वित्तीय कानून (fiscal jurisprudence) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन गेमिंग, फैंटेसी स्पोर्ट्स और कैसीनो लेनदेन में दांव (stakes) के पूरे अंकित मूल्य (full face value) पर 28 प्रतिशत की दर से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगाने के निर्णय को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे, ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 11 मई, 2023 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसके तहत गेम्सक्राफ्ट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड से लगभग 21,000 करोड़ रुपये के टैक्स की मांग करने वाले कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने निर्णय दिया कि एक बार जब ऑनलाइन गेमिंग गतिविधियों में भागीदारी अनिश्चित परिणामों पर पैसा लगाने (staking money) पर निर्भर हो जाती है, तो वह लेनदेन सट्टेबाजी और जुए का रूप ले लेता है, जिससे टैक्स के मामलों में ‘कौशल के खेल’ (games of skill) और ‘भाग्य के खेल’ (games of chance) के बीच का पारंपरिक अंतर बेअसर हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मुख्य रूप से 23 सितंबर, 2022 को माल एवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय द्वारा केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST Act) की धारा 74(1) के तहत गेम्सक्राफ्ट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ जारी कारण बताओ नोटिस से शुरू हुआ था। टैक्स अधिकारियों ने 2017 से 2022 की अवधि के लिए लगभग 21,000 करोड़ रुपये के बकाया जीएसटी, ब्याज और जुर्माने की वसूली का प्रस्ताव रखा था। राजस्व विभाग का दावा था कि गेम्सक्राफ्ट के प्लेटफॉर्म पर दांव लगाकर खेली जाने वाली ऑनलाइन रम्मी “सट्टेबाजी और जुआ” के दायरे में आती है और यह प्लेटफॉर्म एक्शनेबल क्लेम (actionable claims) की टैक्स योग्य सप्लाई में शामिल था।
इस नोटिस से पहले, ऑनलाइन गेमिंग कंपनियां केवल अपने प्लेटफॉर्म कमीशन शुल्क पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करती थीं, और इसे सर्विस अकाउंटिंग कोड 998439 के तहत एक सेवा मानती थीं। खिलाड़ियों द्वारा दांव पर लगाई गई कुल राशि (प्राइज पूल) पर टैक्स नहीं लगाया जाता था, क्योंकि कंपनियों का कहना था कि यह पैसा उनके राजस्व का हिस्सा नहीं है।
गेम्सक्राफ्ट ने इस कारण बताओ नोटिस को कर्नाटक हाईकोर्ट में सफलतापूर्वक चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 11 मई, 2023 को नोटिस को रद्द कर दिया और माना कि रम्मी कौशल का खेल है और दांव के साथ खेले जाने वाले कौशल के खेल सीजीएसटी अधिनियम की अनुसूची III की प्रविष्टि 6 के तहत “सट्टेबाजी और जुआ” की परिभाषा में नहीं आते हैं। इसके बाद राजस्व विभाग ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
इस अपील के लंबित रहने के दौरान, भारत भर के विभिन्न अन्य ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स, फैंटेसी स्पोर्ट्स ऑपरेटर्स और कैसीनो मालिकों ने भी सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिकाएं और ट्रांसफर केस दायर किए। इन ऑपरेटर्स ने इसी तरह के कारण बताओ नोटिसों के साथ-साथ केंद्रीय माल और सेवा कर (संशोधन) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक और कानूनी वैधता को भी चुनौती दी, जिसके तहत नए नियमों (नियम 31बी और 31सी) के तहत ऑनलाइन गेमिंग और कैसीनो में खिलाड़ियों द्वारा जमा की गई कुल राशि पर 28 प्रतिशत टैक्स लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इन सभी मामलों को एक साथ जोड़कर सुना।
पक्षों की दलीलें
राजस्व विभाग की दलीलें
राजस्व विभाग की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इस टैक्स की वैधता को सही ठहराने के लिए कई तर्क दिए।
राजस्व विभाग का कहना था कि जैसे ही दांव (stakes) शामिल होते हैं, वहां जुआ अनिवार्य रूप से शुरू हो जाता है, चाहे वह खेल कौशल का हो या भाग्य का। विभाग का तर्क था कि भले ही कौशल का खेल अपने आप में जुआ नहीं है, लेकिन दांव लगाकर इसे खेलने से यह लेनदेन जीएसटी ढांचे के तहत जुआ बन जाता है।
