स्कूल, अस्पताल और एयरपोर्ट पर नहीं रहेंगे आवारा कुत्ते: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कहा— ‘जीवन का अधिकार’ सर्वोपरि

देश में तेजी से बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक और रेबीज के मामलों पर लगाम कसते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्कूल, अस्पताल और हवाई अड्डों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक और संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों की अनियंत्रित मौजूदगी नागरिकों के सुरक्षित जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने $19$ मई, $2026$ को फैसला सुनाते हुए अपने $7$ नवंबर, $2025$ के निर्देशों को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने इन संवेदनशील परिसरों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाने और उन्हें दोबारा उन्हीं जगहों पर न छोड़ने के सख्त निर्देश दिए हैं।

अदालत ने इस मुद्दे को महज पशु प्रबंधन का मामला न मानकर इसे सीधे संवैधानिक शासन से जोड़ा है। पीठ ने कहा कि सरकार की यह “अनिवार्य जिम्मेदारी” है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों—जैसे बच्चों, मरीजों और बुजुर्गों को ऐसी किसी भी रोकी जा सकने वाली चोट या बीमारी से बचाए।

आंकड़ों की भयावहता: तीन राज्यों में ही $4.8$ लाख से अधिक मामले

सुप्रीम कोर्ट ने देश में तेजी से बढ़ते डॉग बाइट (कुत्तों के काटने) के मामलों और रेबीज से होने वाली मौतों पर गहरी चिंता जताई है। केवल तीन राज्यों—तमिलनाडु, कर्नाटक और राजस्थान में ही साल $2026$ के शुरुआती महीनों में $4.8$ लाख से अधिक डॉग बाइट के मामले और $42$ मौतें दर्ज की गई हैं। अदालत ने इन आंकड़ों को इस समस्या के “भयावह रूप” को दिखाने वाला बताया है।

शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की, “इस तरह की घटनाओं से होने वाला नुकसान महज कागजी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इसके बेहद गंभीर मानवीय, सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम होते हैं।”

राज्यों से मिले आंकड़े इस गंभीर संकट की गवाही देते हैं:

  • तमिलनाडु: साल $2026$ के पहले चार महीनों में ही यहाँ लगभग $2.63$ लाख डॉग बाइट के मामले और रेबीज के कारण $17$ मौतें दर्ज की गईं। जनवरी और फरवरी में हर महीने करीब $62,000$ मामले सामने आए, जो मार्च में बढ़कर $71,000$ और अप्रैल में लगभग $68,000$ हो गए।
  • कर्नाटक: इसी अवधि के दौरान राज्य में $2$ लाख से अधिक मामले और रेबीज से $25$ मौतें हुईं। बेंगलुरु अर्बन में सबसे ज्यादा $6$ मौतें दर्ज की गईं। ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी में पालतू और आवारा कुत्तों द्वारा काटने की $13,400$ से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि विजयपुरा जिले में यह आंकड़ा लगभग $13,997$ रहा। राज्य में पिछले दो वर्षों में यह समस्या लगभग दोगुनी हो गई है—साल $2023$ में जहाँ $2.3$ लाख मामले थे, वहीं $2025$ में यह संख्या बढ़कर करीब $5$ लाख पहुंच गई।
  • राजस्थान: राज्य के विभिन्न जिलों से डराने वाले आंकड़े सामने आए हैं। श्रीगंगानगर में महज तीन महीनों के भीतर $1,840$ मामले दर्ज किए गए। उदयपुर में रिपोर्टिंग की तारीख तक इस साल लगभग $1,750$ मामले आ चुके थे। वहीं भीलवाड़ा में एक ही दिन में $42$ लोगों को आवारा कुत्तों ने अपना शिकार बनाया, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई। सीकर में भी बच्चों पर हुए हमलों ने व्यापक चिंता पैदा की है।
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हाई-सिक्योरिटी और संवेदनशील संस्थान भी असुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि जिन जगहों को पूरी तरह सुरक्षित और स्वच्छ होना चाहिए, वहां भी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।

