बॉम्बे हाईकोर्ट ने MHADA की बांद्रा रिक्लेमेशन और वर्ली पुनर्विकास योजना को दी मंजूरी, याचिकाएं खारिज

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र सरकार की उस क्लस्टर पुनर्विकास नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसके तहत मुंबई के बांद्रा रिक्लेमेशन और वर्ली स्थित आदर्श नगर के दो बड़े MHADA लेआउट का एकीकृत पुनर्विकास किया जाना है। इस फैसले के साथ दोनों परियोजनाओं के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।

जस्टिस मकरंद एस. कर्णिक और जस्टिस श्रीराम एम. मोडक की खंडपीठ ने सहकारी आवास समितियों की ओर से दायर याचिकाओं में कोई दम नहीं पाया और उन्हें खारिज कर दिया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए समय मांगे जाने पर राज्य सरकार की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया कि अगले चार सप्ताह तक परियोजना का वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया जाएगा।

इन दोनों परियोजनाओं के लिए अडानी प्रॉपर्टीज सबसे ऊंची बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में सामने आई है। पुनर्विकास के तहत बांद्रा रिक्लेमेशन की लगभग 98.27 एकड़ और वर्ली के आदर्श नगर की 34.33 एकड़ भूमि शामिल है।

क्लस्टर पुनर्विकास के लिए बनाई गई नीति

मामला महाराष्ट्र सरकार द्वारा 25 अप्रैल और 15 दिसंबर 2025 को जारी किए गए सरकारी प्रस्तावों (GRs) से जुड़ा था। इन प्रस्तावों के माध्यम से ग्रेटर मुंबई और उपनगरों में 20 एकड़ या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले MHADA लेआउट के एकीकृत या क्लस्टर पुनर्विकास की नीति लागू की गई।

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इस नीति के अनुसार, पूरे लेआउट का पुनर्विकास अलग-अलग हाउसिंग सोसायटियों के बजाय एक ही निजी निर्माण एवं विकास एजेंसी के माध्यम से किया जाएगा।

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि MHADA ने वर्ष 1950 से 1960 के बीच मध्यम आय वर्ग (MIG) और निम्न आय वर्ग (LIG) के लिए 56 आवासीय कॉलोनियां विकसित की थीं। समय के साथ इन कॉलोनियों में लगभग 5,000 हाउसिंग सोसायटियां बन गई हैं, जिनमें कई इमारतें अब जर्जर हो चुकी हैं और उनके पुनर्विकास की आवश्यकता है।

याचिकाकर्ताओं ने संपत्ति के अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया

याचिकाकर्ता सोसायटियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ाल अंध्यारुजिना सहित अन्य वकीलों ने दलील दी कि ये सरकारी प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 300A का पूर्ण उल्लंघन हैं, जो नागरिकों को कानून की उचित प्रक्रिया के बिना उनकी संपत्ति से वंचित किए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है।

उनका कहना था कि सोसायटियों को जबरन क्लस्टर पुनर्विकास का हिस्सा बनाया जा रहा है, जिससे विकास नियंत्रण एवं संवर्धन विनियम (DCPR) के तहत स्वतंत्र रूप से पुनर्विकास कराने का उनका अधिकार समाप्त हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि निविदा की शर्तें सरकारी प्रस्तावों की सीमा से आगे जाकर तैयार की गई हैं, जिससे याचिकाकर्ताओं के अधिकार प्रभावित होंगे।

याचिकाओं में यह भी कहा गया कि आदर्श नगर की समुद्र किनारे स्थित इमारतों में रहने वाले निवासियों का पुनर्वास क्लस्टर योजना के तहत किसी अन्य स्थान पर किया जा सकता है, जिससे वे अपनी मौजूदा स्थिति और क्षेत्रफल से वंचित हो सकते हैं।

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याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी प्रस्ताव कई सोसायटियों के विलय को बिना वैधानिक प्रक्रिया के अनिवार्य बनाते हैं, विलय के बाद सोसायटियों के मौजूदा अधिकारों, क्षेत्रफल और निधियों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं करते, व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों की सहमति की आवश्यकता समाप्त कर देते हैं तथा MHADA और चयनित डेवलपर को अत्यधिक अधिकार प्रदान करते हैं। उनका यह भी कहना था कि इस क्लस्टर पुनर्विकास में सार्वजनिक हित का कोई वास्तविक तत्व नहीं है।

राज्य सरकार और MHADA ने नीति का बचाव किया

महाराष्ट्र सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने अदालत को बताया कि पुनर्विकास पूरी तरह विकास नियंत्रण एवं संवर्धन विनियम और लागू कानूनों के अनुसार किया जाएगा।

MHADA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि कदम ने दलील दी कि इस परियोजना से प्रभावित लगभग 5,000 हाउसिंग सोसायटियों में से केवल कुछ ही अदालत पहुंची हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी प्रस्तावों और निविदा प्रक्रिया को रद्द किया जाता है तो इससे पुनर्विकास की प्रतीक्षा कर रही बड़ी संख्या में अन्य सोसायटियों और निवासियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

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मई में अंतरिम राहत देने से किया था इनकार

इससे पहले मई में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निविदा प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि 50 से 60 वर्ष पुरानी इमारतों का पुनर्विकास निवासियों के जीवन स्तर में सुधार के लिए आवश्यक है।

उस समय अदालत ने कहा था कि यदि निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो इससे याचिकाकर्ताओं को कोई नुकसान नहीं होगा। साथ ही, प्रस्तावित पुनर्विकास के व्यापक स्वरूप को देखते हुए मामले की अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया गया था। गुरुवार के फैसले के साथ हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि राज्य सरकार ने चार सप्ताह तक वर्क ऑर्डर जारी नहीं करने का आश्वासन दिया।

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