विभाग ने आगे तर्क दिया कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म केवल निष्क्रिय मददगार या मध्यस्थ नहीं हैं। इसके बजाय, वे एक ऐसा व्यावसायिक ढांचा तैयार करते हैं जहां प्रतिभागी चल संपत्ति में हित हासिल करते हैं। यह अधिकार ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 3 के तहत ‘एक्शनेबल क्लेम’ (actionable claim) है, जिसे सीजीएसटी अधिनियम की धारा 2(52) के तहत ‘गुड्स’ (माल) माना गया है। इसलिए, खिलाड़ियों द्वारा जमा की गई पूरी राशि सीजीएसटी अधिनियम की धारा 2(31) के तहत ‘कंसीडरेशन’ (प्रतिफल) है, जिससे पूरी राशि पर 28 प्रतिशत जीएसटी लागू होता है।
अंत में, विभाग ने 2023 के संशोधनों का बचाव करते हुए कहा कि ये पूरी तरह से स्पष्टीकरण देने वाले थे ताकि कानून की गलत व्याख्या को रोका जा सके, और इसीलिए इन्हें पिछली तारीख से लागू माना जाना चाहिए।
करदाताओं और गेमिंग प्लेटफॉर्म्स की दलीलें
ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स और कैसीनो ऑपरेटर्स की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने संवैधानिक और कानूनी दोनों आधारों पर इस टैक्स का विरोध किया।
कानूनी पहलू पर, करदाताओं ने दलील दी कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 30 के तहत सट्टेबाजी का अनुबंध शून्य (void) और कानूनन अप्रवर्तनीय है। उनका कहना था कि चूंकि एक शून्य लेनदेन को सिविल कोर्ट में लागू नहीं कराया जा सकता, इसलिए यह सीजीएसटी अधिनियम के तहत ‘एक्शनेबल क्लेम’ या ‘गुड्स’ नहीं हो सकता।
इसके अलावा, गेमिंग कंपनियों का दावा था कि वे केवल खिलाड़ियों के पैसों की संरक्षक (trustee) के रूप में कार्य करती हैं। चूंकि इस पैसे का स्वामित्व कभी भी प्लेटफॉर्म ऑपरेटर के पास नहीं जाता और यह केवल विजेताओं को बांटने के लिए एस्क्रो अकाउंट में रखा जाता है, इसलिए इसे प्लेटफॉर्म का राजस्व मानकर टैक्स नहीं लगाया जा सकता।
कंपनियों ने यह भी कहा कि “सट्टेबाजी और जुआ” गतिविधियां हैं, गुड्स नहीं। उन्होंने तर्क दिया कि 2023 के संशोधनों ने ऑनलाइन गेमिंग पर एक नया टैक्स लगाया है, न कि पुराने कानून को स्पष्ट किया है। इसलिए, अक्टूबर 2023 से पहले के दांवों पर 28 प्रतिशत टैक्स पिछली तारीख से लागू करना असंवैधानिक है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सीजीएसटी नियम 31ए वास्तव में अधिनियम की धारा 15 का उल्लंघन करता है, क्योंकि धारा 15(1) केवल वास्तविक लेनदेन मूल्य (प्लेटफॉर्म कमीशन) पर टैक्स लगाने की बात कहती है, न कि कृत्रिम रूप से टैक्स का आधार बढ़ाकर दांव की 100 प्रतिशत राशि पर।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 246ए के तहत टैक्स लगाने के अधिकार क्षेत्र, एक्शनेबल क्लेम की परिभाषा और टैक्स कानूनों के भीतर कौशल बनाम भाग्य के परीक्षण की प्रासंगिकता की जांच की।
कोर्ट ने सबसे पहले सीजीएसटी अधिनियम, 2017 की धाराओं 2(31), 2(52), 7, 9 और 15 के साथ-साथ राज्यों के जीएसटी नियमों और नियम 31ए तथा 31बी की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टैक्स मामलों में विधायिका को नीतियां बनाने की पूरी छूट है और केवल व्यावसायिक कठिनाई, मुनाफे में कमी या टैक्स की दर बढ़ने से कोई कानून असंवैधानिक नहीं हो जाता।
कौशल के खेल से जुड़े मुख्य तर्क पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“सट्टेबाजी और जुए का चरित्र इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसके पीछे की गतिविधि कौशल का खेल है या भाग्य का, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि अनिश्चित भविष्य की संभावनाओं पर दांव लगाया गया है या नहीं।”
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि कौशल और भाग्य के बीच का अंतर आपराधिक कानूनों के तहत पुलिस नियमों के लिए प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन जीएसटी ढांचे के तहत “सट्टेबाजी” या “जुए” पर टैक्स लगाने के लिए इसका कोई महत्व नहीं है। एक बार जब किसी अनिश्चित परिणाम पर पैसा दांव पर लगा दिया जाता है, तो वह सट्टेबाजी और जुए की कानूनी परिभाषा को पूरा करता है।
