धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान के दौरान आरोपी के सामने रखे बिना विसरा रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज के लिए एक महिला को जहर देकर मारने के आरोपी तीन परिजनों को मिली 1989 की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया कि यदि विसरा रिपोर्ट को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज करते समय उनके सामने नहीं रखा गया था, तो अभियोजन पक्ष उस पर भरोसा नहीं कर सकता। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए आरोपी को सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों से अवगत कराना एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अलावा, कोर्ट ने विसरा नमूने की सुरक्षित कस्टडी साबित करने में गंभीर खामियों और अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाहों के बयानों में बड़े विरोधाभासों को भी रेखांकित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला साल 1984 का है, जब मृतका की शादी हुई थी। 13 जनवरी 1986 को मृतका के भाई ने कानपुर नगर जिले के महाराजपुर थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी बहन को उसके पति और ससुराल वालों द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जाता था और पीटा जाता था। ससुराल वाले पति के व्यवसाय के लिए पैसे या भाइयों के व्यवसाय में साझेदारी की मांग कर रहे थे।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 जनवरी 1986 को मृतका का दूसरा भाई और एक भांजा उसे वापस लाने के लिए उसके ससुराल गए थे। सास ने उसे भेजने से साफ मना कर दिया और अपनी पुरानी मांगें दोहराईं। इसके बाद भाई तो वापस लौट आया, लेकिन भांजा वहीं रुक गया। अगली सुबह, भांजा भागकर शिकायतकर्ता के घर पहुंचा और बताया कि उसकी मौसी को पीटा जा रहा है और जबरन कुछ खिलाया जा रहा है। जब शिकायतकर्ता वहां पहुंचा, तो उसे बताया गया कि बहन को हैजा (कॉलरा) है। हालांकि, मृतका ने कथित तौर पर अपने भाई को बताया कि ससुराल वालों ने उसे कुछ खाने के लिए दिया है, जिससे उसकी जुबान लड़खड़ा रही है। उसे इलाज के लिए कानपुर ले जाने की व्यवस्था की गई, लेकिन 13 जनवरी 1986 को रास्ते में ही उसकी मौत हो गई।

इन आरोपों के आधार पर, ट्रायल कोर्ट (प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कानपुर नगर) ने 7 दिसंबर 1989 को पति, ससुर और जेठ को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए, 302 और 323 के तहत दोषी ठहराया था। इस मामले में सास को भी दोषी ठहराया गया था, लेकिन इस अपील के लंबित रहने के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, जिससे उनके खिलाफ मामला समाप्त हो गया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने सजा को चुनौती देते हुए कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं:

  • जहर दिए जाने का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और इस बात की पूरी संभावना थी कि मृतका ने अपने वैवाहिक जीवन से नाखुश होकर खुद जहर खाया हो।
  • मृतका के भाई (गवाह नंबर 1) और भांजे (गवाह नंबर 3) के बयानों में गहरा विरोधाभास था। भाई ने दावा किया कि मृतका ने उसे बताया था कि उसे “दवा” दी गई थी, जबकि भांजे ने दावा किया कि उसके मुंह में जबरन कोई तरल मिश्रण डाला गया था।
  • जिंक फॉस्फाइड एक कड़वा और बेहद दुर्गंधयुक्त कीटनाशक है। इसे जबरन खिलाने पर तीव्र प्रतिरोध होता, लेकिन मृतका के मुंह या आरोपियों के शरीर पर संघर्ष का कोई निशान नहीं था।
  • विसरा रिपोर्ट की सत्यता पूरी तरह संदिग्ध थी क्योंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि इसे सुरक्षित कस्टडी में रखा गया था। इस संबंध में कोई रजिस्टर प्रविष्टि नहीं दिखाई गई और फॉरेंसिक विश्लेषक से भी पूछताछ नहीं की गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज करते समय विसरा रिपोर्ट को आरोपियों के सामने नहीं रखा था।

