अनिल सिंह ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 24 के तहत मुकदमा दूसरी जगह ट्रांसफर करने के लिए एक आवेदन दायर किया। इस आवेदन में संबंधित पीठासीन अधिकारी (जज) के खिलाफ कई आपत्तिजनक टिप्पणियां और आरोप दर्ज थे।

ट्रायल कोर्ट के जज ने इन आरोपों को अदालती अवमानना की श्रेणी में माना और मामले को आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पास रेफरेंस के रूप में भेज दिया। हाईकोर्ट ने 9 अप्रैल को इस रेफरेंस पर संज्ञान लेते हुए अनिल सिंह और उनके वकीलों—फिरोज खान, शमशाद खान और यासमीन खान को नोटिस जारी किया। इन सभी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर अपनी सफाई देने का निर्देश दिया गया था।

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कोर्ट में बिना शर्त माफी और भविष्य के लिए चेतावनी

इसके बाद, 6 मई को चारों प्रतिवादी कोर्ट में पेश हुए और उन्होंने अपनी गलती पर गहरा खेद व्यक्त करते हुए बिना शर्त माफी मांगी। उस समय हाईकोर्ट ने तुरंत कोई दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें संबंधित ट्रायल कोर्ट के जज के सामने जाकर व्यक्तिगत रूप से बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने उनके भविष्य के व्यवहार पर भी नजर रखने का फैसला किया।

मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान वकीलों की ओर से पेश हुए काउंसिल ने कहा कि उनके मुवक्किल न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते हैं। उन्होंने दलील दी कि याचिका में लिखे गए आपत्तिजनक शब्द अनजाने में लिखे गए थे और उनका इरादा कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं था। वहीं याचिकाकर्ता अनिल सिंह ने भी अपना अलग जवाब दाखिल कर अदालत से माफी मांगी। सिंह का कहना था कि याचिका में लिखी बातों के जरिए उनका उद्देश्य जज की ईमानदारी पर संदेह करना या अदालत को अपमानित करना नहीं था, इसलिए इसे मानवीय भूल मानकर माफ कर दिया जाए।

कार्रवाई बंद करने के साथ सख्त हिदायत

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हाईकोर्ट ने पाया कि चारों प्रतिवादियों ने उसके पिछले आदेश का पालन करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों जगहों पर बिना शर्त लिखित माफी मांग ली है। इसके बाद कोर्ट ने इस मामले की कार्यवाही को बंद करने का आदेश दिया।

मामले को बंद करते हुए हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में सचेत किया कि इस फैसले को उनके इस तरह के व्यवहार की मंजूरी के रूप में न देखा जाए। पीठ ने उम्मीद जताई कि ये लोग भविष्य में अदालती कामकाज के दौरान पूरी सावधानी बरतेंगे। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि दोबारा इस तरह की कोई हरकत सामने आती है, तो संबंधित अदालत उनके खिलाफ कानून के अनुसार नई अवमानना कार्रवाई शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगी।

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हाईकोर्ट ने इस फैसले की प्रतियां महासमुंद के मुख्य जिला एवं सत्र न्यायाधीश और संबंधित ट्रायल कोर्ट के जज को आवश्यक जानकारी के लिए भेजने का निर्देश दिया है।

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