ऑनलाइन गेमिंग ऑपरेटर्स की भूमिका पर कोर्ट ने माना:
“ऑनलाइन गेमिंग ऑपरेटर्स प्रतिभागियों के बीच केवल लेनदेन की सुविधा देने वाले मध्यस्थ (intermediaries) नहीं हैं, बल्कि वे खुद जीएसटी कानून के दायरे में ऐसे ‘एक्शनेबल क्लेम’ (actionable claims) के सप्लायर हैं। टैक्स योग्य सप्लाई खुद खेल में भाग लेने के लिए दांव की राशि जमा करने और उसे खेल के लिए इस्तेमाल करने के साथ ही अस्तित्व में आ जाती है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्लेटफॉर्म एक ऐसा ढांचा तैयार करते हैं जहां खिलाड़ी भाग लेने का अधिकार खरीदते हैं और प्राइज पूल में हिस्सा पाने का एक अधिकार हासिल करते हैं। यह अधिकार ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 के तहत एक एक्शनेबल क्लेम है, और इसलिए सीजीएसटी अधिनियम की धारा 7 के तहत जीएसटी के दायरे में आने वाला ‘गुड्स’ है। दांव पर लगी पूरी राशि ही टैक्स योग्य मूल्य है और इसमें से प्राइज पूल या जीती गई राशि को घटाने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
साल 2023 के संशोधनों की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“केंद्रीय माल और सेवा कर (संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा पेश किए गए संशोधन, जिसमें अनुसूची III की प्रविष्टि 6 में संशोधन और नियम 31बी और 31सी को शामिल करना शामिल है, प्रकृति में स्पष्टीकरण देने वाले (clarificatory) और व्याख्यात्मक (explanatory) हैं और दर्शाए गए तरीके से पिछली तारीख से (retrospectively) लागू होंगे।”
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम वर्कमैन मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी पुराने प्रावधान के भ्रम या गलत व्याख्या को दूर करने के लिए संशोधन किया जाता है, तो ऐसा कानून स्पष्टीकरण देने वाला और पिछली तारीख से लागू माना जाता है। 2023 के संशोधनों ने कोई नया टैक्स नहीं लगाया, बल्कि पहले से मौजूद टैक्स को अधिक स्पष्टता दी।
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व विभाग द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार कर लिया, कर्नाटक हाईकोर्ट के 11 मई, 2023 के फैसले को रद्द कर दिया और गेम्सक्राफ्ट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड को जारी किए गए कारण बताओ नोटिसों को बहाल कर दिया।
कोर्ट ने इसी तरह ड्रीम 11 मामले (गुरदीप सिंह सचर) में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया जिसने फैंटेसी स्पोर्ट्स को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा था। जीएसटी प्रावधानों को चुनौती देने वाली सभी रिट याचिकाएं और ट्रांसफर केस खारिज कर दिए गए।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि ऑनलाइन गेमिंग, फैंटेसी स्पोर्ट्स और कैसीनो लेनदेन से जुड़े सभी लंबित कारण बताओ नोटिसों और टैक्स मांगों का फैसला सीजीएसटी नियमों के नियम 31बी और 31सी के तहत निर्धारित मूल्यांकन ढांचे के अनुसार किया जाए।
कोर्ट ने करदाताओं को बहाल किए गए कारण बताओ नोटिसों का जवाब देने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया। संबंधित टैक्स अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे इन जवाबों पर विचार करें और उसके बाद बारह सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करें। इस मामले में पहले दिए गए सभी अंतरिम राहत आदेश वापस ले लिए गए हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डायरेक्टरेट जनरल ऑफ गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स इंटेलिजेंस (एचक्यूएस) और अन्य बनाम गेम्सक्राफ्ट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8241-8244 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन
निर्णय की तिथि: 27 मई, 2026

