बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिल्म इंडस्ट्री में काम दिलाने का झूठा वादा कर एक महिला के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म करने के आरोपी व्यक्ति की अग्रिम जमानत (anticipatory bail) याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बेहद कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपी को इस स्तर पर राहत देने से मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
१ जून को दिए अपने आदेश में जस्टिस श्याम सी. चांडक की अवकाशकालीन पीठ (vacation bench) ने टिप्पणी की कि आरोपी के कृत्य ने पीड़िता की जिंदगी पूरी तरह बर्बाद कर दी है। इसके साथ ही, इंटरनेट पर फैलाए गए डिजिटल साक्ष्यों की बरामदगी के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) को बेहद जरूरी बताया।
ऑडिशन की आड़ में बिछाया धोखे का जाल
पुणे पुलिस द्वारा दर्ज की गई इस प्राथमिकी (FIR) में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 (धोखा देकर या भ्रामक तरीकों से शारीरिक संबंध बनाना) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, यह मामला करीब दो साल पहले शुरू हुआ था जब पीड़िता ने एक ऑडिशन के सिलसिले में आरोपी से संपर्क किया था। आरोपी ने उसे एक अच्छी फिल्म की कहानी दिलाने का भरोसा दिया, जिससे दोनों के बीच जान-पहचान और दोस्ती बढ़ गई। इसके बाद, आरोपी ने फिल्म जगत में काम दिलाने का लगातार झांसा देकर महिला की सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित किए।
इस दौरान आरोपी ने महिला को झांसे में रखकर उसकी कई आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो भी बना लिए। उसने भरोसा दिया था कि यह संवेदनशील सामग्री कभी किसी के सामने नहीं आएगी। आरोपी ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अपनी असल जिंदगी को भी छिपाए रखा; उसने महिला को यह नहीं बताया कि वह शादीशुदा है और उसकी एक नाबालिग बेटी भी है।
भरोसा टूटने के बाद ब्लैकमेलिंग और तस्वीरें वायरल
रिश्ते में कड़वाहट तब आई जब आरोपी की पत्नी को इस संबंध की भनक लग गई। इसके बाद, पीड़िता और आरोपी ने आपसी सहमति से एक-दूसरे से मिलना बंद कर दिया। आरोपी ने दावा किया कि उसने महिला की सभी निजी तस्वीरें और वीडियो अपने फोन से हमेशा के लिए मिटा (delete) दिए हैं।
लेकिन जांच में यह दावा पूरी तरह झूठा साबित हुआ। कुछ ही दिनों बाद, आरोपी ने वॉट्सऐप (WhatsApp) पर महिला को एक धमकी भरा संदेश भेजा। उसने चेतावनी दी कि यदि वह किसी और के साथ संबंध बढ़ाती है, तो वह उसकी निजी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देगा। इसके बाद, आरोपी ने उन आपत्तिजनक फोटो और वीडियो को इंटरनेट पर वायरल कर दिया।
अदालत की सख्त टिप्पणी: “शुरू से ही थी गलत नीयत”
आरोपी को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार करते हुए न्यायमूर्ति चांडक ने कहा कि आरोपी के पास पीड़िता की निजी तस्वीरें खींचने और उन्हें इंटरनेट पर सार्वजनिक करने की कोई कानूनी या नैतिक वजह नहीं थी।
जस्टिस चांडक ने अपने आदेश में कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि शुरू से ही आरोपी की नीयत पीड़िता की तस्वीरों और वीडियो का दुरुपयोग करने की थी। इस तरह आरोपी ने पीड़िता द्वारा किए गए भरोसे का गलत इस्तेमाल किया। आरोपी के इस कृत्य ने पीड़िता की पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी है। पहली नजर में यह पूरी तरह से बलात्कार का मामला बनता है।”
हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी ने तस्वीरें डिलीट करने का सिर्फ “दिखावा” किया था, जबकि हकीकत में उसने उन्हें लीक कर दिया। चूंकि यह संवेदनशील सामग्री इंटरनेट पर व्यापक रूप से साझा की जा चुकी है, इसलिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के मुख्य स्रोत तक पहुंचने और जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए पुलिस हिरासत में आरोपी से पूछताछ आवश्यक है।

