सुभाष चंद्र फैसले के लगभग एक साल बाद भी जांच सुधार के निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन होना बाकी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी, उत्तर प्रदेश में आपराधिक जांच को मानकीकृत करने और अभियोजन की जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी किए गए प्रमुख पुलिस सुधार दिशा-निर्देशों को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है। एक नाबालिग लड़की की सुरक्षित बरामदगी के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का निपटारा करते हुए, जस्टिस विनोद दिवाकर ने अदालत द्वारा अनिवार्य किए गए सुभाष चंद्र दिशा-निर्देशों का पालन न करने पर राज्य के प्रशासनिक तंत्र की कड़ी आलोचना की। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया कि वह गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) के सेवा रिकॉर्ड को केंद्रीय कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) के समक्ष प्रस्तुत करे, ताकि भविष्य के असाइनमेंट के लिए उनकी उपयुक्तता का मूल्यांकन किया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक याचिकाकर्ता महिला द्वारा दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से उत्पन्न हुआ था, जिसमें उन्होंने अपनी 15 वर्षीय नाबालिग बेटी को एक आरोपी के चंगुल से छुड़ाकर वापस सौंपने की मांग की थी। शिकायत के बाद, 11 जून 2025 को झांसी जिले के सिपरी बाजार थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 87 और 137(2) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

हालांकि आरोपी को गिरफ्तार किया गया और बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया, लेकिन जांच अधिकारियों ने नाबालिग पीड़िता को बरामद किए बिना ही प्राथमिकी दर्ज होने के साठ दिनों के भीतर, यानी 13 अगस्त 2025 को आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया। यह आरोप पत्र मुख्य रूप से आरोपी और कुछ गवाहों के बयानों पर आधारित था, जिसमें दावा किया गया था कि जब आरोपी रेलवे स्टेशन पर सो रहा था, तब नाबालिग लड़की उसकी जानकारी के बिना ट्रेन में चढ़कर कहीं चली गई।

जांच के सतही और लापरवाह तरीके पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप किया और झांसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को नाबालिग को खोजने में विफलता पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि क्या हाईकोर्ट द्वारा सुभाष चंद्र एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में स्थापित किए गए अनिवार्य सुरक्षा उपायों का पालन किया गया था या नहीं। सुभाष चंद्र दिशा-निर्देशों के अनुसार पुलिस रिपोर्टों के कॉलम-16 में विस्तृत विवरण दर्ज करना और अदालत में जमा करने से पहले अभियोजन अधिकारियों द्वारा ड्राफ्ट चार्जशीट की स्वतंत्र समीक्षा करना अनिवार्य है।

राज्य भर में इस व्यवस्था के अनुपालन की जांच करने के लिए कोर्ट ने दस अलग-अलग जिलों से नमूने के तौर पर दस आरोप पत्र मंगवाए। इस समीक्षा से स्पष्ट हुआ कि इन दिशा-निर्देशों का समान रूप से पालन नहीं किया जा रहा था, जो जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्यान्वयन की व्यापक कमी को उजागर करता है।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पुलिस ने एक बेहद कमजोर और त्रुटिपूर्ण जांच की है। उन्होंने नाबालिग लड़की को बरामद किए बिना या सभी संभावित संदिग्धों की पहचान किए बिना केवल केस फाइल बंद करने की जल्दी में आनन-फानन में आरोप पत्र दाखिल कर दिया।

राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अपर महाधिवक्ता ने विस्तृत खोज रिपोर्ट पेश की, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पुलिस टीमों द्वारा किए गए व्यापक प्रयासों की जानकारी दी गई। इनमें कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जांच करना, रेड-लाइट क्षेत्रों में तलाशी अभियान चलाना, सोशल मीडिया पर सूचनाएं जारी करना और पीड़िता के इंस्टाग्राम अकाउंट के संबंध में मेटा प्लेटफॉर्म्स को वैधानिक नोटिस भेजना शामिल था। सितंबर 2025 में शिवपुरी के भोंती में मिली एक अज्ञात युवती के 90% जले हुए शव से पीड़िता का संबंध खारिज करने के लिए स्थानीय पुलिस के साथ किए गए समन्वय का भी उल्लेख किया गया।

वहीं, सुभाष चंद्र दिशा-निर्देशों को लागू करने के नीतिगत मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव ने 20 फरवरी 2026 को एक हलफनामा दायर किया। राज्य सरकार ने दलील दी कि गृह विभाग ने सुभाष चंद्र के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर चुनौती देने का निर्णय लिया है।

