सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जमानत रद्दीकरण आदेश और आरोपी के फरार रहने के रवैये पर विचार किए बिना हाईकोर्ट दोबारा जमानत नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज करते हुए, हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट के आरोपों का सामना कर रहे आरोपी जीशान की जमानत रद्द कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले जमानत रद्दीकरण आदेश पर विचार न करके, गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी के बाद के फरार रहने के आचरण की अनदेखी करके और सह-आरोपी के साथ समानता (पैरिटी) के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू करके कानून की गंभीर भूल की है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शिकायतकर्ता/सूचनाकर्ता मोहसीन द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए आरोपी को तुरंत ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद अपीलकर्ता के भाई आमिर की हत्या से जुड़ी घटनाओं के सिलसिले से शुरू हुआ था, जिसके संबंध में थाना परतापुर, जिला मेरठ में आईपीसी की धारा 302 (हत्या) सहित अन्य धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) संख्या 143/2023 दर्ज की गई थी। इस हत्या के मामले में सह-आरोपी आबाद और औरंगजेब को बाद में 12 नवंबर 2025 को दोषी ठहराया गया और 14 नवंबर 2025 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

27 फरवरी 2024 को, जब अपीलकर्ता मेरठ की ट्रायल कोर्ट में हत्या के मामले की सुनवाई में शामिल हो रहा था, तब कोर्ट परिसर के भीतर ही सह-आरोपी आबाद और औरंगजेब ने आमिर हत्याकांड में समझौता न करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी। इस घटना के संबंध में थाना सिविल लाइंस, जिला मेरठ में आईपीसी की धारा 506 के तहत प्राथमिकी संख्या 67/2024 दर्ज की गई थी।

मौजूदा मामला 12 मई 2024 को हुई एक अन्य घटना से संबंधित है। अपीलकर्ता के चाचा रिहान और चचेरे भाई अफसर जब पड़ोसी गाँव से घर लौट रहे थे, तब औरंगजेब, आबाद, जीशान (प्रतिवादी नंबर 2), अरबाज और शाहनवाज ने उन्हें रास्ते में रोक लिया। आरोपियों ने पीड़ितों को गाली दी, धमकी दी और आमिर हत्याकांड को वापस लेने की मांग की। प्राथमिकी (FIR संख्या 179/2024) और घायलों के बयानों के अनुसार, आरोपियों ने पीड़ितों पर लाठी, डंडे, चाकू और तमंचे (देशी पिस्तौल) से हमला किया। जब पीड़ित अपनी जान बचाने के लिए अपने घरों की ओर भागे, तो आरोपियों ने जबरन उनके घर में घुसकर हमला जारी रखा।

घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी फुटेज में जीशान मोटरसाइकिल पर आते हुए, अपने घर में घुसकर देशी पिस्तौल निकालते हुए और सड़क पर उसे लहराते हुए दिखाई दिया। इसके बाद, फुटेज में वह बगल के घर की छत पर पिस्तौल लेकर जाता दिखा, जिसके बाद कई राउंड हवाई फायरिंग की आवाज रिकॉर्ड हुई। चश्मदीदों ने स्पष्ट बयान दिया कि जीशान ने जान से मारने की नीयत से उन पर गोलियां चलाईं, हालांकि गोलियां उन्हें नहीं लगीं और कोई भी घायल नहीं हुआ। बाद में जीशान ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि उसने फायरिंग की थी और पिस्तौल छिपा दी थी। उसके बताने पर पुलिस ने .315 बोर की पिस्तौल और जिंदा कारतूस बरामद किए, जिसके बाद आर्म्स एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गईं।

गिरफ्तारी के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2024 को जीशान को यह कहते हुए नियमित जमानत दे दी थी कि उसकी भूमिका “अस्पष्ट और सामान्य” थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी 2025 को अपने एक आदेश में उस जमानत को रद्द करते हुए कहा था:

