गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2009 में एक सड़क दुर्घटना में पूरी तरह दिव्यांग हो चुके एक किशोर के मुआवजे में 30 लाख रुपये से अधिक की बढ़ोतरी की है। कोर्ट ने पहले तय किए गए मुआवजे को करीब चार गुना बढ़ाते हुए इसे लगभग 40 लाख रुपये कर दिया है।
जस्टिस एम सी त्यागी ने पीड़ित राही पटेल को मिलने वाले मुआवजे को 9.04 लाख रुपये से बढ़ाकर 39.81 लाख रुपये करने का निर्देश दिया। 25 जून को सुनाए गए इस फैसले में, जो बुधवार को सामने आया, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि 2009 में हुए इस हादसे ने पटेल को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए दूसरों पर पूरी तरह निर्भर बना दिया है।
गंभीर चोटें और जीवनभर देखभाल की जरूरत
यह दुर्घटना नवंबर 2009 में हुई थी जब कक्षा 10 में पढ़ने वाले राही पटेल एक स्कूटर पर पीछे बैठे थे। तभी एक तेज रफ्तार और लापरवाही से आ रही मोटरसाइकिल ने उनके स्कूटर को टक्कर मार दी, जिससे उन्हें बेहद गंभीर चोटें आईं।
अदालत में पेश किए गए मेडिकल दस्तावेजों से पता चलता है कि इस हादसे का पटेल के जीवन पर कितना विनाशकारी और दीर्घकालिक असर पड़ा है। इस टक्कर के कारण उनके मस्तिष्क को स्थायी और अपरिवर्तनीय क्षति पहुंची, उनके व्यवहार और भावनाओं में बदलाव आया, आंखों की रोशनी कमजोर हो गई और जबड़े में आई खराबी के कारण उन्हें खाना खाने में भी परेशानी होती है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि उन्हें अपने परिवार के सदस्यों या किसी विशेष सहायक द्वारा चौबीसों घंटे देखभाल की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही, उन्हें दौरे रोकने वाली दवाइयों का सेवन भी जीवनभर करना पड़ सकता है।
कमाई के आकलन पर छिड़ी कानूनी जंग
इस मामले में मुख्य कानूनी विवाद इस बात को लेकर था कि पटेल की भविष्य की कमाई की क्षमता का आकलन कैसे किया जाए। बीमा कंपनी ने मुआवजे में किसी भी तरह की बढ़ोतरी का विरोध किया था। कंपनी का तर्क था कि दुर्घटना के समय पटेल एक छात्र थे और उनकी कोई नियमित आय नहीं थी, इसलिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा पहले तय किया गया मुआवजा बिल्कुल उचित था।
दूसरी ओर, पटेल के कानूनी प्रतिनिधि ने दलील दी कि न्यायाधिकरण ने उनके भविष्य की संभावनाओं का बहुत कम आकलन किया है। उन्होंने तर्क दिया कि आय का कोई लिखित दस्तावेज न होने की स्थिति में, न्यायाधिकरण को पटेल की सालाना कमाई को एकमुश्त 18,000 रुपये आंकने के बजाय उस समय के कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन को आधार बनाना चाहिए था, जो कि 3,880 रुपये प्रति माह था।
मुनावजे को लेकर हाईकोर्ट का संवेदनशील रुख
जस्टिस त्यागी ने बीमा कंपनी के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण ने तत्कालीन न्यूनतम वेतन के मानकों को लागू न करके भूल की थी। हाईकोर्ट ने उस समय की न्यूनतम मजदूरी दर को आधार मानकर और उसमें पटेल के भविष्य के करियर की संभावनाओं के लिए 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी जोड़कर मुआवजे की रकम की नई गणना की।
सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल होने वाले बच्चों और युवाओं के मुआवजे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे पीड़ितों को अत्यधिक शारीरिक दर्द और मानसिक आघात से गुजरना पड़ता है। चूंकि दुर्घटना का मुआवजा केवल एक ही बार दिया जा सकता है, इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में संवेदनशील और उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
कोर्ट ने पटेल के निजी जीवन को पहुंचे गहरे नुकसान का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि उनकी इस शारीरिक स्थिति के कारण उनके लिए एक सामान्य सामाजिक जीवन जीना या शादी करना बेहद मुश्किल हो गया है।
बीमा कंपनी को निर्देशित किया गया है कि वह बढ़े हुए मुआवजे की राशि को ब्याज समेत छह सप्ताह के भीतर न्यायाधिकरण के पास जमा कराए। जरूरी सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह राशि पीड़ित को सौंप दी जाएगी।

