उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवाद में मूकदर्शक बने रहने या हस्तक्षेप न करने मात्र से पति के रिश्तेदारों पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि “केवल सामान्य और अस्पष्ट (omnibus) आरोपों के आधार पर, जिनका कोई विशिष्ट तथ्यात्मक आधार न हो, पति के हर रिश्तेदार के खिलाफ आपराधिक कानून को गतिशील करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पति के परिवार के सदस्यों (ननद, सास, देवर और देवरानी) द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और घरेलू हिंसा के मामले को रद्द कर दिया। न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर खंडपीठ) के उन दो आदेशों को खारिज कर दिया, जिसमें उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने और मामलों को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद शिकायतकर्ता सपना धाकड़ और उनके पति दिव्यराज धाकड़ के बीच वैवाहिक मतभेदों से उपजा था। दोनों का विवाह 19 नवंबर, 2019 को हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके पिता ने विवाह के समय ₹31 लाख नकद, ₹10 लाख के सोने के आभूषण और अन्य घरेलू सामान दहेज के रूप में दिए थे।
शिकायतकर्ता ने 13 जनवरी, 2023 को मध्य प्रदेश के गुना पुलिस स्टेशन में पति और उनके चार रिश्तेदारों (अपीलकर्ताओं) के खिलाफ प्राथमिकी (FIR संख्या 41/2023) दर्ज कराई। यह प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 34 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 व 4 के तहत दर्ज की गई थी। पुलिस जांच के बाद कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी थी।
इसके अतिरिक्त, शिकायतकर्ता ने 4 अप्रैल, 2023 को वन स्टॉप सेंटर (महिला सेल), गुना के माध्यम से घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) की धारा 12 के तहत उन्हीं रिश्तेदारों के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, गुना ने 6 अप्रैल, 2023 को इस पर संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू कर दी थी।
इन दोनों कार्यवाहियों को रद्द कराने के लिए अपीलकर्ताओं ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया था। उच्च न्यायालय ने 21 नवंबर, 2024 को दोनों याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) सामग्री मौजूद है और आरोप “विशिष्ट और सीधे” हैं। इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर की थीं।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (ससुराल पक्ष) की ओर से:
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि उन्हें केवल पति का रिश्तेदार होने के कारण झूठा फंसाया गया है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से सामान्य और अस्पष्ट हैं, जिनमें किसी विशिष्ट कृत्य का उल्लेख नहीं है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने निम्नलिखित बिंदु उठाए:
- यह प्राथमिकी पूरी तरह से प्रतिशोधात्मक है, क्योंकि पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की याचिका दायर करने के तुरंत बाद इसे दर्ज कराया गया था।
- शिकायतकर्ता ने अपनी तलाक याचिका में स्वयं स्वीकार किया है कि वह श्योपुर में अपने पति के सरकारी आवास में रहती थी, जबकि अपीलकर्ता शिवपुरी में अलग रहते थे। इसलिए, उनके बीच कोई घरेलू संबंध या “साझा गृहस्थी” (shared household) स्थापित नहीं होती।
शिकायतकर्ता और राज्य सरकार की ओर से:
शिकायतकर्ता और मध्य प्रदेश राज्य के वकीलों ने उच्च न्यायालय के फैसलों का समर्थन किया। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
- प्राथमिकी और घरेलू हिंसा की शिकायत में दर्ज आरोप संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
- वैवाहिक विवादों से संबंधित शिकायतों में शुरुआती स्तर पर प्रत्येक छोटी घटना के विस्तृत और संपूर्ण विवरण की उम्मीद नहीं की जा सकती।
- दहेज की मांग, शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना और घर से निकालने के आरोप ऐसे तथ्य हैं, जिनकी सत्यता का निर्धारण केवल मुकदमे (Trial) के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन से ही हो सकता है।
उच्चतम न्यायालय का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी, घरेलू हिंसा की शिकायत और शिकायतकर्ता द्वारा दायर तलाक याचिका के बयानों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया। न्यायालय ने अपने विश्लेषण में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए:
1. मुख्य आरोप केवल पति के विरुद्ध
अदालत ने पाया कि शारीरिक शोषण, गाली-गलौज, कमरे में छिपे हुए कैमरे और रिकॉर्डिंग डिवाइस लगाने, लाइसेंसशुदा पिस्तौल से धमकाने और विवाहेतर संबंध के संदेह जैसे गंभीर आरोप विशेष रूप से पति दिव्यराज धाकड़ के खिलाफ और उनके श्योपुर स्थित आवास से संबंधित थे।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
“इनमें से कोई भी आरोप वर्तमान अपीलकर्ताओं पर नहीं लगाया गया है।”
2. अपीलकर्ताओं पर केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप
अदालत ने पाया कि चारों अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप केवल सामान्य और सतही प्रकृति के थे। प्राथमिकी में केवल यह कहा गया था कि वे “प्रताड़ित करते थे” या पति का समर्थन करते थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आरोप यह नहीं दर्शाते कि किस अपीलकर्ता ने किस अवसर पर, किसकी उपस्थिति में, या किस तरीके से धारा 498A आईपीसी के तहत क्रूरता का कोई विशिष्ट कृत्य किया या मांग की।”