राज्य ने तर्क दिया कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात राज्य बनाम किशनभाई मामले में जांच के बाद की संवीक्षा (स्क्रूटनी) पर जोर दिया था, लेकिन ऐसा कोई अनिवार्य निर्देश नहीं दिया था कि जांच अधिकारियों को अदालत में आरोप पत्र पेश करने से पहले अभियोजन अधिकारियों से इसकी समीक्षा करानी होगी। राज्य का तर्क था कि इस तरह की अनिवार्य पूर्व-समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के आर. सरला बनाम टी.एस. वेलु के फैसले के प्रकाश में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए तरीके से इन निर्देशों को लागू नहीं किया जा सकता था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने अपहृत नाबालिग लड़की के मामले को संभालने में पुलिस की ढिलाई और संरचनात्मक पुलिस सुधारों के प्रति प्रशासनिक तंत्र के भीतर दिख रहे कड़े विरोध पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि सुभाष चंद्र का फैसला 12 मई 2025 को सुनाया गया था, लेकिन इसके बाद पूरे एक साल तक इसे लागू करने के लिए कोई ठोस प्रशासनिक कदम नहीं उठाए गए। राज्य द्वारा विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के फैसले का खुलासा भी फरवरी 2026 में केवल तब किया गया जब कोर्ट ने सख्ती से अनुपालन रिपोर्ट की मांग की, और तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट से कोई स्थगन आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया।

ऐतिहासिक प्रशासनिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र से तुलना की और कहा कि आज से 2300 वर्ष पहले भी सार्वजनिक अधिकारियों के काम की दैनिक जांच की जाती थी क्योंकि:

“मनुष्य स्वभाव से चंचल मन के होते हैं और काम पर लगे घोड़ों की तरह अपने व्यवहार में लगातार बदलाव प्रदर्शित करते हैं।”

अदालत ने बिना किसी नियंत्रण वाले प्रशासनिक विवेक पर निर्भर रहने के लिए कार्यपालिका की आलोचना की और कहा:

“अनियंत्रित विवेक अपने साथ गंभीर खतरे लेकर आता है – यह कानून के शासन को कमजोर करता है; यह प्रशासनिक अधिकारियों के लिए अवैध शक्ति के स्रोत के रूप में कार्य करता है; यह उन्हें अपने निर्णयों के लिए कारण बताने के दायित्व से मुक्त करता है; यह कानूनी निश्चितता को कमजोर करता है; और यह सार्वजनिक अधिकारियों को उन व्यक्तियों के प्रति जवाबदेही से मुक्त करता है जिनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।”

अदालत ने तत्कालीन अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा:

“श्री संजय प्रसाद का आचरण, जैसा कि ऊपर देखा गया है, प्रथम दृष्टया न्यायिक निर्देशों के प्रवर्तन में संयम बरतने के लिए प्रस्तावित विशेष अनुमति याचिका को आधार के रूप में पेश करके इस न्यायालय के अधिकार को कमजोर करने का एक जानबूझकर और सुनियोजित प्रयास दर्शाता है, जबकि साथ ही वह पूरी तत्परता या नेक नियति के साथ उक्त उपाय को आगे बढ़ाने में विफल रहे हैं।”

इन व्यवस्थागत कमियों को दूर करने के लिए हाईकोर्ट ने भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के सचिव को सिफारिश की कि वे सिविल सेवाओं के लिए “वरिष्ठ उत्तरदायित्व का सिद्धांत” (डॉक्ट्रिन ऑफ सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी) शामिल करते हुए एक नियामक ढांचा तैयार करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

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“वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीनस्थों के आचरण और प्रदर्शन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि यह सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करने की उनकी व्यावसायिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।”

कोर्ट ने माना कि इस प्रकार की प्रशासनिक जवाबदेही को उस स्थिति में आपराधिक दायित्व में बदला जाना चाहिए जहां वरिष्ठ अधिकारियों की लापरवाही के कारण भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या अदालत द्वारा अनिवार्य नीतियों को जानबूझकर दबाने जैसी घटनाएं होती हैं।

जांच के कानूनी मानकों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने निष्पक्ष, स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच पर जोर देने वाले कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया, जिनमें सानुज बंसल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, डबलू कुजूर बनाम झारखंड राज्य, आर.के. डालमिया आदि बनाम दिल्ली प्रशासन, और शरीफ अहमद व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य शामिल हैं।

हाईकोर्ट का निर्णय

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को सूचित किया गया कि स्थानीय पुलिस द्वारा नाबालिग लड़की को सुरक्षित बरामद कर उसके माता-पिता को सौंप दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने माना कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का मुख्य उद्देश्य अब पूरा हो चुका है।

याचिका का निस्तारण करते हुए कोर्ट ने झांसी के SSP और स्थानीय पुलिस टीम द्वारा नाबालिग को ढूंढ निकालने के लिए किए गए ठोस प्रयासों की सराहना की।

हालांकि, सुभाष चंद्र दिशा-निर्देशों के अनुपालन को लेकर प्रशासनिक शिथिलता को देखते हुए कोर्ट ने इस चरण पर कोई नया अनुपालन आदेश जारी नहीं किया, लेकिन रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को निर्देश दिया कि वे इस फैसले की एक प्रमाणित प्रति भारत सरकार के DoPT सचिव को भेजें। इसके साथ ही DoPT को निर्देशित किया गया कि वे संजय प्रसाद (IAS) के सेवा रिकॉर्ड को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) के समक्ष रखें, ताकि भविष्य के महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों के लिए उनकी उपयुक्तता का आकलन किया जा सके।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मेघा रायकवार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य

वाद संख्या: हेबियस कॉर्पस रिट पिटीशन संख्या 946 वर्ष 2025
पीठ: जस्टिस विनोद दिवाकर
निर्णय की तिथि: 03 जून, 2026

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