47 साल पुराना रिश्वत मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व लेखपाल की एक साल की जेल की सजा बरकरार रखी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चकबंदी विभाग के एक पूर्व लेखपाल की साल 1985 की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। यह कानूनी मामला साल 1977 में केवल 300 रुपये की रिश्वत लेने से जुड़ा है, जो लगभग पांच दशक पुराना है। जस्टिस संजीव कुमार ने पूर्व लेखपाल महेश चंद की अपील को खारिज करते हुए उन्हें चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ किया है कि यदि वे तय समय सीमा में सरेंडर नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

यह मामला साल 1977 का है, जब महेश चंद और एक राजस्व अधिकारी (कानूनगो) चंद्र सेन पर आरोप लगा था कि उन्होंने वीरेंद्र सिंह नाम के एक स्थानीय निवासी से 400 रुपये की रिश्वत मांगी थी। यह रिश्वत इसलिए मांगी गई थी ताकि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान वीरेंद्र सिंह के भूमि आवंटन (चक संख्या 193) में कोई बदलाव न किया जाए।

वीरेंद्र सिंह के बेटे जय विजय सिंह ने रिश्वत देने के बजाय सतर्कता विभाग (विजिलेंस डिपार्टमेंट) में शिकायत दर्ज करा दी। इसके बाद सतर्कता विभाग ने इंस्पेक्टर तिवारी के नेतृत्व में जाल बिछाया। पुलिस टीम ने कानपुर सिविल कोर्ट के पास स्थित चौरसिया होटल में महेश चंद को वीरेंद्र सिंह से रासायनिक पाउडर (फेनोल्फथैलीन) लगे 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

साल 1985 में ट्रायल कोर्ट ने महेश चंद को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 5(2) और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 161 के तहत दोषी करार देते हुए दोनों मामलों में एक-एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इस मामले में सह-आरोपी कानूनगो चंद्र सेन को बरी कर दिया गया था, जिसके बाद महेश चंद ने अपनी सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

कोर्ट ने साजिश की दलील को किया खारिज

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सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता महेश चंद ने दलील दी कि जय विजय सिंह ने उनके खिलाफ साजिश के तहत रिश्वत का झूठा मामला तैयार किया था। चंद का दावा था कि इस साजिश का मुख्य मकसद सरकारी फाइलों को जब्त करवाना था ताकि किसी अन्य फैसले को टलवाया जा सके।

जस्टिस संजीव कुमार ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने इस साजिश की थ्योरी को अतार्किक और अविश्वसनीय माना। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष बिना किसी उचित संदेह के अपना मामला साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है।

गवाहों के बयानों को माना विश्वसनीय

बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी थी कि चौरसिया होटल से किसी भी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया था, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर होता है।

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हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने रेखांकित किया कि पुलिस ने जाल बिछाने से पहले दो स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों को साथ लिया था, जिन्होंने रिश्वत बरामद होने की पुष्टि की थी। इनके अलावा शिकायतकर्ता और उनके पिता भी मुख्य गवाह के तौर पर मौजूद थे।

जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि सभी गवाहों ने अभियोजन पक्ष के दावों का पूरा समर्थन किया है। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि गवाहों की पूर्व लेखपाल के साथ कोई निजी दुश्मनी थी, जिसके कारण वे उनके खिलाफ झूठी गवाही देंगे। इसके अतिरिक्त, अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि महेश चंद ने खुद स्वीकार किया था कि वह वीरेंद्र सिंह के साथ चाय पीने चौरसिया होटल गए थे, जिससे घटना स्थल पर उनकी उपस्थिति स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।

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