इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने प्रेम संबंधों के टूटने को ‘शादी के झूठे वादे’ पर आधारित बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने आरोपी के खिलाफ दर्ज आरोप-पत्र (charge-sheet), संज्ञान आदेश (cognizance order) और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत संबंध की शुरुआत से ही धोखा देने की थी, तब तक बाद में शादी से मुकर जाने को सहमति को दूषित (vitiate) करने वाली ‘तथ्य की गलतफहमी’ (misconception of fact) नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गोरखपुर जिले के पिपराइच थाने में 30 मार्च 2024 को दर्ज कराई गई एक प्राथमिकी (FIR) से शुरू हुआ था। केस क्राइम नंबर 238/2024 के तहत आरोपी संजय उर्फ संजय कश्यप पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (बलात्कार), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पीड़िता का आरोप था कि वह करीब एक साल पहले एक शादी समारोह में आरोपी से मिली थी। आरोपी ने उसे एक मोबाइल फोन उपहार में दिया, जिसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। पीड़िता के अनुसार, आरोपी ने उसके परिवार के सामने शादी का वादा किया था, जिसके आधार पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने। बाद में जब उसने शादी के लिए दबाव डाला, तो आरोपी टालमटोल करने लगा, जान से मारने की धमकी दी और अंततः शादी करने से मना कर दिया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि 26 मार्च 2024 को जब वह आरोपी के घर गई, तो उसके साथ मारपीट की गई।
जांच के दौरान पीड़िता का बयान दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज किया गया। ओसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी परीक्षण) में पीड़िता की उम्र 20 से 21 वर्ष के बीच (वयस्क) पाई गई। धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में पीड़िता ने कहा कि आरोपी उसे अपने दोस्त के घर ले गया था जहां उसने जबरन शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बयान के अंत में उसने यह भी कहा कि वह अभी भी आरोपी से शादी करना चाहती है।
पुलिस ने 9 जून 2024 को आरोप-पत्र दाखिल किया, जिस पर गोरखपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 8 फरवरी 2025 को संज्ञान लिया। इसके खिलाफ आरोपी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
दोनों पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता (आरोपी) के वकील की दलीलें: आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि यह एफआईआर पूरी तरह से झूठी और आपसी संबंध बिगड़ने का परिणाम है। पीड़िता खुद एक साल से आरोपी के संपर्क में थी, जो यह साबित करता है कि यह एक सहमति से बना रिश्ता था। एफआईआर में कथित बलात्कार की तारीख, समय या स्थान का कोई उल्लेख नहीं था। इसके अलावा, पीड़िता के धारा 161 और धारा 164 के बयानों में कई विरोधाभास और विसंगतियां थीं। मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई थी, इसलिए इस मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
विपक्षी (पीड़िता) और राज्य सरकार के वकील की दलीलें: पीड़िता के वकील और अपर सरकारी अधिवक्ता (A.G.A.) ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आरोपी ने शादी का झूठा झांसा देकर पीड़िता का एक साल तक शारीरिक शोषण किया। उनका कहना था कि आरोपी की शादी करने की कोई वास्तविक मंशा नहीं थी और उसका वादा शुरू से ही दुर्भावनापूर्ण था। जब पीड़िता ने शादी की मांग की, तो उसके साथ मारपीट की गई और धमकी दी गई। चूंकि जांच में आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत मिले हैं, इसलिए याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 528 (जो पूर्व में Cr.P.C. की धारा 482 थी) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों के प्रयोग पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम चौधरी भजन लाल (AIR 1992 SC 605) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि दर्ज आरोप प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं दर्शाते या मुकदमा दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से दर्ज कराया गया हो, तो कोर्ट कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
कोर्ट ने इस कानूनी बिंदु को स्पष्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई हालिया फैसलों का विश्लेषण किया:
- महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) और प्रशांत बनाम दिल्ली एनसीटी राज्य (2025): इनमें माना गया कि लंबे समय तक बने रहने वाले शारीरिक संबंधों को केवल शादी के वादे का नतीजा नहीं माना जा सकता, और सहमति से रहने वाले जोड़े के ब्रेकअप को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।
- समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025): सुप्रीम कोर्ट ने असफल रिश्तों को आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति की कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि हर टूटे रिश्ते को बलात्कार में बदलना इस गंभीर अपराध की संवेदनशीलता को कम करता है और आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक लगाता है।
- प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019): इस फैसले में ‘शादी के झूठे वादे’ (शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत) और ‘शादी के वादे को पूरा न कर पाने’ (परिस्थितिजन्य विफलता) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया था।
इन सिद्धांतों को इस मामले पर लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
“प्रत्येक विवाह के वादे को तब तक सहमति के लिए तथ्य की गलतफहमी (misconception of fact) नहीं माना जाएगा, जब तक कि यह स्थापित न हो जाए कि ऐसा विवाह का वादा आरोपी की ओर से संबंध की शुरुआत से ही एक झूठा वादा था।”
आगे कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“एक बार जब कोई वादा सद्भावना (good faith) से किया गया हो और बाद में परिस्थितियों में बदलाव के कारण विभिन्न अन्य कारणों से दोनों पक्षों के बीच संबंध खराब हो गए हों, तो वादे के ऐसे उल्लंघन को शारीरिक संबंध स्थापित करने की सहमति के उद्देश्य से तथ्य की गलतफहमी नहीं माना जाएगा।”
वयस्क महिलाओं की कानूनी समझ पर टिप्पणी करते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा:
“जब एक सक्षम आयु की महिला, विवाह के वादे के आधार पर उन शारीरिक गतिविधियों के परिणामों और जोखिमों को अच्छी तरह समझती है जिनमें वह शामिल है, तो वह जानती है कि विवाह और केवल विवाह के वादे के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है।”
पीड़िता के आचरण पर कोर्ट ने गौर किया कि धारा 164 के तहत दर्ज बयान में उसने आरोपी से शादी करने की इच्छा व्यक्त की थी:
“पीड़िता ने धारा 164 Cr.P.C. के तहत दर्ज अपने बयान में इच्छा जताई थी कि वह आवेदक से शादी करना चाहती है। उसके बयान से ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़िता द्वारा एफआईआर केवल आवेदक पर शादी के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई थी।”
अदालत ने पाया कि मारपीट, गलत तरीके से बंधक बनाने और धमकी देने के आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई भी ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला उन “दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों” की श्रेणी में आता है जहां कानूनी कार्यवाही को जारी रखना निरर्थक और न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा।
तदनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी संजय उर्फ संजय कश्यप की याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट/सिविल जज जूनियर डिवीजन-14, गोरखपुर की अदालत में लंबित केस नंबर 159 of 2025 (केस क्राइम नंबर 238 of 2024) की पूरी आपराधिक कार्यवाही, 9 जून 2024 की पुलिस चार्जशीट और 8 फरवरी 2025 के संज्ञान आदेश को पूरी तरह से निरस्त (quash) कर दिया।
केस का विवरण
- केस का शीर्षक: संजय उर्फ संजय कश्यप बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस नंबर: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 29363 of 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह
- फैसले की तारीख: 20 मई, 2026

