बॉम्बे हाईकोर्ट ने एडवोकेट शेखर जगताप, पूर्व आईपीएस अधिकारी व पुलिस कमिश्नर संजय पांडे, पूर्व पुलिस अधिकारियों सरदार पाटिल व मनोहर पाटिल, और डेवलपर्स श्यामसुंदर अग्रवाल, शरद अग्रवाल तथा किशोर भालेराव के खिलाफ दर्ज दो प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और उनसे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया है।
चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम सुंदर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि दूसरे प्रतिवादी संजय मिश्रिमल पुनामिया द्वारा दायर की गई शिकायतें पूरी तरह से तुच्छ, दुर्भावनापूर्ण और “एक हताश और प्रतिशोधी दिमाग का परिणाम” थीं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन एफआईआर को दर्ज कराना कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग था, जिसका एकमात्र उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यक्तिगत दुश्मनी का हिसाब कुकता करना था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद डेवलपर श्यामसुंदर अग्रवाल और शिकायतकर्ता संजय मिश्रिमल पुनामिया के बीच दर्ज कई क्रॉस-शिकायतों और एफआईआर से जुड़ा है। मुख्य रूप से हाईकोर्ट के समक्ष निम्नलिखित दो मामलों को रद्द करने की मांग की गई थी:
- CR No. 742 of 2024 (ठाणे नगर पुलिस थाना): यह एफआईआर 26 अगस्त 2024 को आईपीसी की धारा 166A, 120B, 170, 193, 195, 199, 203, 205, 207, 352, 355, 384, 389, 465, 466, 471 और 506 के तहत दर्ज की गई थी। पुनामिया का आरोप था कि संजय पांडे, शेखर जगताप, एसीपी सरदार पाटिल, पीआई मनोहर पाटिल, श्यामसुंदर अग्रवाल, शुभम अग्रवाल और शरद अग्रवाल ने मिलकर परमबीर सिंह को मुंबई के पुलिस कमिश्नर पद से हटाने और उन्हें व अन्य राजनीतिक नेताओं को झूठे मामलों में फंसाने की आपराधिक साजिश रची। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे अवैध रूप से हिरासत में लेकर परमबीर सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए डराया-धमकाया गया था।
- CR No. 46 of 2024 (कोलाबा पुलिस थाना): यह एफआईआर 3 मार्च 2024 को आईपीसी की धारा 170, 420, 465, 467, 468, 471, 474 और 120B के तहत एडवोकेट शेखर जगताप, श्यामसुंदर अग्रवाल, शरद अग्रवाल, किशोर भालेराव और अन्य के खिलाफ दर्ज की गई थी। इसमें मुख्य आरोप यह था कि शेखर जगताप ने एक फर्जी और गैर-मौजूद नियुक्ति पत्र के सहारे पुनामिया के खिलाफ कई अदालती मामलों (CR No. 299 of 2021 सहित) में विशेष लोक अभियोजक (SPP) के रूप में काम किया और इसके लिए सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर किया गया।
पुनामिया ने यह भी आरोप लगाया कि करीब एक दशक पुराने मामले, CR No. 201 of 2016 (शहरी भूमि सीलिंग प्रमाण पत्र फर्जीवाड़ा मामला, ठाणे नगर थाना) की जांच को दोबारा खोलकर उसे आरोपी बनाया गया और जगताप ने उसकी जमानत याचिका खारिज कराने के लिए बिना किसी अधिकार के एसपीपी के रूप में काम किया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं (Petitioners) की दलीलें
- एडवोकेट शेखर जगताप की ओर से: सीनियर एडवोकेट श्री राजीव शकधर ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि एफआईआर के आरोपों को पढ़ने मात्र से कोई संज्ञेय अपराध सिद्ध नहीं होता। उन्होंने कहा कि जगताप की विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्ति आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। पुनामिया की शिकायतें केवल जगताप के प्रति उनके निजी गुस्से को दर्शाती हैं क्योंकि उन्होंने पूर्व में पुनामिया की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया था।
- श्यामसुंदर व शरद अग्रवाल और संजय पांडे की ओर से: सीनियर एडवोकेट श्री मिहिर देसाई ने तर्क दिया कि आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं और केवल शिकायतकर्ता के मनगढ़ंत बयानों पर आधारित हैं, जो सिर्फ बदला लेने की भावना से प्रेरित हैं।
- अन्य याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने भी इन दलीलों का समर्थन करते हुए शिकायतों को पूरी तरह से तुच्छ और मनगढ़ंत बताया।
