तीन दशक पुराने वाहन किराया विवाद का सुप्रीम कोर्ट ने कराया पटाक्षेप, विद्युत मंडल के दावे के पूर्ण निस्तारण के लिए ₹62 लाख देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के एक वाहन किराया अनुबंध से जुड़े लंबे समय से लंबित विवाद का निपटारा करते हुए मध्य प्रदेश विद्युत मंडल को उसके दावे के पूर्ण निस्तारण के लिए ₹62 लाख देने का निर्देश दिया है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि इस राशि के भुगतान से लगभग तीन दशक से चल रहा मुकदमा समाप्त हो जाएगा। कोर्ट ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जमा राशि को विद्युत मंडल के पक्ष में जारी करने का भी निर्देश दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत 22 अप्रैल 1992 को हुए एक अनुबंध से हुई थी। इस अनुबंध के तहत मध्य प्रदेश विद्युत मंडल ने अपने स्वामित्व वाले दो ट्रैक्टर-ट्रेलर किराये पर दिए थे। इनमें से एक की क्षमता 100 मीट्रिक टन और दूसरे की 50 मीट्रिक टन थी। इनके लिए क्रमशः ₹55,000 और ₹35,000 मासिक किराया निर्धारित किया गया था।

विद्युत मंडल के अनुसार, प्रतिवादियों ने प्रारंभ में नियमित रूप से किराया अदा किया, लेकिन जून 1994 से उन्होंने यह कहते हुए किराये में छूट की मांग शुरू कर दी कि वे मंडल को सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। बकाया किराया नहीं मिलने पर विद्युत मंडल ने 1 अगस्त 1998 को वसूली का मुकदमा दायर किया।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने दावे का विरोध किया और यह कहते हुए ₹73,19,372 की प्रतिदावा याचिका दाखिल की कि परिवहन बिलों के रूप में यह राशि उन्हें देय थी। विद्युत मंडल ने इस प्रतिदावे का भी विरोध किया।

ट्रायल कोर्ट के समक्ष क्या तथ्य आए

साक्ष्यों से पता चला कि ट्रैक्टर अमेरिका में वर्ष 1982 में निर्मित हुए थे, जबकि ट्रेलर भारत में वर्ष 1979 में बनाए गए थे। दोनों वाहनों का पंजीकरण वर्ष 1982 में हुआ था और खरीद के समय उनकी कुल कीमत लगभग ₹50 लाख थी।

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मामले में यह भी सामने आया कि 100 मीट्रिक टन क्षमता वाले वाहन का फिटनेस प्रमाणपत्र 25 मार्च 1992 तक और 50 मीट्रिक टन क्षमता वाले वाहन का फिटनेस प्रमाणपत्र 25 मार्च 1991 तक ही वैध था। इसके बाद इन्हें नवीनीकृत कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया क्योंकि इन वाहनों को “ऐज़ इज़ वेयर इज़” आधार पर बेचने का इरादा था। दोनों पक्षों के बीच हुआ अनुबंध तीन वर्ष की अवधि के लिए था।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का फैसला

30 जुलाई 2011 को ट्रायल कोर्ट ने विद्युत मंडल के पक्ष में डिक्री पारित की। कोर्ट ने प्रतिवादियों को वाहनों का अवमूल्यित मूल्य ₹23,02,932.28 अदा करने का निर्देश दिया। इसके अलावा ₹23,56,752 बकाया किराया 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित तथा वाहनों की वापसी तक ₹90,000 प्रति माह क्षतिपूर्ति 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का भी आदेश दिया।

ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों के प्रतिदावे को समय-सीमा से बाधित मानते हुए खारिज कर दिया।

इसके खिलाफ दायर प्रथम अपील में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी।

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सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही

विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करते समय सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रयास करने को कहा था। साथ ही डिक्री के निष्पादन पर रोक के लिए प्रतिवादियों को ₹20 लाख जमा करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि मध्यस्थता सफल नहीं हो सकी।

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपने-अपने तर्क रखे। इसके बाद उन्होंने मामले के निस्तारण को कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया, क्योंकि कोर्ट ने संकेत दिया था कि विवाद को अब अंतिम रूप से समाप्त किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि जिन वाहनों को किराये पर दिया गया था वे वर्ष 1979 और 1982 के बने हुए थे। उनके फिटनेस प्रमाणपत्र भी 1991 और 1992 में समाप्त हो चुके थे और उनका नवीनीकरण नहीं कराया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2011 में इन वाहनों का अवमूल्यित मूल्य लगभग ₹23 लाख माना था।

पीठ ने यह भी दर्ज किया कि अपील लंबित रहने के दौरान प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट में ₹12 लाख जमा किए थे। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन में ₹50 लाख और जमा किए जा चुके थे।

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कोर्ट ने कहा:

“मामले के समग्र परिदृश्य को देखते हुए और दोनों पक्षों के प्रतिद्वंद्वी तर्कों का विस्तृत मूल्यांकन किए बिना, हमारी राय में न्याय के उद्देश्य की पूर्ति तभी होगी जब वादी को उसके दावे के संबंध में ₹62,00,000 की राशि प्रदान की जाए, ताकि लगभग तीन दशकों से लंबित यह पूरा विवाद समाप्त हो सके।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित डिक्री के पूर्ण संतोष और निस्तारण के लिए विद्युत मंडल ₹62 लाख पाने का हकदार होगा।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रथम अपील में हाईकोर्ट के पास जमा ₹12 लाख तथा उस पर अर्जित ब्याज विद्युत मंडल को जारी किया जाए। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा ₹50 लाख और उस पर अर्जित ब्याज भी विद्युत मंडल को जारी किया जाए।

इन्हीं निर्देशों के साथ विशेष अनुमति याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एम/एस शिवहरे रोडलाइन्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश विद्युत मंडल

वाद संख्या: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 5432 वर्ष 2026

पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी एवं जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर

निर्णय की तिथि: 26 मई 2026

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