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“हमारा यह मानना है कि हाईकोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 2 (जीशान) द्वारा दायर आवेदन को स्वीकार करके गंभीर भूल की। हाईकोर्ट ने प्राथमिकी में आरोपी-प्रतिवादी नंबर 2 को सौंपी गई विशिष्ट भूमिका की अनदेखी की। कोर्ट ने यह दर्ज करने में गलती की कि आरोपी प्रतिवादी नंबर 2 को एक अस्पष्ट और सामान्य भूमिका सौंपी गई थी…”

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तुरंत आत्मसमर्पण करने के निर्देश के बावजूद, जीशान ने सरेंडर नहीं किया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 10 फरवरी 2025 को गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया और 28 फरवरी 2025 को सीआरपीसी की धारा 82 के तहत उद्घोषणा की कार्रवाई शुरू की। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के लगभग 42 दिनों बाद 10 मार्च 2025 को जीशान ने आत्मसमर्पण किया।

ट्रायल कोर्ट द्वारा उसकी दूसरी जमानत याचिका खारिज होने के बाद, जीशान ने फिर से हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2025 को एफआईआर दर्ज करने में सात घंटे की देरी, कोई चोट न लगने और सह-आरोपी औरंगजेब के साथ समानता (पैरिटी) के आधार पर उसे दोबारा जमानत दे दी। अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता की दलीलें:

  • हाईकोर्ट अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 27 जनवरी 2025 के पूर्व जमानत रद्दीकरण आदेश पर विचार करने में पूरी तरह विफल रहा।
  • जमानत रद्द होने के बाद आरोपी का आचरण कानून की अवहेलना करने वाला रहा; वह फरार हो गया और अदालती कार्रवाई (NBW और धारा 82) के बाद ही उसने आत्मसमर्पण किया।
  • सीसीटीवी फुटेज और हथियार की बरामदगी उसकी सक्रिय संलिप्तता को पुख्ता करते हैं।
  • वारदात के पीछे मुख्य उद्देश्य मुख्य हत्या के मामले के गवाहों को डराना था, जिससे गवाहों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

उत्तर प्रदेश राज्य की दलीलें:

  • जांच से आरोपी जीशान की सक्रिय भूमिका साबित होती है। चश्मदीदों के बयान और सीसीटीवी फुटेज इसकी पुष्टि करते हैं।
  • मामले में आरोप तय हो चुके हैं और सुनवाई शुरुआती चरण में है, जिसमें अभी 12 गवाहों का परीक्षण होना बाकी है।
  • राज्य ने अजवार बनाम वसीम व अन्य (2024) मामले का हवाला देते हुए कहा कि बिना ठोस कारण या विकृत आधार पर दिया गया जमानत आदेश हमेशा हस्तक्षेप के योग्य होता है।
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प्रतिवादी नंबर 2 (आरोपी जीशान) की दलीलें:

  • उसे कभी औपचारिक रूप से “भगोड़ा अपराधी” घोषित नहीं किया गया था, क्योंकि उसने धारा 82 के आदेश के 12 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण कर दिया था।
  • आत्मसमर्पण में देरी इसलिए हुई क्योंकि उसने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर की थी, जो उसके कानून के प्रति सम्मान को दर्शाती है।
  • सीसीटीवी फुटेज में उसे किसी पर सीधे गोली चलाते हुए नहीं दिखाया गया है।
  • पीड़ितों को केवल मामूली चोटें आई थीं, इसलिए आईपीसी की धारा 307 का अपराध नहीं बनता है।
  • इस मामले में एक क्रॉस-एफआईआर भी दर्ज है, जिसमें आरोपी पक्ष के सदस्य भी घायल हुए थे।
  • सह-आरोपी औरंगजेब को जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता (पैरिटी) का सिद्धांत उसके पक्ष में लागू होता है।

अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने का आदेश कानून की गंभीर त्रुटि से ग्रस्त है और इसमें जमानत देने और रद्द करने के स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की गई है।

1. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व रद्दीकरण आदेश की अनदेखी

पीठ ने रेखांकित किया कि हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का संज्ञान लेने में विफल रहा जिसके तहत पहली जमानत रद्द की गई थी। अदालत ने टिप्पणी की:

