इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लोक अदालत को नहीं है तलाक देने का अधिकार, आपसी समझौते को डिक्री मानना गैरकानूनी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSA) के पास तलाक की डिक्री देने या शादी को समाप्त करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शादी को कानूनी रूप से भंग करने की विशेष शक्ति केवल ‘फैमिली कोर्ट’ (पारिवारिक न्यायालयों) के पास ही सुरक्षित है। लोक अदालतों की भूमिका केवल पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझाने और समझौता कराने तक सीमित है, वे कोई न्यायिक निर्णय नहीं दे सकतीं।

क्या था पूरा मामला?

यह ऐतिहासिक फैसला न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए. के. चौधरी की खंडपीठ ने ३० अप्रैल को दिया। कोर्ट उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा साल 2018 में पारित एक आदेश को चुनौती देने वाली महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

याचिकाकर्ता महिला का आरोप था कि उसके पति ने उन्नाव डीएलएसए के समक्ष हुए एक समझौते को ही तलाक की आधिकारिक डिक्री मान लिया था। इतना ही नहीं, पति ने इसी समझौते को कानूनी आधार मानकर दूसरी शादी भी कर ली थी।

उन्नाव डीएलएसए की इस प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून स्पष्ट रूप से लोक अदालतों को तलाक देने से रोकता है, तो इस तरह के आदेश जारी करना सीधे तौर पर उनके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन (Jurisdictional Overreach) है। कोर्ट ने समझौते की उस शर्त को पूरी तरह से शून्य और अवैध घोषित कर दिया, जिसमें दोनों पक्षों को फिर से शादी करने की छूट दी गई थी।

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लोक अदालतों की कानूनी सीमाएं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले का आधार कानूनी प्रावधानों को बनाते हुए कहा कि ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987’ और ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009’ के तहत तलाक से जुड़े वैवाहिक विवादों को न्यायिक फैसले के लिए लोक अदालतों में नहीं भेजा जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट तौर पर तीन बड़ी बातें कहीं:

  • इस मामले में किसी भी सक्षम न्यायालय द्वारा कभी भी तलाक की कोई वैध डिक्री जारी नहीं की गई थी।
  • समझौते को तलाक के कानूनी प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का पति का दावा कानून की नजर में पूरी तरह अमान्य है।
  • त्वरित और सुलभ न्याय सुनिश्चित करने में लोक अदालतें बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें अपने वैधानिक दायरे में रहकर ही काम करना होगा। वे नियमित अदालतों के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकतीं।
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पूरे उत्तर प्रदेश में लागू होगा निर्देश

मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने पीड़ित महिला को उचित कानूनी माध्यमों से अपने अधिकारों के लिए आगे कदम उठाने की छूट दी है।

इसके साथ ही, भविष्य में इस तरह की गंभीर कानूनी भूलों को रोकने के लिए खंडपीठ ने कड़ा कदम उठाया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस फैसले की एक प्रति राज्य की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (DLSAs) को भेजी जाए, ताकि वे भविष्य में इसके दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन कर सकें।

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