PM आवास के पास से झुग्गी हटाने का मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से पूछा- पुनर्वास वाली जगह पर स्कूल और मुफ्त सफर की क्या है व्यवस्था?

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास (लोक कल्याण मार्ग) के पास स्थित तीन झुग्गी बस्तियों को हटाने और उनके पुनर्वास को लेकर बड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ किया है कि प्रभावित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं की सुरक्षा के बिना दूर-दराज के इलाकों में नहीं भेजा जा सकता। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को एक व्यापक हलफनामा (अफ़िडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें सरकार को यह साबित करना होगा कि टिकरी बॉर्डर के पास ‘सावदा घेवरा’ नामक पुनर्वास स्थल पर स्कूल, बिजली और परिवहन जैसी पर्याप्त व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने अगली सुनवाई गर्मी की छुट्टियों के दौरान, यानी 4 जून को तय की है।

सुरक्षा चिंताएं बनाम बुनियादी मानवाधिकार

यह कानूनी विवाद लोक कल्याण मार्ग के पास स्थित तीन प्रमुख झुग्गी बस्तियों से जुड़ा हुआ है:

  • भाई राम कैंप
  • डीआईडी (DID) कैंप
  • मस्जिद कैंप

केंद्र सरकार का पक्ष है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इन झुग्गियों को हटाना बेहद जरूरी है। सरकार के मुताबिक, ये बस्तियां एक सक्रिय वायु सेना स्टेशन (Air Force Station) के बेहद करीब और संवेदनशील सुरक्षा घेरे के भीतर आती हैं। रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत और सुरक्षित करने के लिए इन अनधिकृत ढांचों को हटाना अनिवार्य है।

इससे पहले, बीते 11 मई को एकल न्यायाधीश (Single Judge Bench) ने निवासियों को 15 दिनों के भीतर जगह खाली करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ निवासियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। उनका कहना है कि सरकार उन्हें जिस सावदा घेवरा इलाके में भेज रही है, वहां बिजली, पानी, साफ-सफाई और स्कूलों जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। राहत देते हुए हाईकोर्ट ने फिलहाल निवासियों के खिलाफ किसी भी तरह की जबरन या दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा रखी है।

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शिक्षा और मुफ्त सफर को लेकर कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से विस्थापित होने वाले बच्चों की शिक्षा और लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि सावदा घेवरा इलाके में इस समय कितने सरकारी या सक्रिय स्कूल हैं और वहां कितने शिक्षक तैनात हैं।

यद्यपि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने अदालत को आश्वस्त किया कि आसपास कई ऐसे स्कूल हैं जहां इन बच्चों का आसानी से दाखिला कराया जा सकता है, लेकिन कोर्ट ने इस बात को लिखित दस्तावेज के रूप में रिकॉर्ड पर लाने को कहा है।

इसके अलावा, दूर-दराज के इलाके में जाने से विस्थापितों के दैनिक जीवन और रोजगार पर असर न पड़े, इसके लिए कोर्ट ने मुफ्त यात्रा के इंतजामों की पूरी योजना मांगी है। केंद्र सरकार ने इस संबंध में दो प्रस्ताव अदालत के सामने रखे हैं:

  1. दिल्ली परिवहन निगम (DTC): सरकार ने संकेत दिया कि विस्थापितों को एक साल के लिए नवीनीकरण योग्य (Renewable) मुफ्त बस पास जारी किए जा सकते हैं।
  2. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC): चूंकि दिल्ली मेट्रो में मुफ्त यात्रा की कोई सीधे नीति नहीं है, इसलिए सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) विस्थापितों की यात्रा के खर्च की राशि सीधे मेट्रो प्रबंधन को रीइंबर्स (भुगतान) कर देगा।
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“उन्हें भेड़ियों के आगे नहीं फेंका जा सकता”

विस्थापित परिवारों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ने पुनर्वास योजना की तीखी आलोचना की। उन्होंने दलील दी कि गरीब और कमजोर परिवारों को शहर से इतनी दूर टिकरी बॉर्डर पर भेज देना उन्हें उनकी आजीविका से पूरी तरह काटने जैसा है। उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाते हुए कहा कि “इन नागरिकों को इस तरह भेड़ियों के आगे नहीं फेंका जा सकता” और मांग की कि इनका पुनर्वास वर्तमान स्थान से $5\text{ किलोमीटर}$ के दायरे में ही किया जाना चाहिए।

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इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वे इस विकल्प पर भी गंभीरता से विचार करें।

अब 4 जून को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र सरकार को शिक्षा, परिवहन और बुनियादी सुविधाओं को लेकर अपनी पुख्ता कार्ययोजना अदालत के समक्ष रखनी होगी, जिसके बाद ही झुग्गियों को हटाने की प्रक्रिया पर आगे कोई फैसला लिया जा सकेगा।

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