138 NI Act | केवल चेक जारी होना और उसका बाउंस होना पर्याप्त नहीं, कानूनी रूप से प्रवर्तनीय कर्ज साबित करना जरूरी: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 (चेक बाउंस) से जुड़े एक मामले में आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के आदेश की पुष्टि की है। जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने आपराधिक अपील को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता यह स्थापित करने में विफल रहा कि चेक किसी कानूनी रूप से प्रवर्तनीय कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए जारी किए गए थे। हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच का वित्तीय लेनदेन किसी मित्रवत कर्ज के बजाय उनके बीच एक पोंजी स्कीम (चिट फंड) में आपसी संलिप्तता से जुड़ा था। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को कानूनी मांग नोटिस की उचित तामीली नहीं हुई थी, क्योंकि आरोपी ने अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए घर से बाहर होने की बात को साबित कर दिया था, जिससे नोटिस तामीली की कानूनी धारणा का सफलतापूर्वक खंडन हो गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अपीलकर्ता अनूप अग्रवाल द्वारा प्रतिवादी के खिलाफ सहायक अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM), तेहट्टा, नदिया की अदालत में दायर की गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। यह शिकायत परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 और 142 के तहत दर्ज की गई थी।

अपीलकर्ता के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच अच्छे मित्रवत संबंध थे। प्रतिवादी के अनुरोध पर, अपीलकर्ता ने उसकी व्यक्तिगत जरूरत के लिए ₹3,00,000/- का नकद कर्ज दो गवाहों की मौजूदगी में दिया था। प्रतिवादी ने तीन महीने के भीतर इस राशि को वापस करने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में भुगतान टालने लगा। कथित तौर पर, 25 जून 2012 को प्रतिवादी ने अपीलकर्ता के घर जाकर एचडीएफसी बैंक लिमिटेड (बहरामपुर शाखा) के दो चेक जारी किए: चेक संख्या 294127 (राशि ₹1,00,000/-) और चेक संख्या 294126 (राशि ₹2,00,000/-), दोनों पर 26 जून 2012 की तारीख अंकित थी।

अपीलकर्ता ने दोनों चेकों को 26 जून 2012 को भारतीय स्टेट बैंक, कृष्णानगर (गोपीनाथपुर) शाखा में जमा कर दिया। बैंक द्वारा “अपर्याप्त धनराशि” (insufficiency of funds) होने के कारण दोनों चेक वापस कर दिए गए।

इसके बाद, 20 जुलाई 2012 को अपीलकर्ता ने अपने वकील के माध्यम से पावती रसीद (A/D) के साथ पंजीकृत डाक से मांग नोटिस भेजा। डाक लिफाफा 7 अगस्त 2012 को “7 दिनों से अनुपस्थित” (7 days absent) की टिप्पणी के साथ वापस आ गया। प्रतिवादी द्वारा नोटिस मिलने के बाद भी कोई भुगतान नहीं किया गया, जिसके चलते शिकायत दर्ज कराई गई। प्रतिवादी ने आत्मसमर्पण किया, जमानत प्राप्त की, और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 251 के तहत आरोपों को खारिज करते हुए मुकदमे का सामना करने का दावा किया।

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सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने खुद की और एक अन्य गवाह स्वपन कुमार रानू (P.W. 2) की गवाही दर्ज कराई। प्रतिवादी का परीक्षण CrPC की धारा 313 के तहत किया गया, और अनंत मंडल ने प्रतिवादी के पक्ष में गवाही दी (D.W. 2)। सभी पक्षों को सुनने के बाद, न्यायिक मजिस्ट्रेट, तेहट्टा ने 19 दिसंबर 2013 को प्रतिवादी को बरी करने का आदेश पारित किया, जिसे अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता के वकील ने निम्नलिखित दलीलें प्रस्तुत कीं:

