बकाया बिक्री राशि जमा करने की समय सीमा बढ़ाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने क्रेता को राहत देने वाले निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) एक साम्या-आधारित (इक्विटेबल) राहत है, जिसमें अदालतों को दोनों पक्षों के बीच साम्या का संतुलन बनाना होता है। कोर्ट ने माना कि बिना किसी स्पष्टीकरण के अत्यधिक विलंब और घोर लापरवाही के कारण क्रेता स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट, 1963 की धारा 28 के तहत समय सीमा विस्तार पाने का अधिकार खो देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद 3 जुलाई 1991 को विक्रेता (याचिकाकर्ता दुलीराम मौर्य) और क्रेता (उत्तरदाता नंदराम) के बीच एक जमीन बेचने के समझौते से शुरू हुआ था। जमीन की कुल कीमत 25,000 रुपये तय की गई थी, जिसमें से 13,000 रुपये समझौते के दिन अग्रिम (एडवांस) दिए गए थे, जबकि शेष 12,000 रुपये बैनामा (सेल डीड) के निष्पादन के समय चुकाए जाने थे।
वर्ष 1993 में, क्रेता ने समझौते के विशिष्ट अनुपालन के लिए मूल वाद (ओरिजनल सूट नंबर 109/1993) दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त 1998 को मुकदमा खारिज करते हुए कहा कि बिक्री पत्र निष्पादित करने का कोई वास्तविक समझौता नहीं था और यह अनुबंध वास्तव में ऋण लेनदेन के छद्म रूप में किया गया था।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ क्रेता ने सिविल अपील (नंबर 101/1998) दायर की। 22 नवंबर 2003 को प्रथम अपीलीय अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए वाद को डिक्री कर दिया। अदालत ने विक्रेता को दो महीने के भीतर बिक्री पत्र निष्पादित करने और क्रेता को एक महीने के भीतर शेष 12,000 रुपये जमा करने का निर्देश दिया।
इसके खिलाफ विक्रेता ने 2004 में हाईकोर्ट में दूसरी अपील (नंबर 235/2004) दायर की, जिसमें कोई अंतरिम स्टे आदेश पारित नहीं हुआ था। डिक्री पारित होने के लगभग नौ साल बाद, 6 अगस्त 2012 को क्रेता ने निष्पादन कार्यवाही (एग्जीक्यूशन केस नंबर 1/2012) शुरू की और समय सीमा बढ़ाने की अर्जी दी, जो अननिर्णीत लंबित रही।
23 सितंबर 2019 को हाईकोर्ट ने विक्रेता की दूसरी अपील खारिज कर दी। इसके बाद विक्रेता ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28 के तहत आवेदन (26-सी) दायर कर क्रेता द्वारा समय पर राशि जमा न करने के आधार पर अनुबंध/डिक्री को रद्द करने की मांग की। इसके जवाब में, 17 नवंबर 2025 को क्रेता ने आवेदन (31-सी और 55-सी) दाखिल कर बकाया राशि जमा करने के लिए समय सीमा बढ़ाने और विलंब माफ करने की मांग की।
23 दिसंबर 2025 को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने विक्रेता के आवेदन को खारिज कर दिया और 1,000 रुपये के हर्जाने पर क्रेता के समय विस्तार आवेदन को स्वीकार कर लिया। विक्रेता कीRevision अर्जी (सिविल रिवीजन नंबर 3/2026) को भी एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज/स्पेशल जज (पॉक्सो एक्ट), बदायूं ने 6 अप्रैल 2026 को खारिज कर दिया। इन आदेशों से व्यथित होकर विक्रेता ने अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
पक्षों के तर्क
विक्रेता-याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राहुल सहाय ने तर्क दिया कि प्रथम अपीलीय अदालत ने 2003 में ही एक महीने के भीतर जमा करने का निर्देश दिया था, लेकिन नौ साल तक न तो कोई राशि जमा की गई और न निष्पादन की कार्यवाही की गई। उन्होंने कहा कि 2019 में दूसरी अपील खारिज होने के बाद भी क्रेता ने नवंबर 2025 तक समय बढ़ाने का आवेदन नहीं दिया। 20 साल से अधिक समय बाद राशि जमा करने की अनुमति देना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘हब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन’ का हवाला दिया।
दूसरी ओर, क्रेता-उत्तरदाता की तरफ से अधिवक्ता ललित कुमार ने तर्क दिया कि धारा 28 अदालतों को समय सीमा बढ़ाने का discretionary अधिकार देती है। उन्होंने कहा कि ‘विलय के सिद्धांत’ (डॉक्ट्रिन ऑफ मर्जर) के तहत 2003 की डिक्री 23 सितंबर 2019 के हाईकोर्ट के फैसले में विलीन हो गई। चूंकि दूसरी अपील लंबित थी, इसलिए निष्पादन कार्यवाही पर जोर नहीं दिया गया था और समय की गणना 2003 से नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ‘आनंद नारायण शुक्ला बनाम जगत धारी’ और ‘बलबीर सिंह बनाम बलदेव सिंह’ पर भरोसा जताया।
अदालत का विश्लेषण और पूर्व नज़ीरें
हाईकोर्ट ने स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट, 1963 की धारा 28 और प्रासंगिक कानूनी नज़ीरों का गहराई से परीक्षण किया:
- डिक्री की प्रकृति: ‘चंदा बनाम रत्नी’ और ‘बलबीर सिंह बनाम बलदेव सिंह’ का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि विशिष्ट अनुपालन की डिक्री एक प्रारंभिक डिक्री की तरह होती है। ‘सरदार मोहर सिंह बनाम मांगीलाल’ और ‘भूपिंदर कुमार बनाम अंग्रेज सिंह’ के अनुसार, जब तक बिक्री पत्र निष्पादित नहीं हो जाता, अदालत समय बढ़ाने या अनुबंध रद्द करने का अपना अधिकार क्षेत्र नहीं खोती।
- रद्दीकरण आवेदन अनिवार्य नहीं: ‘हब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन’ का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 28 के तहत अनुबंध रद्द करने की अर्जी देना विक्रेता के लिए अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक है, और शर्तें पूरी न होने पर अदालत अनुबंध को रद्द मानने में शक्तिहीन नहीं होती।
- सशर्त डिक्री और स्वतः खारिज होना: ‘पी.आर. येलुमलाई बनाम एन.एम. रवि’ का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि निर्धारित समय के बाद बिना वैध कारण के जमा स्वीकार करना स्वतः समय विस्तार नहीं माना जा सकता।
- अपीलीय स्तर और विलय का सिद्धांत: ‘रामणकुट्टी गुप्तन बनाम आवरा’ का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत द्वारा डिक्री पारित किए जाने पर भी आवेदन मूल अदालत में ही पोषणीय होता है क्योंकि निचली अदालत की डिक्री अपीलीय डिक्री में विलीन हो जाती है।
- घोर लापरवाही और साम्या की परीक्षा: ‘राम लाल बनाम जरनैल सिंह’ और ‘आनंद नारायण शुक्ला बनाम जगत धारी’ का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि यद्यपि हर दिन की देरी का कारण बताना अनिवार्य नहीं है, लेकिन मुख्य परीक्षा यह है कि क्या क्रेता का आचरण घोर लापरवाही या अनुबंध पूरा न करने की अनिच्छा को दर्शाता है।
दूसरी अपील लंबित होने के क्रेता के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“उक्त तर्क पूरी तरह से भ्रामक है क्योंकि यह विशिष्ट अनुपालन का मामला है, जहां प्रथम अपीलीय अदालत ने 22.11.2003 को डिक्री पारित करते हुए वादी-उत्तरदाता को बकाया बिक्री राशि जमा करने के लिए एक महीने का समय दिया था।”
अदालत ने पाया कि दूसरी अपील में कोई स्टे नहीं था और क्रेता उसमें उपस्थित भी नहीं हुआ था। क्रेता के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“वादी-उत्तरदाता के आचरण से यह स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि वह अनुबंध के विशिष्ट अनुपालन के लिए डिक्री का निष्पादन कराने में रुचि नहीं रखता था और न ही बकाया बिक्री राशि जमा करके अपने हिस्से का दायित्व पूरा करने के लिए तैयार था।”
अदालत ने आगे कहा:
“वर्तमान मामले में, बकाया बिक्री राशि जमा करने के अपने हिस्से के प्रदर्शन को पूरा करने में वादी-उत्तरदाता की ओर से ऐसा विलंब हुआ है जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय के दौरान निर्मित साम्याएं विक्रेता के पक्ष में हैं:
“देरी की अवधि और इस दौरान निर्मित साम्या (इक्विटी) निर्णय-देनदार के पक्ष में है। विशिष्ट अनुपालन के वाद में अदालत को पक्षों के बीच साम्या का संतुलन बनाना होता है।”
निचली अदालतों के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“दोनों निचली अदालतें निर्णय-देनदार को 1,000 रुपये के जुर्माने के भुगतान पर समय विस्तार के आवेदन को स्वीकार करने और 1963 के अधिनियम की धारा 28 के तहत डिक्री के रद्द करने के उसके आवेदन को खारिज करने में सही नहीं थीं।”
“दोनों निचली अदालतें वर्तमान मामले में साम्या का संतुलन बनाने में विफल रहीं और उन्होंने गलत तरीके से दर्ज किया कि दूसरी अपील के लंबित रहने के कारण डिक्री का निष्पादन कराने में वादी-उत्तरदाता की कोई गलती नहीं थी।”
अदालत का फैसला और निर्देश
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों निचली अदालतों द्वारा पारित आदेश पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं। तदनुसार, हाईकोर्ट ने एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज/स्पेशल जज (पॉक्सो एक्ट), बदायूं द्वारा सिविल रिवीजन नंबर 3/2026 में पारित आदेश दिनांक 6 अप्रैल 2026 और एडिशनल सिविल जज (जूनियर डिविजन), बदायूं द्वारा एग्जीक्यूशन केस नंबर 1/2012 में पारित आदेश दिनांक 23 दिसंबर 2025 को रद्द कर दिया।
याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने विक्रेता (दुलीराम मौर्य) को निर्देश दिया कि वह 3 जुलाई 1991 के समझौते के तहत प्राप्त 13,000 रुपये की अग्रिम राशि क्रेता (नंदराम) को प्राप्ति की तिथि से 6% वार्षिक ब्याज के साथ एक महीने के भीतर वापस करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दुलीराम मौर्य बनाम नंदराम
वाद संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 6695 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 06 अगस्त 2026