अलग-अलग अपीलकर्ताओं के संदर्भ में न्यायालय का निष्कर्ष इस प्रकार रहा:
- विक्रम धाकड़ (देवर): शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने टिप्पणी की थी कि “घर में मेहमान आते रहते हैं” और श्योपुर के बजाय शिवपुरी में रहने पर सवाल उठाया था। कोर्ट ने इसे केवल एक “घरेलू असहमति” माना, जो क्रूरता या अवैध दहेज मांग की श्रेणी में नहीं आती।
- आरती मेहता (ननद): इनके खिलाफ केवल यह आरोप था कि शिकायतकर्ता द्वारा पति के दुर्व्यवहार की जानकारी दिए जाने पर इन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। इस पर कोर्ट ने ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए कहा:
“पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद में हस्तक्षेप करने में केवल विफलता, क्रूरता या दहेज की मांग में सक्रिय भागीदारी के किसी विशिष्ट आरोप के बिना, अपने आप में आपराधिक दायित्व को आकर्षित नहीं कर सकती।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता रक्षाबंधन के त्योहार पर खुद अपनी ननद (आरती मेहता) के साथ स्वेच्छा से यात्रा कर चुकी थीं, जो निरंतर प्रताड़ना के आरोपों को कमजोर करता है। - श्रीवती बाई धाकड़ (सास) और मनीषा धाकड़ (जिठानी): इनके खिलाफ “छोटी बातों पर अपमान करने और पैसे मांगने” के बेहद सामान्य आरोप थे, जिनमें तारीख, स्थान या विशिष्ट मांग का कोई विवरण नहीं था।
अदालत ने ससुराल के सदस्यों की कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
“सक्रिय भागीदारी दर्शाने वाले विशिष्ट आरोपों के अभाव में केवल पति के साथ पारिवारिक संबंध होना या वैवाहिक विवाद में शिकायतकर्ता का समर्थन न करना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।”
3. चार्जशीट के बाद भी मामले को रद्द करने का अधिकार
राज्य सरकार के इस तर्क पर कि जांच पूरी होकर चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट ने आनंद कुमार मोहत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली) मामले का संदर्भ दिया। कोर्ट ने दोहराया कि चार्जशीट दाखिल होने मात्र से उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट को कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए धारा 482 CrPC के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता।
4. निचली अदालत की धारा 319 CrPC के तहत शक्तियां सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यवाही रद्द करने का अर्थ यह नहीं है कि अपीलकर्ताओं को “स्थायी रूप से दोषमुक्त” कर दिया गया है। यदि पति के खिलाफ चलने वाले मुकदमे के दौरान कोई ठोस सबूत सामने आता है, तो ट्रायल कोर्ट के पास उन्हें धारा 319 CrPC (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 358) के तहत समन करने और सह-आरोपी बनाने की पूरी शक्ति सुरक्षित है।
अदालत ने एमसीडी बनाम राम किशन रोहतागी मामले का हवाला दिया, जिसमें स्थापित किया गया था कि शुरुआती चरण में कार्यवाही रद्द होने के बावजूद अतिरिक्त साक्ष्य मिलने पर बाद में संबंधित व्यक्तियों को मुकदमे के लिए बुलाया जा सकता है।
5. दोहरे खतरे (Double Jeopardy) का सिद्धांत लागू नहीं होगा
अदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया कि क्या भविष्य में धारा 319 CrPC के तहत की जाने वाली कार्यवाही संविधान के अनुच्छेद 20(2) और CrPC की धारा 300 के तहत ‘दोहरे दंड’ या ‘दोहरे खतरे’ के सिद्धांत से बाधित होगी।
संविधान पीठ के फैसलों एस.ए. वेंकतरमन बनाम भारत संघ और टी.पी. गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में दोहरा खतरा लागू नहीं होता क्योंकि:
- अपीलकर्ताओं ने कभी भी पूर्ण मुकदमे का सामना नहीं किया है; न तो आरोप तय हुए और न ही किसी गवाह की जांच हुई।
- प्रारंभिक चरण में तकनीकी आधार पर मामला रद्द करना ‘गुण-दोष के आधार पर दोषमुक्ति’ (acquittal on merits) नहीं है।
- “अनुच्छेद 20(2) और CrPC की धारा 300 का संरक्षण तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि अपीलकर्ताओं को सक्षम न्यायालय द्वारा सजा या बरी किए जाने के फैसले के साथ समाप्त होने वाले पूर्ण मुकदमे का सामना न करना पड़ा हो।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 21 नवंबर, 2024 के निर्णयों को निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने अपीलकर्ताओं—आरती मेहता, श्रीवती बाई धाकड़, मनीषा धाकड़ और विक्रम धाकड़—के खिलाफ गुना पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी (FIR संख्या 41/2023), उससे संबंधित चार्जशीट और न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित घरेलू हिंसा के मामले (D.V. शिकायत संख्या 1752/2023) को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने अंत में दो मुख्य बातें स्पष्ट कीं:
- मुख्य आरोपी पति (दिव्यराज धाकड़) के खिलाफ मुकदमा बिना किसी बाधा के जारी रहेगा।
- यदि मुकदमे के दौरान कोई विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य मिलता है, तो निचली अदालत अपीलकर्ताओं को धारा 319 CrPC के तहत पुनः समन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आरती मेहता एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या… वर्ष 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 18345/2024 से उत्पन्न) तथा क्रिमिनल अपील संख्या… वर्ष 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 1234/2025 से उत्पन्न)
पीठ: न्यायमूर्ति संजय करोल, न्यायमूर्ति नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह
दिनांक: 25 मई, 2026