  • प्रतिवादी ने चेकों पर अपने हस्ताक्षर और उन्हें जारी करने के तथ्य से कभी इनकार नहीं किया है।
  • मांग नोटिस निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर भेजा गया था, जिससे एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत कानूनी धारणा स्थापित होती है।
  • प्रतिवादी ने जानबूझकर नोटिस की तामीली से बचने की कोशिश की, जिसके कारण डाक लिफाफा “7 दिनों से अनुपस्थित” की टिप्पणी के साथ लौटा।
  • प्रतिवादी यह साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं दे सका कि चेक किसी मौजूदा कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए जारी नहीं किए गए थे।

अपीलकर्ता ने अपने दावों के समर्थन में निम्नलिखित निर्णयों का हवाला दिया:

  1. हितेन पी. दलाल बनाम ब्रतीन्द्रनाथ बनर्जी (AIR 2001 SC 3987)
  2. डी. विनोद शियप्पा बनाम नंदा बेलप्पा ((2006) 2 SCC 114)
  3. सुब्रत मित्र बनाम अल्पना दास (2025 (2) AICLR 273 (Cal))
  4. संजय अग्रवाल बनाम अजोय सरकार (CRA 20 of 2021) में एकल पीठ का अनिर्णित फैसला।

प्रतिवादी के तर्क

प्रतिवादी के वकील ने अपीलकर्ता के दावों का कड़ा विरोध करते हुए तर्क किया:

  • बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील पर विचार करते समय हाईकोर्ट को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
  • चेकों को 25 जून 2012 को जारी बताया गया और अगले ही दिन यानी 26 जून 2012 को उन्हें बैंक में प्रस्तुत कर दिया गया, जो एक असामान्य जल्दबाजी को दर्शाता है।
  • शिकायतकर्ता ने कर्ज से संबंधित कोई लिखित समझौता पत्र या रसीद पेश नहीं की।
  • शिकायतकर्ता ने स्वयं यह स्वीकार किया कि चेक कर्ज के बदले नहीं, बल्कि व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए दिए गए थे।
  • दोनों पक्ष “TVI Express” नामक एक चिट फंड (पोंजी स्कीम) व्यवसाय में एजेंट के रूप में शामिल थे। प्रतिवादी के अनुसार, दो साल पहले बिना तारीख के खाली चेक व्यावसायिक उपयोग के लिए दिए गए थे, जिन्हें व्यवसाय बंद होने के बाद अपीलकर्ता ने साजिश के तहत बैंक में प्रस्तुत कर दिया।
  • प्रतिवादी ने गवाही से साबित किया कि वह 21 जुलाई 2012 से सिलीगुड़ी में अपनी बीमार मां की देखभाल कर रहा था, जिससे यह साबित होता है कि उसने जानबूझकर नोटिस लेने से परहेज नहीं किया।
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प्रतिवादी ने एन. विजय कुमार बनाम विश्वनाथ राव एन. (2025 SCC Online SC 873) के फैसले पर भरोसा जताया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले का मूल्यांकन दो मुख्य आधारों पर किया: मांग नोटिस की तामीली और वैध कानूनी देनदारी का अस्तित्व।

1. मांग नोटिस की तामीली की कानूनी स्थिति

कोर्ट ने जनरल क्लॉज एक्ट की धारा 27 के संदर्भ में नोटिस की तामीली से जुड़ी कानूनी धारणा का विश्लेषण किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले (डी. विनोद शियप्पा बनाम नंदा बेलप्पा) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने माना कि यद्यपि कोई बेईमान पक्ष जानबूझकर तामीली से बचकर कानूनी कार्यवाही को विफल नहीं कर सकता, लेकिन तामीली की इस धारणा को खंडित किया जा सकता है।

इस मामले में, प्रतिवादी ने गवाह (D.W. 2) के माध्यम से यह साबित कर दिया कि नोटिस जारी होने के समय वह अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए 15 दिनों तक सिलीगुड़ी में था। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“डाक विभाग की यह टिप्पणी थी कि संबंधित व्यक्ति 7 दिनों से अनुपस्थित था और इसलिए इसे ‘तामील’ (served) नहीं माना जा सकता। आरोपी ने मुकदमे के दौरान यह साबित कर दिया कि अपनी मां की बीमारी के कारण वह उपस्थित नहीं था, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उसने जानबूझकर और जान-बूझकर उक्त नोटिस की तामीली से परहेज किया। अपीलकर्ता ने आगे नोटिस भेजने का कोई और प्रयास नहीं किया।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता ने डाक अधिकारियों के माध्यम से प्रतिवादी के इस दावे को झूठा साबित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

