राजस्थान हाईकोर्ट ने भरतपुर जिले की बयाना विधानसभा सीट से विधायक रितु बनावत के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि नामांकन पत्र में छोटी-मोटी वित्तीय विसंगतियों के आधार पर किसी लोकतांत्रिक चुनाव के नतीजे को रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालती समन से करीब 10 महीने तक बचने और सुनवाई में देरी करने के लिए हाईकोर्ट ने विधायक पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह राशि उन्हें याचिकाकर्ता को देनी होगी।
यह फैसला जस्टिस सुदेश बंसल ने 29 जून को पराजित प्रत्याशी पुरुषोत्तम लाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। पुरुषोत्तम लाल ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 और 81 के तहत रितु बनावत के निर्वाचन को चुनौती दी थी। कोर्ट ने विधायक के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उन्हें जुर्माने की 1 लाख रुपये की राशि 30 दिनों के भीतर पुरुषोत्तम लाल को भुगतान करने का आदेश दिया।
साल 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में बयाना सीट से रितु बनावत ने 1,05,749 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी, जबकि याचिकाकर्ता पुरुषोत्तम लाल को महज 689 वोट मिले थे। पुरुषोत्तम लाल ने 8 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि रितु बनावत ने 4 नवंबर 2023 को दाखिल किए गए अपने शपथ पत्र (फॉर्म-26) में अपनी संपत्तियों और व्यक्तिगत जानकारी को छिपाया है, इसलिए उनका चुनाव शून्य घोषित किया जाए।
सिर्फ 83 रुपये के लिए चुनाव रद्द नहीं हो सकता
सुनवाई के दौरान मुख्य विवाद केनरा बैंक के एक खाते को लेकर था, जिसमें ब्याज के केवल 83 रुपये जमा थे। यह खाता रितु बनावत द्वारा नामांकन दाखिल करने से दो दिन पहले, यानी 2 नवंबर 2023 को बंद कर दिया गया था। जस्टिस सुदेश बंसल ने इस संबंध में विधायक के स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए कहा कि इस बंद खाते की जानकारी न देना न तो जानबूझकर किया गया प्रयास था और न ही यह कोई महत्वपूर्ण जानकारी थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि विधायक ने अपनी कुल चल संपत्ति 8,13,125 रुपये घोषित की थी। इस राशि में व्यावहारिक रूप से एसबीआई खाते के 1,458 रुपये और केनरा बैंक के बंद खाते के 83 रुपये जैसी छोटी बची हुई रकमें शामिल मानी जा सकती हैं। कोर्ट के अनुसार, इस तरह की मामूली चूक से मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता और न ही इससे चुनाव परिणाम पर कोई असर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि रितु बनावत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी नहीं दी, कृषि भूमि को कम करके आंका, अपने पति के बैंक खातों का विवरण छिपाया और शपथ पत्र के कई कॉलम खाली छोड़ दिए। हाईकोर्ट ने इन सभी आपत्तियों को महत्वहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, रिसर्जेंस इंडिया, कृष्णमूर्ति, लोक प्रहरी और अजमेरा श्याम बनाम कोवा लक्ष्मी) का संदर्भ देते हुए जस्टिस बंसल ने कहा कि चुनावी हलफनामे में होने वाली हर छोटी त्रुटि या तकनीकी कमी चुनाव रद्द करने का आधार नहीं बन सकती। इससे यह साबित नहीं होता कि विधायक ने जानबूझकर कोई बड़ी चल संपत्ति छिपाई या किसी गलत आचरण का सहारा लिया।
समन से बचने पर सख्त रुख
हालांकि, कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामले की सुनवाई में बाधा डालने और समन की अनदेखी करने पर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने पाया कि रितु बनावत को मामले की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने जानबूझकर अदालती समन स्वीकार करने से परहेज किया, जिसके कारण मुकदमे की शुरुआत में करीब 10 महीने की देरी हुई।
जस्टिस बंसल ने अपने फैसले में लिखा कि किसी जन प्रतिनिधि द्वारा समन की तामील से बचना पूरी तरह अस्वीकार्य है। भविष्य में इस तरह के आचरण को रोकने के लिए उन पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाना पूरी तरह उचित है।