“हालांकि इस न्यायालय द्वारा पहले रद्द की गई जमानत के बाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को जमानत देने पर कोई पूर्ण रोक नहीं है, लेकिन जमानत देने के पीछे ऐसे कारण होने चाहिए जो या तो परिस्थितियों में बदलाव दर्शाते हों या ऐसे नए आधारों की उपस्थिति दिखाते हों जिन पर इस न्यायालय ने रद्दीकरण के समय विचार नहीं किया था।”

2. फरार रहने का आचरण और आत्मसमर्पण में देरी

अदालत ने आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पुनर्विचार याचिका लंबित होने के कारण वह आत्मसमर्पण नहीं कर पाया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका दायर करने से मूल आदेश पर स्वतः रोक नहीं लग जाती। अजवार बनाम वसीम व अन्य (2024) 10 SCC 768 का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

“पीड़ित पक्ष द्वारा आवेदन दायर किए जाने पर जमानत आदेश को रद्द करने के लिए अपीलीय अदालत के समक्ष विचारणीय बिंदुओं में कोई भी ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियां शामिल हैं जो आरोपी को राहत दिए जाने के बाद उत्पन्न हुई हों, और जमानत पर रहने के दौरान आरोपी का आचरण…”

अदालत ने पाया कि आरोपी ने 42 दिनों तक कानून की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की, जिससे ट्रायल कोर्ट को कड़े कदम उठाने पड़े।

3. चोट न लगने पर भी धारा 307 आईपीसी का लागू होना

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शरीर पर गोली की चोट न लगने मात्र से धारा 307 आईपीसी का आरोप खारिज नहीं हो जाता:

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“इस न्यायालय ने लगातार यह स्पष्ट किया है कि आईपीसी की धारा 307 के लिए केवल इस इरादे या ज्ञान के साथ कार्य किया जाना आवश्यक है कि इससे मृत्यु हो सकती है। यदि कोई आरोपी जान से मारने के इरादे या इस ज्ञान के साथ पीड़ित पर हथियार चलाता है कि इससे उसकी जान जा सकती है, लेकिन पीड़ित संयोग से बच जाता है, तो आईपीसी की धारा 307 के तहत अपराध का गठन माना जाएगा।”

4. समानता (पैरिटी) के सिद्धांत का गलत अनुप्रयोग

पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा सह-आरोपी औरंगजेब के साथ आरोपी जीशान की समानता मानने को पूरी तरह गलत करार दिया। औरंगजेब की भूमिका मुख्य रूप से चाकू से हमले की थी, जबकि जीशान पर पिस्तौल से फायरिंग करने का विशिष्ट आरोप था। इसके अलावा, जीशान के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत भी आरोप हैं। नीरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) 16 SCC 508 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि समानता का सिद्धांत कोई तय नियम नहीं है और इसे यांत्रिक रूप से वहां लागू नहीं किया जा सकता जहां आरोपियों की भूमिकाएं पूरी तरह भिन्न हों।

5. गवाहों को खतरा और बिना कारण के आदेश

गवाहों को डराने-धमकाने के व्यापक संदर्भ पर प्रकाश डालते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सुधा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2021) 4 SCC 781 का हवाला दिया:

“इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, यहां तक कि अपराध के आरोपी व्यक्ति की भी, लेकिन अदालतों के लिए यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि यदि ऐसे आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है तो पीड़ितों/गवाहों के जीवन और स्वतंत्रता को संभावित खतरा हो सकता है।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट का आदेश महिपाल बनाम राजेश कुमार (2020) और प्रशांत कुमार सरकार बनाम आशीष चटर्जी (2010) के निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप एक तर्कसंगत और विस्तृत आदेश की श्रेणी में नहीं आता।

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार की और 22 सितंबर 2025 के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

जीशान को दी गई जमानत निरस्त कर दी गई है और उसे तुरंत ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। यदि वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो ट्रायल कोर्ट को उसकी कस्टडी सुनिश्चित करने के लिए गैर-जमानती वारंट (NBW) सहित आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: मोहसीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • मामला संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या… वर्ष 2026 (विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 16696/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
  • दिनांक: 22 मई, 2026

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