दूसरी ओर, अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि मृतका द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को दिए गए बयान पूरी तरह विश्वसनीय हैं। उन्होंने तर्क दिया कि शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण मृतका शायद जहर दिए जाने का विरोध नहीं कर पाई होगी, जिससे शरीर पर संघर्ष के निशान नहीं मिले। उन्होंने सजा को बरकरार रखने का अनुरोध किया।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों की साक्ष्य उपयोगिता और ट्रायल के दौरान अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि इलाज करने वाले डॉक्टर (गवाह नंबर 6) के अनुसार मृतका की हालत अत्यंत गंभीर थी, जिससे इस बात पर गहरा संदेह पैदा होता है कि वह बोलने की स्थिति में थी या नहीं। गवाहों के बयानों में विरोधाभास पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“ऐसे मामले में जहां दोषी को आजीवन कारावास जैसी गंभीर सजा दी जानी हो, अभियोजन पक्ष के मामले को बहुत सावधानी से देखा जाना चाहिए। जब गवाह नंबर 1 और गवाह नंबर 3 के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास हो, तो कोर्ट को इस मामले को बहुत समझदारी से निपटाना चाहिए और यदि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में विसंगति है, तो इसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।”

अदालत ने रासायनिक तत्व “जिंक फॉस्फाइड” के भौतिक गुणों का मूल्यांकन करते हुए टिप्पणी की:

“इसके अलावा, हम पाते हैं कि ‘जिंक फॉस्फाइड’ ऐसा जहर नहीं है जिसे चुपके से दिया जा सके। इसका स्वाद कड़वा होता है और इसमें बहुत खराब गंध होती है। इसलिए, यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति को यह जहर दिया जाता है, तो वह इसका विरोध करेगा और उसके शरीर पर चोटें आएंगी। यदि वह पूरी ताकत से विरोध करेगा, तो जहर देने वाले व्यक्ति को भी चोटें आएंगी।”

मामले में मृतका या आरोपी परिवार के किसी भी सदस्य के शरीर पर ऐसे कोई चोट के निशान नहीं मिले।

मुख्य कानूनी मुद्दे पर बात करते हुए कोर्ट ने पाया कि धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज करते समय आरोपियों के सामने न तो विसरा और न ही उसकी रिपोर्ट रखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने इस बात को दोहराया कि कोई भी आपत्तिजनक परिस्थिति जिसे आरोपी के सामने उसके बयान के दौरान नहीं रखा गया है, उसे विचार से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की: “निश्चित रूप से, अपीलकर्ताओं के विद्वान वकील द्वारा उद्धृत सभी फैसलों के अनुसार, विसरा रिपोर्ट को बिल्कुल भी ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए।”

इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि विसरा नमूने की कस्टडी की कड़ियां पूरी तरह से अप्रमाणित थीं। प्रिजर्वेशन रजिस्टर की कोई प्रविष्टि पेश नहीं की गई, किसी गवाह ने यह गवाही नहीं दी कि उसने सीलबंद नमूने को डॉक्टर से मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) के कार्यालय तक सुरक्षित पहुंचाया था और न ही सीएमओ कार्यालय के किसी कर्मचारी ने इसकी सुरक्षा को लेकर बयान दिया। जिस कांस्टेबल (गवाह नंबर 10) ने नमूने को फॉरेंसिक लैब पहुंचाया, वह भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि उसे यह नमूना किससे मिला और उसने इसे किसे सौंपा।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि विसरा रिपोर्ट कानूनी रूप से अग्राह्य और प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण थी, इसलिए अभियोजन पक्ष का पूरा मामला धराशायी हो गया:

“केवल विसरा रिपोर्ट ही एक ऐसा ठोस सबूत थी जिससे यह साबित हो सकता था कि आरोपी व्यक्तियों ने जहर देकर हत्या की थी। चूंकि विसरा रिपोर्ट खुद अब ऐसा सबूत बन गई है जिसे हमारे अनुसार साक्ष्य में नहीं पढ़ा जा सकता, इसलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि अपील स्वीकार की जानी चाहिए और आरोपियों को बरी किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 7 दिसंबर 1989 को पारित सजा के आदेश को रद्द कर दिया। अपीलकर्ताओं—पति, ससुर और जेठ—को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता जमानत पर हैं, तो उन्हें आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है और उनकी जमानत व मुचलके खारिज किए जाते हैं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राम औतार एवं अन्य बनाम राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या – 1989 की 2343
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा, जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
.निर्णय की तिथि: 3 जुलाई, 2026

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