घोषित क्षमता साबित न करने पर बिजली उत्पादकों पर लगेगा सख्त जुर्माना, ‘मेन्स रिया’ साबित करना आवश्यक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बिजली उत्पादक (पावर जनरेटर) स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (SLDC) द्वारा मांगे जाने पर अपनी घोषित क्षमता (Declared Capability) को प्रदर्शित करने में विफल रहता है, तो उस पर सख्त दीवानी दायित्व (Strict Civil Liability) लागू होगा। अदालत ने साफ किया कि स्टेट ग्रिड कोड के तहत यह विफलता ‘गेमिंग’ (गलत इरादे से अनुचित वित्तीय लाभ कमाना) से बिल्कुल अलग एक स्वतंत्र मामला है, और इसके लिए किसी जानबूझकर किए गए दुर्भावनापूर्ण इरादे या नाजायज वित्तीय लाभ कमाने के उद्देश्य (मेन्स रिया – Mens Rea) को साबित करना आवश्यक नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के फैसले को खारिज करते हुए पंजाब राज्य विद्युत नियामक आयोग (SERC) के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें स्टेट जनरेटिंग स्टेशन, तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (TSPL) पर जुर्माना लगाया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पंजाब स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (PSLDC) और पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSPCL) द्वारा दायर अपीलों से संबंधित है। इन अपीलों में APTEL के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने पंजाब SERC के जुर्माने के आदेश को पलट दिया था। SERC ने जनवरी 2017 में चार दिनों के लिए TSPL को ‘घोषित क्षमता की गलत घोषणा’ (misdeclaration of Declared Capacity) का दोषी पाया था।

शुरुआत में, PSLDC ने कुल पांच दिनों (10 अगस्त 2015, और 15, 17, 24 और 31 जनवरी 2017) के लिए गलत घोषणा का पता लगाया था। इसके आधार पर ज्ञापन संख्या 278 दिनांक 15 मार्च 2017 के माध्यम से कुल ₹162,74,72,865/- का जुर्माना लगाया गया था, जिसमें से ₹74,27,27,159/- रुपये लंबित बिलों से काट लिए गए थे।

इस पर आपत्ति जताते हुए बिजली उत्पादक कंपनी (TSPL) ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद, मामला पहले कमर्शियल एंड मीटरिंग कमेटी और फिर स्टेट ग्रिड कोड रिव्यू कमेटी के पास भेजा गया। वहां की कार्यवाही से असंतुष्ट होने पर, हाईकोर्ट के आदेश पर ही इस मामले को पुनः SERC को संदर्भित किया गया। SERC ने जनवरी 2017 की चार तारीखों पर गलत घोषणा के आरोपों की पुष्टि की, लेकिन अगस्त 2015 के आरोप को खारिज कर दिया। इसके बाद, APTEL ने इस आदेश को उलटते हुए गलत घोषणा के निष्कर्षों और जुर्माने को पूरी तरह से रद्द कर दिया था।

परिचालन और टैरिफ की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में दर्ज किया कि पंजाब राज्य में बिजली की मांग मौसमी जरूरतों के अनुसार बदलती रहती है। मई से सितंबर के दौरान धान के सीजन में मांग चरम पर होती है, जबकि अन्य महीनों में यह काफी कम हो जाती है।

दोनों पक्षों के बीच हुए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के शेड्यूल-7 के तहत टैरिफ को दो हिस्सों में विभाजित किया गया है:

  1. फिक्स्ड कैपेसिटी चार्ज (स्थिर शुल्क): यह उत्पादक की घोषित क्षमता (DC) यानी बिजली आपूर्ति के लिए उसकी उपलब्धता पर आधारित होता है।
  2. वेरिएबल एनर्जी चार्ज (परिवर्तनीय ऊर्जा शुल्क): यह आपूर्ति के लिए निर्धारित की गई वास्तविक बिजली पर दिया जाता है।

