संपत्ति के मालिक द्वारा अनुमति वापस लेने के बाद बहू का निवास अधिकार अपरिहार्य नहीं, अनुमति रद्द होने पर संपत्ति पर बच्चों का कोई अधिकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संपत्ति के मालिक द्वारा रहने की अनुमति वापस ले लेने के बाद बेटे और बहू को पिता के मकान में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने एक दंपति की दूसरी अपील खारिज करते हुए माना कि हालांकि बहू को साझा घर (शेयर्ड हाउसहोल्ड) में रहने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह अधिकार अपरिहार्य (इंडीफीजिबल) नहीं है और कानून की उचित प्रक्रिया अपनाकर उसे बेदखल किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद उत्तरी दिल्ली के जहांगीरपुरी स्थित एक फ्लैट से जुड़ा है, जिसके पूर्ण मालिक बुजुर्ग पिता हैं। जनवरी 2012 में बेटे के विवाह के बाद पिता ने प्यार और स्नेह के नाते नवविवाहित जोड़े को मकान के एक कमरे में रहने की अनुमति दी थी।

दिसंबर 2014 के बाद से बेटे और बहू का व्यवहार बुजुर्ग पिता के प्रति हिंसक और अपमानजनक होने लगा। वृद्ध अवस्था में देखरेख करने के बजाय जून 2015 में दंपति ने पिता को ही मकान से बेदखल करने की धमकी दी। इसके बाद पिता ने 13 जुलाई 2015 को लीगल नोटिस भेजकर उनके रहने की अनुमति रद्द कर दी और खाली न करने पर कब्जा वापस पाने के लिए सिविल सूट दायर किया।

पक्षों की दलीलें

सिविल जज के समक्ष बेटे और बहू ने दावा किया कि पिता संपत्ति के एकमात्र मालिक नहीं हैं। बहू का तर्क था कि उसने ससुर को 2 लाख रुपये दिए थे और ससुर ने उसके नाम सेल डीड निष्पादित करने का आश्वासन दिया था। वहीं बेटे का दावा था कि उसने मकान के रखरखाव में भारी धनराशि खर्च की है, जिससे वह संपत्ति में सह-मालिक बन गया है।

दूसरी ओर, पिता ने इन दावों को खारिज करते हुए 1996 का अलॉटमेंट लेटर और 40,218.43 रुपये के भुगतान की रसीदें पेश कर अपना मालिकाना हक साबित किया। निचली अदालत द्वारा कई अवसर दिए जाने के बावजूद बेटा और बहू अपने दावों के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं कर सके, जिसके बाद 27 मार्च 2023 को उनका साक्ष्य बंद कर दिया गया।

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हाईकोर्ट में दूसरी अपील के दौरान दंपति ने सुप्रीम कोर्ट के प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि घरेलू संबंध होने के कारण यह ‘साझा घर’ है, जहां संपत्ति के मालिकाना हक से परे बहू को रहने का स्वतंत्र अधिकार है।

निचली अदालतों के निष्कर्ष

ट्रायल कोर्ट (सिविल जज) ने 27 मई 2023 को पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे और बहू को एक महीने के भीतर संपत्ति का शांतिपूर्ण खाली कब्जा सौंपने का निर्देश दिया था। अदालत ने टिप्पणी की थी कि साझा मकान में बहू के रहने का कोई अपरिहार्य अधिकार नहीं है। हालांकि पारिवारिक संबंधों को देखते हुए अदालत ने हर्जाने या उपयोग शुल्क का दावा खारिज कर दिया था।

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इसके बाद जिला जज ने भी 1 अगस्त 2024 को प्रथम अपील खारिज करते हुए माना कि बेटे-बहू द्वारा सह-स्वामित्व या 2 लाख रुपये के योगदान का कोई सबूत पेश नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 100 के तहत मामले की समीक्षा करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने माना कि पिता संपत्ति के पूर्ण मालिक हैं और उन्होंने केवल रहने की अनुमति दी थी।

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साझा घर में बहू के रहने के अधिकार पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2021) का संदर्भ दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि बहू का अधिकार अपरिहार्य नहीं है और एकमात्र शर्त यह है कि उसे केवल कानून के अनुसार ही बेदखल किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार जब पिता ने अपनी संपत्ति में रहने की अनुमति वापस ले ली, तो इसके बाद अपीलकर्ता उनके मकान में बने रहने का कोई अधिकार नहीं जता सकते।

अपील में कानून का कोई गंभीर प्रश्न न पाते हुए हाईकोर्ट ने दूसरी अपील और सभी लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री बृज राज एवं अन्य बनाम श्री चांद बाबू
वाद संख्या: आरएसए 185/2024
पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
निर्णय की तिथि: 04 अगस्त 2026

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