सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद खुद आरोपी से शादी कर ली थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग किया।
जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें उसने सजा को रद्द करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि अब यह जोड़ा पति-पत्नी के रूप में समाज में शांतिपूर्वक जीवन जीने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। इस फैसले के लिए शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का सहारा लिया, जो सुप्रीम कोर्ट को किसी भी लंबित मामले में ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश पारित करने का अधिकार देता है।
संवैधानिक शक्तियों का उपयोग
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश पूरी तरह से इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए पारित किया गया है और इसे भविष्य में किसी अन्य मामले के लिए नजीर (मिसाल) नहीं माना जाएगा। पीठ ने मामले के गुण-दोष पर विस्तृत चर्चा किए बिना ही पॉक्सो कानून की धारा 5(1) के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को रद्द करने और उसे बरी करने का फैसला लिया। इसके अलावा, चूंकि मद्रास हाईकोर्ट ने 3 जून, 2019 को ही उसकी जेल की सजा को निलंबित कर दिया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसे अब आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली युवती और आरोपी के बीच प्रेम संबंध बन गए थे। जब युवक ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, तो युवती ने उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। इस शिकायत के कारण युवक पर नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में मुकदमा चला और उसे पॉक्सो कानून के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई।
सुलह और सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस कानूनी कार्रवाई के बाद महिला ने किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ली थी। हालांकि, जब उसके पति को उसके पिछले संबंध के बारे में पता चला, तो उसने शादी के कुछ ही दिनों बाद उसे छोड़ दिया। इसी बीच, जब आरोपी युवक जमानत पर बाहर आया, तो दोनों के बीच फिर से सुलह हो गई। इसके बाद दोनों ने आपस में शादी कर ली और एक साथ रहने लगे।
अपने पति की सजा को खत्म कराने के लिए महिला ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया, जिसके बाद इस दंपति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जहां आखिरकार उन्हें राहत मिली और पति को बरी कर दिया गया।

