उत्तर प्रदेश की लुप्त होती विरासत: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, 3500 से अधिक असुरक्षित ऐतिहासिक स्थलों पर सरकार से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने की दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। राज्य भर में हजारों ऐतिहासिक स्मारकों की जर्जर हालत और प्रशासनिक उपेक्षा को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का अंतिम समय दिया है।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने सोमवार को यह आदेश पारित किया। कोर्ट का यह सख्त रुख तब सामने आया है जब याचिका में यह दावा किया गया कि राज्य की बेशकीमती और ऐतिहासिक विरासतें उचित रखरखाव न होने के कारण तेजी से जमींदोज हो रही हैं।

सरकारी आंकड़ों में दर्ज, पर धरातल पर बेहाल: आंकड़ों की जुबानी संकट

धरोहर और संस्कृति संरक्षक व वकील आकाश वशिष्ठ द्वारा दायर इस याचिका में उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की गई है। याचिका में झांसी, वृंदावन, आगरा, लखनऊ और हस्तिनापुर जैसे ऐतिहासिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों में स्थित 5,416 धरोहर स्थलों के तत्काल संरक्षण की मांग की गई है।

दस्तावेजों और आंकड़ों के विश्लेषण से प्रशासनिक लापरवाही की एक बड़ी खाई उजागर होती है:

  • 3,500 ऐतिहासिक स्थल राज्य पुरातत्व विभाग के आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड में तो दर्ज हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान में कोई सक्रिय सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिल रहा है।
  • रिकॉर्ड में दर्ज इन 3,500 साइटों में से केवल 212 स्थलों को ही राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित किया गया है।
  • शेष हजारों ऐतिहासिक संरचनाएं और प्राचीन स्थल पूरी तरह लावारिस हालत में छोड़ दिए गए हैं, जहां अतिक्रमण और समय की मार के कारण उनका अस्तित्व खतरे में है।
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“इन्वेंट्री तैयार करे सरकार” — कोर्ट में उठी तत्काल राहत की मांग

सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की कानूनी टीम का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता संजय उपाध्याय ने अदालत से इन स्मारकों के अस्तित्व को बचाने के लिए अंतरिम निर्देश जारी करने की मांग की। उनके साथ वकील पवन कुमार तिवारी, ईशा कृष्ण और मानसी बचानी भी कोर्ट में उपस्थित रहे।

संजय उपाध्याय ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकार को सबसे पहले उन 3,500 धरोहर स्थलों की विस्तृत ‘इन्वेंट्री’ (सूचीकरण) बनाने का काम तुरंत शुरू करना चाहिए, जिन्हें विभाग खुद अपने रिकॉर्ड में स्वीकार करता है लेकिन जिन पर कोई सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए हैं। याचिका में चेतावनी दी गई है कि “यूपी की अनमोल धरोहरें गायब हो रही हैं और खंडहर में तब्दील हो रही हैं,” जिन्हें यदि अभी नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास से पूरी तरह कट जाएंगी।

जवाबदेही के दायरे में कई प्रमुख मंत्रालय और विभाग

इससे पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में 23 मार्च को प्रारंभिक नोटिस जारी कर संबंधित विभागों को आठ सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा था। तय समय-सीमा बीत जाने के बाद भी जवाब दाखिल न होने पर कोर्ट ने अब छह सप्ताह की कड़ी मोहलत दी है।

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कोर्ट ने जिन प्रमुख प्रतिवादियों से हलफनामा (Counter-Affidavit) मांगा है, उनमें शामिल हैं:

  • केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)
  • राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण
  • केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय
  • केंद्रीय आवास और शहरी मामलों का मंत्रालय
  • उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग

अब सबकी नजरें इन विभागों द्वारा छह सप्ताह के भीतर दाखिल किए जाने वाले जवाबों पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी एजेंसियां इन हजारों लावारिस ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए क्या ठोस कार्ययोजना कोर्ट के समक्ष पेश करती हैं।

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