प्रतिवादियों (Respondents) की दलीलें
- महाराष्ट्र राज्य की ओर से: सीनियर एडवोकेट और विशेष लोक अभियोजक श्री सुदीप पासबोला और अतिरिक्त लोक अभियोजक ने याचिकाओं को खारिज करने का विरोध किया। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा कोलाबा थाना मामले में पहले ही कोर्ट के समक्ष ‘सी’ समरी रिपोर्ट (C-Summary Report) पेश की जा चुकी है।
- शिकायतकर्ता (संजय पुनामिया) की ओर से: एडवोकेट श्री रिजवान मर्चेंट ने दलील दी कि शेखर जगताप को एसपीपी के रूप में कभी वैध रूप से नियुक्त नहीं किया गया था और उन्होंने केवल श्यामसुंदर अग्रवाल को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए जाली आदेशों का उपयोग किया था। उन्होंने गृह विभाग के डेस्क ऑफिसर से प्राप्त एक आरटीआई (RTI) जवाब का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि 6 अगस्त 2021 के नियुक्ति आदेश की मूल प्रति सरकारी फाइलों में नहीं मिली। उन्होंने तर्क दिया कि इस पूरी साजिश की गहन पुलिस जांच होनी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
1. दुर्भावनापूर्ण मुकदमों की जांच में कोर्ट का दायित्व
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Sujay Ghosh v. The State of Jharkhand & Anr. (2026) का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब भी किसी आपराधिक कार्यवाही को दुर्भावनापूर्ण बताकर चुनौती दी जाती है, तो कोर्ट का दायित्व केवल एफआईआर की सतही बातों तक सीमित नहीं रहता। कोर्ट ने फैसले में उद्धृत किया:
“जब कोई आरोपी इस आधार पर एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग करता है कि ऐसी कार्यवाही स्पष्ट रूप से तुच्छ, कष्टप्रद या दुर्भावनापूर्ण है, तो कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह अधिक सावधानी से मामले की जांच करे। कोर्ट के लिए केवल एफआईआर/शिकायत में किए गए दावों को देखना ही यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि कथित अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं। तुच्छ या कष्टप्रद कार्यवाहियों में, कोर्ट का कर्तव्य है कि वह मामले के रिकॉर्ड से उभरने वाली कई अन्य परिस्थितियों पर भी ध्यान दे…”
2. विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की वैधता
हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि जगताप की नियुक्ति जाली दस्तावेजों पर आधारित थी। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर कई आधिकारिक सिफारिशें, गृह मंत्रालय के पत्र और सरकारी प्रस्ताव (दिनांक 29 जुलाई 2021, 9 अगस्त 2021, 23 सितंबर 2021 और 21 दिसंबर 2021) मौजूद हैं।
Court ने इस बात का न्यायिक संज्ञान लिया कि ये नियुक्तियां कोविड-19 महामारी के दौर में की गई थीं, जब मंत्रालय में केवल 10% कर्मचारी काम कर रहे थे और कई निर्णय मौखिक निर्देशों के बाद कार्योत्तर स्वीकृति (ex-post-facto approval) के माध्यम से लिए जा रहे थे। तत्कालीन गृह मंत्री दिलीप वलसे-पाटिल ने भी पत्र लिखकर पुष्टि की थी कि जगताप की नियुक्ति उनके निर्देशों पर हुई थी।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (इलस्ट्रेशन-e) और Narayan Govind Gavate & Ors. v. State of Maharashtra & Ors. (1977) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कानूनी सिद्धांत “omnia praesumuntur rite esse acta” को दोहराया, जिसके तहत सभी आधिकारिक और न्यायिक कार्यों को नियमित और सही तरीके से निष्पादित माना जाता है।
3. वकीलों के कदाचार की जांच केवल बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में
हाईकोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी वकील के पेशेवर कदाचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार पुलिस के पास नहीं है। चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने टिप्पणी की:
“महाराष्ट्र और गोवा की बार काउंसिल उन वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने के लिए अधिकृत संस्था है जो कदाचार करते हैं और उसके साथ पंजीकृत हैं। दूसरे प्रतिवादी द्वारा लगाए गए कदाचार के आरोपों की जांच पुलिस द्वारा अपनी तफ्तीश के दौरान नहीं की जा सकती है। शेखर जगताप के कथित कदाचार की कोई भी जांच बार काउंसिल के अधिकारों का अतिक्रमण करेगी। पुलिस द्वारा शेखर जगताप के कथित कदाचार की जांच करना कानूनन अस्वीकार्य है।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि किसी विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की वैधता का परीक्षण केवल रिट कोर्ट (Writ Court) द्वारा किया जा सकता है, न कि किसी निजी व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस द्वारा। इस संबंध में कोर्ट ने Shivaji s/o. Rajaram Tatke & Anr. और Omprakash Baheti & Ors. के मामलों पर भरोसा जताया।
4. आपसी रंजिश और कानून का दुरुपयोग
हाईकोर्ट ने पुनामिया को एक “आदतन मुकदमेबाज” बताया, जिसका श्यामसुंदर अग्रवाल के साथ पुराना विवाद रहा है। कोर्ट ने पाया कि पुनामिया ने इससे पहले जगताप की नियुक्ति की जांच के लिए एसआईटी (SIT) गठन की मांग वाली याचिका भी दायर की थी, जिसे अगस्त 2023 में वापस ले लिया गया था।
बेंच ने कहा:
“दूसरे प्रतिवादी द्वारा लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और उनमें तथ्यों की कमी है। ये आरोप पूरी तरह काल्पनिक हैं और पुलिस द्वारा दायर ‘सी’ समरी रिपोर्ट को देखते हुए झूठे साबित हुए हैं। दोनों मामलों (CR Nos. 742 of 2024 और 46 of 2024) में लगाए गए आरोप एक हताश और प्रतिशोधी दिमाग का नतीजा हैं और शिकायतकर्ता एक ऐसे मामले में खोजी जांच (fishing inquiry) की मांग कर रहा है जिसमें किसी जांच की आवश्यकता ही नहीं है।”
5. तीन साल की अत्यधिक और अस्पष्टीकृत देरी
हाईकोर्ट ने पाया कि जिन घटनाओं का जिक्र शिकायतकर्ता ने अपनी प्राथमिकी में किया है, वे 2021 की थीं, जबकि एफआईआर 2024 में दर्ज कराई गईं। Hasmukhlal D. Vora & Anr. v. State of Tamil Nadu (2022) के मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“…शिकायत दर्ज कराने में अत्यधिक और अस्पष्टीकृत देरी को आपराधिक शिकायत रद्द करने के लिए कोर्ट द्वारा एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जाना चाहिए। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत दर्ज कराने में की गई देरी कोर्ट को सतर्क करती है और आरोपों की बारीकी से जांच करने की मांग करती है…”
6. आपराधिक साजिश और अंतर्निहित शक्तियां
हाईकोर्ट ने State v. Nalini & Ors. (1999) का संदर्भ देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो आरोपियों के बीच किसी प्रकार की आपराधिक साजिश (आईपीसी की धारा 120-A) को साबित कर सके।
State of Andhra Pradesh v. Golconda Linga Swamy & Anr. (2004), R. P. Kapur v. The State Of Punjab (1960) और State of Haryana v. Bhajanlal (1992) के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दुर्भावना और निजी रंजिश से प्रेरित मामलों में अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए एफआईआर रद्द करना न्यायसंगत है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ इन मुकदमों को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा। बेंच ने सभी रिट याचिकाओं और आपराधिक आवेदन को स्वीकार करते हुए दोनों एफआईआर (CR No. 742 of 2024 और CR No. 46 of 2024) और उनसे संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। इसके साथ ही सभी लंबित अंतरिम आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: शेखर काकासाहेब जगताप बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (संबद्ध मामलों के साथ)
- केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 3839/2024 के साथ रिट पिटीशन नंबर 722/2024, रिट पिटीशन नंबर 737/2024, रिट पिटीशन नंबर 750/2024, रिट पिटीशन नंबर 4923/2024, रिट पिटीशन (स्टैम्प) नंबर 19375/2024 और क्रिमिनल आवेदन नंबर 1140/2024
- पीठ: चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस सुमन श्याम
- दिनांक: 20 मई 2026

