महाराष्ट्र को ‘टैंकर मुक्त’ बनाने में विफलता पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को जल जीवन मिशन जैसी महत्वकांक्षी योजनाओं के बावजूद महाराष्ट्र के ‘टैंकर मुक्त’ न होने पर राज्य सरकार से कड़ी पूछताछ की। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह 2019 में शुरू हुए जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत प्राप्त फंड और उसके उपयोग का पूरा ब्योरा आगामी सुनवाई में पेश करे।

आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण और पानी के भारी संकट को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस अजय एस गडकरी और जस्टिस कमल आर खाता की बेंच ने सरकार के प्रयासों पर असंतोष व्यक्त किया। अदालत ने सरकार से तीन सप्ताह के भीतर एक ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत करने को कहा है।

योजनाओं के क्रियान्वयन पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि क्या पीने के पानी की ये योजनाएं वास्तव में उन जरूरतमंद नागरिकों तक पहुंच रही हैं, जो इसके असली हकदार हैं। जजों ने कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या जनता के लिए भेजा गया पानी भाप बनकर उड़ गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र को टैंकर मुक्त बनाने का सपना अभी तक जमीन पर नहीं उतरा है और इसके कारण आम नागरिक लगातार परेशानी का सामना कर रहे हैं।

मेलघाट में वन विभाग की मंजूरी का पेंच

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राज्य सरकार की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील (एजीपी) पी एम जोशी-देशपांडे ने अदालत को बताया कि मेलघाट क्षेत्र के धारणी और चिखलदरा गांवों में अभी भी पीने का पानी टैंकरों के जरिए सप्लाई किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह इलाका ‘वाइल्ड फॉरेस्ट जोन’ (वन्य क्षेत्र) में आता है, जिसके कारण पाइपलाइन बिछाने के लिए वन विभाग से मंजूरी मिलने का इंतजार है और इसी वजह से जेजेएम का काम रुका हुआ है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि सरकार ने संकटग्रस्त क्षेत्रों में वैकल्पिक जल आपूर्ति की व्यवस्था की है।

फंडिंग रोके जाने का दावा और कोर्ट की फटकार

इसी बीच, एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जुगल किशोर गिल्डा ने अदालत को जानकारी दी कि केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2024 से जेजेएम प्रोजेक्ट के लिए अपनी 50 प्रतिशत फंडिंग रोक दी है, जिससे योजना का क्रियान्वयन बाधित हुआ है।

इस पर हाईकोर्ट ने सरकार की कार्यप्रणाली और लंबी देरी पर सख्त नाराजगी जताई। बेंच ने राज्य सरकार से पूछा कि जब योजना 2019 में शुरू हुई थी, तो केंद्र से सामान्य प्रशासनिक अनुमतियां लेने में पांच साल का समय कैसे लग सकता है। अदालत ने यह भी पूछा कि अगर मेलघाट में वन विभाग की मंजूरी की समस्या है, तो महाराष्ट्र के बाकी हिस्से अब तक टैंकरों पर निर्भर क्यों हैं।

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क्या हमेशा अदालत आते रहेंगे लोग?

बेंच ने सरकार से पूछा कि क्या जल राहत योजनाओं की कोई निश्चित समय सीमा है या फिर जब तक भारत का अस्तित्व है, लोग पानी के लिए हर साल अदालत का दरवाजा खटखटाते रहेंगे।

ज्ञात हो कि इससे पहले 23 जून को भी इसी बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि कुपोषण और आदिवासी इलाकों में पानी की कमी पर बार-बार आदेश देने के बावजूद सरकारी निष्क्रियता के कारण सिर्फ अदालती रिकॉर्ड बढ़ रहा है। अब राज्य सरकार को तीन सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई में अपने पिछले खर्चों और भविष्य के ठोस सुधारात्मक कदमों पर विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा।

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