2. कानूनी रूप से प्रवर्तनीय कर्ज बनाम चिट फंड लेनदेन

कोर्ट ने ₹3,00,000/- के कथित मित्रवत नकद कर्ज के दावे की गहन समीक्षा की। क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के दौरान, मुख्य गवाह स्वपन कुमार रानू (P.W. 2) ने स्वीकार किया कि उसके सामने कोई पैसा नहीं दिया गया था और वह लेनदेन का समय या तारीख भी नहीं बता सका। स्वयं शिकायतकर्ता भी कर्ज देने की तारीख या महीना स्पष्ट करने में असमर्थ रहा।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“…किसी भी समझौते की अनुपस्थिति में और जब शिकायतकर्ता वह तारीख, समय या महीना साबित करने में विफल रहा जब उसने ऐसा कर्ज दिया था, और इसके साथ ही चेक प्रस्तुत करने में दिखाई गई जल्दबाजी निश्चित रूप से अदालत के मन में यह संदेह पैदा करती है कि वास्तव में वह राशि दी भी गई थी या नहीं…”

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस निष्कर्ष को सही पाया कि दोनों पक्ष “TVI Express” नामक एक पोंजी स्कीम का हिस्सा थे। इस तरह के चिट फंड व्यवसायों में अधिकारियों द्वारा चेक जारी किया जाना असामान्य नहीं है।

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3. सबूत का भार स्थानांतरित होने का सिद्धांत

कोर्ट ने एनआई एक्ट की धारा 118(ए) और धारा 139 का विश्लेषण किया, जिसके तहत चेक धारक के पक्ष में शुरुआत में धारणा बनती है। मल्लावरपु कासीविश्वेश्वर राव बनाम तड़ीकोंडा रामुलु और भारत बैरल एंड ड्रम निर्माण कंपनी के मामलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को केवल “संभावनाओं की प्रबलता” (preponderance of probabilities) के आधार पर अपना बचाव पक्ष साबित करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ के फैसले (रंगप्पा बनाम श्रीमोहन) का हवाला देते हुए कोर्ट ने उल्लेख किया:

“इसलिए, यदि आरोपी एक ऐसा संभावित बचाव (probable defence) पेश करने में सक्षम होता है जो कानूनी रूप से प्रवर्तनीय कर्ज या देनदारी के अस्तित्व पर संदेह पैदा करता है, तो अभियोजन पक्ष विफल हो सकता है।”

इस मामले के तथ्यों पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के प्रावधानों को इस मामले में आकर्षित नहीं किया जा सकता, क्योंकि शिकायतकर्ता/अपीलकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा कि चेक दराज (drawer) द्वारा किसी वैध कानूनी कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए ही जारी किया गया था।”

कोर्ट का निर्णय

कलकत्ता हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 139 के तहत लागू वैधानिक धारणाओं का सफलतापूर्वक खंडन किया है। तदनुसार, हाईकोर्ट को अपील में कोई दम नजर नहीं आया।

अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने आदेश दिया:

“तदनुसार, यह आपराधिक अपील (CRA) खारिज की जाती है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित बरी करने के आदेश की पुष्टि की जाती है।”

इसके साथ ही, मामले से जुड़े अन्य सभी आवेदनों का निपटारा कर दिया गया और निचली अदालत के रिकॉर्ड को वापस भेजने का निर्देश दिया गया।

केस का विवरण

  • केस का शीर्षक: अनूप अग्रवाल बनाम योतोन्स बिस्वास
  • केस संख्या: CRA 94 OF 2014
  • पीठ: जस्टिस चैताली चटर्जी दास
  • दिनांक: 18.05.2026

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