परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (सर्कमस्टेंशियल एविडेंस) के मानकों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक अपीलकर्ता, गिर राज को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह संदेह से परे सबूत का स्थान नहीं ले सकता। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा और दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के अपराध को संदेह से परे साबित करने के लिए परिस्थितियों की एक पूरी और अटूट कड़ी स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष की कहानी 12 और 13 मई 1998 की दरमियानी रात से शुरू होती है, जब पुलिस गश्ती दल को नांगलोई पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले ‘राम संस फार्म हाउस’ (हिरन कूदना मोड़) पर एक संदिग्ध हत्या की सूचना मिली थी। घटनास्थल पर पहुंचने पर सब-इंस्पेक्टर अनिल गांधी और अन्य अधिकारियों को कमरे के फर्श पर खून से सना गद्दा और ईंटें मिलीं, लेकिन वहां न तो पीड़ित मौजूद था और ना ही कोई चश्मदीद गवाह।
बाद में जांच से पता चला कि घायल व्यक्ति हरभजन सिंह को पहले ही पीसीआर वैन द्वारा डीडीयू अस्पताल ले जाया जा चुका था, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पुलिस ने फार्म हाउस पर काम करने वाले मजदूर गिर राज को गिरफ्तार कर लिया, जिसने खुद फार्म हाउस के मालिक और पुलिस को घटना की सूचना दी थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि हिरासत में पूछताछ के दौरान अपीलकर्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और पुलिस को फार्म हाउस के ट्यूबवेल वाले कमरे में ले गया, जहां उसने उपले (कंडे) से भरी बोरी के नीचे छिपाई गई लोहे की एक खून से सनी रॉड (गदाला) बरामद करवाई।
ट्रायल कोर्ट ने 25 अगस्त 2004 को अपने फैसले में गिर राज को मुख्य रूप से तीन परिस्थितियों के आधार पर दोषी ठहराया था: पहला, हत्या का मकसद (आरोप था कि मृतक की नजर अपीलकर्ता की पत्नी पर थी); दूसरा, ‘लास्ट सीन’ थ्योरी (घटना की रात फार्म हाउस में केवल वे दोनों ही मौजूद थे); और तीसरा, अपराध में इस्तेमाल किए गए हथियार की बरामदगी। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने गिर राज को उम्रकैद और 3,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील सुश्री आशा तिवारी ने तर्क दिया कि यह पूरा मामला केवल अविश्वसनीय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और इसमें कोई सीधा सबूत नहीं था। उन्होंने दलील दी कि कथित मकसद को साबित करने वाला अभियोजन पक्ष का गवाह हरि सिंह कोर्ट में अपनी गवाही से पलट गया और उसने स्वीकार किया कि पुलिस के दबाव में उसने पहले बयान दिया था। उन्होंने मृतक के पिता राम खिलारी की गवाही को भी विरोधाभासों से भरा और अविश्वसनीय बताया।
हथियार की बरामदगी पर बचाव पक्ष की वकील ने तर्क दिया कि पुलिस हिरासत के दौरान लिया गया कथित कबूलनामा कानूनन अमान्य है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले रामानंद उर्फ नंदलाल भारती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) 16 SCC 510 का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी कोर्ट के समक्ष वह सटीक शब्द पेश करने में विफल रहे जो आरोपी ने कथित तौर पर कहे थे। इसके अलावा, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट में भी बरामद लोहे की रॉड (गदाला) पर खून का कोई निशान नहीं मिला था।
दूसरी ओर, राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक (एपीपी) श्री अमन उस्मान ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि ‘लास्ट सीन’ थ्योरी पूरी तरह स्थापित थी क्योंकि उस रात फार्म हाउस में केवल अपीलकर्ता और मृतक ही थे। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी का यह बचाव पूरी तरह काल्पनिक है कि 7 से 8 बदमाशों ने कंटीले तारों से घिरी ऊंची दीवार फांदकर हत्या की। उन्होंने दलील दी कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपी के इशारे पर हथियार की बरामदगी एक बड़ा सबूत है। उन्होंने इसके समर्थन में नीलू उर्फ नीलेश कोष्टी बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया और कहा कि मेडिकल रिपोर्ट से साबित होता है कि मृतक की मौत लोहे की रॉड जैसे भारी वस्तु के प्रहार से हुई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने परिस्थितियों की तीनों कड़ियों—हत्या का मकसद, कबूलनामा व बरामदगी, और ‘लास्ट सीन’ थ्योरी का बेहद बारीकी से विश्लेषण किया।
