सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 33 के तहत मध्यस्थ के समक्ष आवेदन दायर किया है, तो धारा 34 के तहत मध्यस्थता पुरस्कार को चुनौती देने की समय-सीमा उस आवेदन के निस्तारण की तारीख से शुरू होगी। कोर्ट ने कहा कि यह लाभ केवल उन मामलों तक सीमित नहीं है, जिनमें धारा 33 का आवेदन स्वीकार किया गया हो या बाद में उसे वैध माना गया हो।
जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एनएचएआई की धारा 34 के तहत दायर याचिकाओं को समय-सीमा से बाहर माना गया था।
विवाद की पृष्ठभूमि
मामला कर्नाटक के बेल्लारी जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। 15 दिसंबर 2009 को राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3ए(1) के तहत प्रारंभिक अधिसूचना जारी की गई थी, जिसमें संबंधित भूमि भी शामिल थी। बाद में धारा 3डी(2) के तहत घोषणा जारी होने पर भूमि केंद्र सरकार में निहित हो गई और 5 दिसंबर 2011 को सक्षम प्राधिकारी ने मुआवजा निर्धारित किया।
एनएचएआई ने धारा 3जी(5) के तहत मध्यस्थता का सहारा लिया। डिप्टी कमिश्नर-सह-मध्यस्थ ने 16 फरवरी 2013 को पुरस्कार पारित कर भूमि का बाजार मूल्य पुनर्निर्धारित किया। बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2019 को उस पुरस्कार को रद्द कर मामले को नए सिरे से विचार के लिए मध्यस्थ के पास वापस भेज दिया।
पुनर्विचार के बाद मध्यस्थ ने 3 फरवरी 2022 को नया पुरस्कार पारित किया और भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धाराओं 23(1-ए), 23(2), 28 और 34 के लाभ प्रदान किए। इसके बाद एनएचएआई ने धारा 33(1)(ए) के तहत आवेदन दायर कर पुरस्कार में संशोधन की मांग की। दूसरी ओर, भूमि मालिक ने धारा 33(4) के तहत अतिरिक्त पुरस्कार की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया। दोनों आवेदन 4 जुलाई 2022 को एक साझा आदेश से खारिज कर दिए गए।
इसके बाद एनएचएआई ने धारा 34 के तहत पुरस्कार को चुनौती देते हुए आवेदन दाखिल किए और विलंब माफी की भी मांग की। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बल्लारी ने 5 अगस्त 2023 को विलंब माफ कर दिया। इस आदेश को भूमि मालिक ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां हाईकोर्ट ने एनएचएआई के विरुद्ध फैसला दिया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पक्षों की दलीलें
एनएचएआई ने कहा कि जब दोनों पक्षों के धारा 33 के आवेदन लंबित थे, तब तक धारा 34 की कार्यवाही प्रभावी रूप से शुरू नहीं की जा सकती थी। इसलिए समय-सीमा की गणना धारा 33 के आवेदनों के निस्तारण की तारीख से होनी चाहिए।
वहीं भूमि मालिक की ओर से तर्क दिया गया कि एनएचएआई का धारा 33 का आवेदन वास्तव में पुरस्कार की समीक्षा कराने का प्रयास था, न कि केवल टंकण या गणना संबंधी त्रुटियों के सुधार का। इसलिए उसे धारा 34(3) के तहत समय-सीमा बढ़ाने का लाभ नहीं मिल सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
पीठ ने धारा 33 और धारा 34(3) का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून स्पष्ट रूप से यह कहता है कि यदि धारा 33 के तहत अनुरोध किया गया है, तो धारा 34 के तहत चुनौती की समय-सीमा उस अनुरोध के निस्तारण की तारीख से शुरू होगी।
कोर्ट ने कहा:
“यह प्रावधान उन आवेदनों के बीच कोई अंतर नहीं करता जो अंततः स्वीकार किए जाते हैं या खारिज किए जाते हैं। यह भी नहीं कहता कि केवल वही आवेदन, जिन्हें धारा 33 के तहत वैध माना जाए, धारा 34(3) के तहत मुकदमेबाजी की शुरुआत को स्थगित करेंगे। यदि विधायिका ऐसा प्रतिबंध लगाना चाहती, तो वह इसे स्पष्ट रूप से प्रावधान में शामिल करती।”
पीठ ने आगे कहा:
“जब तक ऐसी कार्यवाही लंबित रहती है, पक्षकारों को केवल एहतियात के तौर पर धारा 34 के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। धारा 34 के तहत उपलब्ध उपाय का प्रभावी उपयोग तभी किया जा सकता है जब धारा 33 की कार्यवाही समाप्त हो जाए।”
कोर्ट ने यह भी कहा:
“महत्वपूर्ण यह नहीं है कि धारा 33 का आवेदन अंततः सफल हुआ या असफल, बल्कि यह है कि क्या मध्यस्थ न्यायाधिकरण का अधिकार क्षेत्र औपचारिक रूप से धारा 33 के तहत आहूत किया गया था और क्या वह कार्यवाही न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन रही।”
दामानी कंस्ट्रक्शन मामले से अलग बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्टेट ऑफ अरुणाचल प्रदेश बनाम दामानी कंस्ट्रक्शन कंपनी मामले पर भूमि मालिक का भरोसा उचित नहीं है। उस मामले में धारा 33 के तहत कोई औपचारिक आवेदन दायर नहीं किया गया था। वहां केवल एक पत्र भेजा गया था, जिसमें पुरस्कार की समीक्षा और अन्य स्पष्टीकरण मांगे गए थे।
इसके विपरीत, वर्तमान मामले में दोनों पक्षों ने निर्धारित अवधि के भीतर विधिवत धारा 33 के आवेदन दायर किए थे और मध्यस्थ ने उन पर विचार कर साझा आदेश पारित किया था।
प्रक्रिया के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
पीठ ने कहा कि उसकी व्याख्या से अनावश्यक समानांतर कार्यवाहियों और प्रक्रियागत अनिश्चितता से बचा जा सकेगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष केवल समय-सीमा को टालने के उद्देश्य से धारा 33 के तहत दिखावटी या दुर्भावनापूर्ण आवेदन दायर करता है, तो अदालतें कठोर रुख अपना सकती हैं।
कोर्ट ने कहा:
“जहां धारा 33 के तहत आवेदन बनावटी, तुच्छ, दुर्भावनापूर्ण या केवल धारा 34(3) की समय-सीमा को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से दायर किए गए पाए जाएं, वहां अदालतें उदाहरणात्मक और दंडात्मक लागत लगाने के लिए उचित रूप से सक्षम होंगी।”
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि धारा 33 के आवेदनों के निस्तारण संबंधी आदेश की प्रमाणित प्रति एनएचएआई को 15 सितंबर 2022 को प्राप्त हुई थी और इसके बाद 7 नवंबर 2022 को धारा 34 के आवेदन दायर किए गए। इसलिए ये आवेदन धारा 34(3) में निर्धारित समय-सीमा के भीतर थे।
कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का 22 जनवरी 2024 का फैसला रद्द कर दिया और प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बल्लारी द्वारा 5 अगस्त 2023 को पारित विलंब माफी के आदेश को बहाल कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि धारा 34 के तहत दायर आवेदनों का अब कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर निस्तारण किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया बनाम टी. यूनिस एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 7570/2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा एवं जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 2 जून 2026

