KG बेसिन गैस विवाद: रिलायंस और केंद्र के बीच कोर्ट के बाहर समझौते की उम्मीद, सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई तक टाली सुनवाई

देश के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े एक बेहद चर्चित और अरबों डॉलर के कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन गैस विवाद में एक बड़ा मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और केंद्र सरकार के बीच आपसी समझौते (Conciliation) की संभावनाओं को देखते हुए मामले की सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ्ते तक के लिए टाल दी है।

यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने लिया, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं। कोर्ट ने दोनों पक्षों की आपसी सहमति से विवाद को सुलझाने की इच्छा का स्वागत किया है।

बातचीत से समाधान का नया रास्ता

अदालत में सुनवाई के दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ को सूचित किया कि कंपनी ने सरकार के समक्ष इस विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा है।

इस पर सरकार की प्रतिक्रिया देते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार इस द्विपक्षीय समाधान प्रक्रिया पर विचार करने के लिए पूरी तरह तैयार है और उसे इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं है।

अदालत ने दोनों पक्षों के इस सकारात्मक रुख की सराहना की। सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा:

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“यदि आपसी बातचीत से इस विवाद का समाधान निकलता है, तो हमें बेहद खुशी होगी। अगर आप किसी समझौते पर पहुंच जाते हैं, तो हम इस अपील का निपटारा कर देंगे।”

न्यायालय का यह लचीला रुख पिछली सुनवाई से काफी अलग है। इससे पहले, बीती 20 मई को सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कंपनी और उसके साझेदारों द्वारा मध्यस्थता की कोशिशों का हवाला देकर सुनवाई को कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध किया गया था।

क्या है पूरा विवाद और इसका कानूनी सफर?

यह पूरा मामला रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और उसके दो विदेशी साझेदारों—बीपी एक्सप्लोरेशन (अल्फा) लिमिटेड और निको (नेको) लिमिटेड द्वारा दायर अपीलों से जुड़ा है।

ये कंपनियां दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) के 14 फरवरी, 2025 के उस फैसले को चुनौती दे रही हैं, जिसने सिंगल-जज पीठ के पिछले आदेश को रद्द कर दिया था। सिंगल-जज पीठ ने पूर्व में कंपनियों के पक्ष में आए एक मध्यस्थता फैसले (Arbitral Award) को सही ठहराया था।

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मुख्य आरोप: इस विवाद की जड़ में केंद्र सरकार का वह आरोप है, जिसके अनुसार रिलायंस और उसके कॉर्पोरेट साझेदारों ने केजी बेसिन में अपने तय ब्लॉक के पास स्थित अन्य भंडारों से कथित तौर पर अवैध रूप से गैस निकाली (Siphoning) थी, जिसे निकालने का उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जुलाई के मध्य तक का समय दिए जाने के बाद, अब सबकी निगाहें रिलायंस और केंद्र सरकार के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं पर टिकी हैं। यदि यह कोशिश सफल रहती है, तो देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट-सरकारी कानूनी विवादों में से एक का अंत अदालती दहलीज के बाहर हो सकता है।

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