हत्या के मकसद के बिंदु पर पीठ ने पाया कि मुख्य गवाह हरि सिंह ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया, जिससे उसकी गवाही का कोई कानूनी महत्व नहीं रह गया। मृतक के पिता के बयान पर अदालत ने टिप्पणी की कि कथित तौर पर घटना से कुछ दिन पहले आरोपी से सीधे जान से मारने की धमकी मिलने के बावजूद पिता ने कोई कदम नहीं उठाया; न तो पुलिस या पंचायत में शिकायत की और न ही अपने बेटे को आगाह किया। ऐसे में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष हत्या के मकसद को साबित करने में विफल रहा।
बरामदगी और कबूलनामे के संबंध में हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों में भारी विसंगतियां पाईं। जहां स्वतंत्र गवाह मान सिंह ने कहा कि आरोपी का बयान सुबह फार्म हाउस पर दर्ज किया गया था, वहीं सब-इंस्पेक्टर अनिल गांधी ने दावा किया कि यह बयान शाम को पुलिस स्टेशन में लिखा गया था। अदालत ने भौतिक साक्ष्यों में एक गंभीर कमी को रेखांकित करते हुए कहा: “इसके अलावा, जहां कथित बरामदगी ज्ञापन (Ex.PW-2/D) में कहा गया है कि बरामद गदाला पर खून जैसे धब्बे थे, और पीडब्ल्यू-17 और पीडब्ल्यू-18 ने भी गदाला पर खून के धब्बे होने की बात कही है, वहीं विद्वान ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश किए गए गदाला पर खून का कोई धब्बा नहीं था, जैसा कि पोस्टमार्टम करने वाले पीडब्ल्यू-4/डॉ. कोमल सिंह ने भी स्वीकार किया था।”
सुप्रीम कोर्ट के रामानंद उर्फ नंदलाल भारती मामले के फैसले का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: “जांच अधिकारी की गवाही पर सुरक्षित रूप से भरोसा करने के लिए न्यायालय के समक्ष यह आवश्यक है कि आरोपी के मुंह से निकले सटीक शब्द रिकॉर्ड पर लाए जाएं। इसके लिए जांच अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह अपनी गवाही में आरोपी के वास्तविक बयान को दर्ज कराए, न कि केवल यह कहकर पल्ला झाड़ ले कि हथियार की बरामदगी का पंचनामा इसलिए तैयार किया गया क्योंकि आरोपी इसे किसी खास स्थान से निकालने के लिए तैयार था।”
अदालत ने कहा कि केवल किसी वस्तु की खोज हो जाना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ने ही उसे छिपाया था या उसका इस्तेमाल किया था। अभियोजन पक्ष बरामद रॉड को अपराध से जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा।
‘लास्ट सीन’ थ्योरी और बाहरी बदमाशों के घुसने की आरोपी की दलील पर कोर्ट ने माना कि भले ही अभियोजन पक्ष की दलीलें आरोपी पर गहरा संदेह पैदा करती हैं, लेकिन वे आपराधिक मामले में सजा के लिए तय कड़े कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले बलू उर्फ बलराम उर्फ बालमुकुंद और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) 12 SCC 202 का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “यह स्थापित कानून है कि संदेह, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो, संदेह से परे सबूत का स्थान नहीं ले सकता। किसी भी आरोपी को केवल संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो। जब तक आरोपी को संदेह से परे दोषी सिद्ध नहीं कर दिया जाता, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाएगा।”
हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि अपने ऊपर लगे आरोपों को झूठा साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर नहीं होती, बल्कि आरोपी के अपराध को संदेह से परे साबित करने का पूरा दायित्व अभियोजन पक्ष का होता है।
अदालत का निर्णय
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि अभियोजन पक्ष आवश्यक कानूनी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहा है, हाईकोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और गिर राज को हत्या के आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 25 अगस्त 2004 को दिए गए दोषसिद्धि के फैसले और 3 सितंबर 2004 के सजा के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता के बेल बॉन्ड और जमानतदारों को मुक्त करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: गिर राज बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 927/2004
पीठ: जस्टिस नवीन चावला, जस्टिस रविंदर डुडेजा
निर्णय की तिथि: 18.06.2026

