बिना रजिस्ट्रेशन वाले 99 साल के लीज समझौते को महज नोटरी कराने से उसका कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन के सरकारी रिकॉर्ड से याचिकाकर्ताओं के नाम हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 99 साल के लीज समझौते के लिए महज नोटरी कराए गए दस्तावेज का कोई कानूनी महत्व या साक्ष्य मूल्य नहीं होता है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि बिना वैधानिक अनुमति के आदिवासी की जमीन किसी और को ट्रांसफर करना कानूनी रूप से पूरी तरह गलत है। जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीजन बेंच ने नासिक के एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर के फैसले को बरकरार रखा। इसके साथ ही, मामले को और लंबा खिंचने से रोकने के लिए बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सरकार के पास लंबित पुनर्विचार याचिका (रिवीजन एप्लीकेशन) को भी खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता—सुका महादू खाड़े, गणपत महादू खाड़े, अभाजी महादू खाड़े और पंढरीनाथ महादू खाड़े—ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। वे नासिक डिवीजन के एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर द्वारा आर.टी.एस. अपील संख्या 454/2025 में 27 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग कर रहे थे। उन्होंने त्र्यंबकेश्वर, नासिक के सर्कल ऑफिसर द्वारा 9 जून 2026 को जारी कब्जे के आदेश को भी चुनौती दी थी और राजस्व मंत्री के पास लंबित अपनी रिवीजन एप्लीकेशन के जल्द निपटारे का निर्देश देने का अनुरोध किया था।

यह विवाद नासिक जिले की त्र्यंबकेश्वर तहसील के चकोर गांव में स्थित गट नंबर 57 की 2 हेक्टेयर और 41 आर कृषि भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यह संपत्ति उनकी और प्रतिवादियों की पैतृक संपत्ति है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने 13 नवंबर 1997 को प्रतिवादी नंबर 1, बाबाबाई तुकाराम शेवरे के साथ एक समझौता किया था, जिसके तहत इस जमीन को 90,000 रुपये के कुल भुगतान पर 99 साल के लिए लीज पर लिया गया था। उनका दावा था कि वे 1991 से पहले से ही इस जमीन पर शांतिपूर्ण और निरंतर कब्जे में हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, पूरी रकम मिलने के बावजूद प्रतिवादियों ने उनकी जानकारी के बिना अधिकार अभिलेख (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) से उनका नाम हटवा दिया।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि इससे पहले प्रतिवादियों द्वारा म्यूटेशन एंट्री संख्या 259 और 381 को दी गई चुनौती को सब-डिवीजनल ऑफिसर ने 11 जुलाई 2023 को खारिज कर दिया था। उनका आरोप था कि उस फैसले को चुनौती देने के बजाय प्रतिवादियों ने तहसीलदार के पास कुका (KUKA) केस संख्या 2/2023 शुरू कर दिया। इसके बाद तहसीलदार और एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर ने प्रतिवादियों के पक्ष में आदेश पारित किए, जिससे याचिकाकर्ताओं के अधिकारों को नुकसान पहुंचा।

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राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी वकील (एजीपी) सुश्री निशा मेहरा ने इस रिट याचिका का कड़ा विरोध किया।

कोर्ट का विश्लेषण

पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद हाईकोर्ट को याचिका में कोई दम नजर नहीं आया। सौदे की प्रामाणिकता पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा:

“यह पूरा लेन-देन एक दिखावा प्रतीत होता है।”

99 साल के लीज समझौते का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“रिकॉर्ड पर मौजूद समझौता महज एक नोटरीकृत दस्तावेज है जिसका कोई साक्ष्य मूल्य नहीं है।”

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का नकद में 90,000 रुपये देने का दावा झूठा है। दस्तावेज में केवल यह लिखा है कि प्रतिवादी नंबर 1 ने समय-समय पर यह राशि प्राप्त करना स्वीकार किया है, लेकिन इस भुगतान का कोई रसीद या सबूत पेश नहीं किया गया। इसके अलावा, इस दस्तावेज पर केवल प्रतिवादी नंबर 1 का अंगूठे का निशान है और इसके अतिरिक्त याचिकाकर्ताओं के अधिकारों को साबित करने वाला कोई अन्य दस्तावेज मौजूद नहीं है।

प्रशासनिक आदेश को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा:

“एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर, नासिक डिवीजन द्वारा पारित आदेश पूरी तरह तर्कसंगत है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।”

बेंच ने जमीन के कानूनी संरक्षण का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर ने “सही दर्ज किया है कि प्रतिवादी नंबर 1 (जो कि एक आदिवासी हैं) की जमीन को बिना संबंधित सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के ट्रांसफर करने की कोशिश की गई, जो कि पूरी तरह से कानून के खिलाफ है।”

कोर्ट का फैसला

एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर के निष्कर्ष को पूरी तरह सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को खारिज कर दिया।

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इसके अलावा, न्याय के हित में और आगे की मुकदमेबाजी को रोकने के लिए, बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए याचिकाकर्ताओं द्वारा राजस्व मंत्री, मंत्रालय, मुंबई के समक्ष दायर की गई रिवीजन एप्लीकेशन को भी खारिज कर दिया।

कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आदेश अपलोड होने के एक सप्ताह के भीतर इसकी एक प्रति राजस्व मंत्रालय को भेजी जाए। कोर्ट ने एडिशनल डिवीजनल कमिश्नर के आदेश को बरकरार रखते हुए इसे चार सप्ताह के भीतर लागू करने का निर्देश दिया। मामले में मुकदमे के खर्च (कॉस्ट) को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुका महादू खाड़े और अन्य बनाम बाबाबाई तुकाराम शेवरे और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 7542/2026
पीठ: जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता
निर्णय की तिथि: 6 जुलाई, 2026

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