यहाँ तक कि दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट जैसे हाई-सिक्योरिटी जोन भी इससे अछूते नहीं रहे हैं, जहाँ $1$ जनवरी, $2026$ से अब तक विभिन्न टर्मिनलों पर कम से कम $31$ घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।

अदालत ने कहा कि स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर आवारा कुत्तों का इस तरह घूमना प्रशासनिक ढिलाई और संबंधित विभागों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी को दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन संवेदनशील क्षेत्रों को सामान्य सड़कों या खुले सार्वजनिक स्थानों की तरह नहीं आंका जा सकता।

बड़ा विवाद: इंसानी सुरक्षा बनाम जीव कल्याण की बहस

इस कानूनी लड़ाई ने देश में एक पुरानी बहस को फिर से तेज कर दिया है। एक तरफ आम जनता की सुरक्षा के समर्थक हैं, तो दूसरी तरफ पशु अधिकार संगठन।

कड़े कदमों की वकालत करने वाले पक्षों का तर्क है कि भारत में आवारा कुत्तों की आबादी साल $2000$ के शुरुआती दशक के $2.5$ करोड़ से बढ़कर आज करीब $8$ करोड़ हो चुकी है। ऐसे में वर्तमान ‘नसबंदी और रिहाई’ (Sterilisation-and-release) का मॉडल पूरी तरह बेअसर साबित हो रहा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस संकट का सबसे ज्यादा शिकार गरीब तबका, बच्चे और बुजुर्ग होते हैं, जिनके पास तुरंत इलाज की बेहतर सुविधाएं नहीं होतीं।

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इसके विपरीत, पशु कल्याण संगठनों ने पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम, $2023$ का हवाला देते हुए तर्क दिया कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को वापस उसी इलाके में छोड़ना कानूनी रूप से जरूरी है ताकि वहां ‘वैक्यूम इफेक्ट’ (खाली जगह होने पर नए और हिंसक कुत्तों का आना) न पैदा हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि देश के प्रत्येक स्कूल से केवल $10$ कुत्ते भी हटाए गए, तो देश को $1.5$ करोड़ से अधिक कुत्तों के लिए आश्रय गृहों (shelters) की जरूरत पड़ेगी, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है। उन्होंने देहरादून का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन के कारण डॉग बाइट के मामलों में $68\%$ तक की कमी आई है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए साफ किया कि संवेदनशील संस्थानों को “कम्युनिटी डॉग” टेरिटरी के रूप में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। जानवरों के प्रति दया भाव रखना एक कानूनी कर्तव्य जरूर है, लेकिन इसे इंसानी सुरक्षा की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता।

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दो हफ्ते का अल्टीमेटम: कोर्ट ने दिए सख्त निर्देश

इस संकट से तुरंत निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़े निर्देश जारी किए हैं:

  1. परिसरों की घेराबंदी: सभी राज्यों को दो हफ्ते के भीतर अपने सभी स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों को चिन्हित कर उनकी उचित फेंसिंग (बाड़ लगाने) और गेट सुरक्षित करने के निर्देश दिए गए हैं।
  2. शेल्टर होम में स्थानांतरण: इन संवेदनशील क्षेत्रों में पाए जाने वाले सभी आवारा कुत्तों को तुरंत वहां से हटाकर उनका नसबंदी और टीकाकरण कराया जाए, और उन्हें सुरक्षित शेल्टर होम में भेजा जाए। उन्हें वापस उन्हीं परिसरों में छोड़ने पर पूरी तरह रोक होगी।
  3. दवाओं की उपलब्धता: सभी अस्पतालों के लिए एंटी-रेबीज वैक्सीन और इम्यूनोग्लोबुलिन का पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना अनिवार्य होगा।
  4. जागरूकता अभियान: स्कूलों में बच्चों को कुत्तों के व्यवहार, सुरक्षात्मक उपायों और काटने की स्थिति में तुरंत किए जाने वाले प्राथमिक उपचार के प्रति जागरूक करने के लिए नियमित सत्र आयोजित किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के शहरी विकास और नागरिक सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, जिसने संवेदनशील सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और पशु अधिकारों के बीच की सीमा रेखा को स्पष्ट कर दिया है।

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