इस व्यवस्था के तहत, भले ही बिजली खरीदने वाली सरकारी कंपनी (PSPCL) घोषित क्षमता से कम बिजली लेती है, फिर भी उसे फिक्स्ड चार्ज का भुगतान करना पड़ता है। इस अंतर को “डीम्ड जनरेशन” कहा जाता है।

अनुबंध के अनुसार, वार्षिक रूप से 80% उपलब्धता का मानक तय किया गया है, जिसके लिए प्रोत्साहन (Incentives) और दंड (Disincentives) के नियम हैं:

  • प्रोत्साहन: शेड्यूल 7 के क्लॉज 1.2.4 के अनुसार, यदि वार्षिक उपलब्धता 85% से अधिक होती है, तो अतिरिक्त उपलब्धता पर 40% की दर से प्रोत्साहन राशि देय होती है।
  • दंड: क्लॉज 1.2.5 के तहत, यदि उपलब्धता 75% से कम होती है, तो अंतर की बिजली पर 20% की दर से जुर्माना लगाया जाता है।
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चूंकि ये वार्षिक प्रोत्साहन और स्थिर शुल्क उत्पादक की उपलब्धता घोषणा पर निर्भर करते हैं, इसलिए उत्पादक के पास अधिक से अधिक क्षमता घोषित करने का आर्थिक प्रलोभन होता है। ऐसे में कई बार उत्पादक अपनी वास्तविक क्षमता से अधिक की घोषणा कर देते हैं। इस तरह की गलत घोषणाओं को रोकने के लिए पंजाब स्टेट ग्रिड कोड, 2013 (SG Code) के तहत नियमों का प्रावधान किया गया है, जो SLDC को घोषित क्षमता की निगरानी करने और उल्लंघन पर जुर्माना लगाने का अधिकार देता है।

दिसंबर 2016 में कम उत्पादन का पैटर्न

यह विवाद तब शुरू हुआ जब PSLDC ने दिसंबर 2016 में देखा कि TSPL लगातार अपनी घोषित क्षमता से काफी कम वास्तविक बिजली उत्पादन कर रहा था।

19 दिसंबर 2016 को PSLDC की ओर से चेतावनी मिलने के बाद TSPL ने अपनी घोषित क्षमता को घटा दिया। इसके बाद 30 दिसंबर 2016 को फिर से ऐसा ही पैटर्न देखा गया, जिसमें एक समय में घोषित क्षमता से 27% कम उत्पादन दर्ज किया गया। उत्पादन बढ़ाने के बजाय कंपनी ने फिर से अपनी घोषित क्षमता को नीचे कर लिया।

SERC के विश्लेषण से पता चला कि दिसंबर 2016 में कुल 459 टाइम ब्लॉक्स (15-15 मिनट के अंतराल) में से 387 में TSPL आवश्यक बिजली देने में असमर्थ रहा, जो कुल समय का 84.13% था। इसी लगातार विफलता को देखते हुए जनवरी 2017 की चार तारीखों पर TSPL की वास्तविक क्षमता को जांचने के लिए प्रदर्शन नोटिस जारी किए गए थे।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (PSLDC और PSPCL) की दलीलें

PSLDC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एम.जी. रामचंद्रन ने दलील दी कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 32 के तहत SLDC के पास बिजली उत्पादन और ग्रिड संचालन की निगरानी के वैधानिक अधिकार हैं। ग्रिड कोड के अनुसार उत्पादकों के लिए अपनी क्षमता की सही घोषणा करना और उसे बनाए रखना अनिवार्य है।

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि कोई उत्पादक अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने में विफल रहता है, तो रेगुलेशन 11.3.13 के तहत सख्त दीवानी जुर्माना लगाया जाता है। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम धर्मेंद्र टेक्सटाइल प्रोसेसर्स मामले का हवाला हुए कहा कि दीवानी या संविदात्मक दायित्वों के उल्लंघन पर जुर्माना लगाने के लिए दुर्भावनापूर्ण मंशा या मेन्स रिया का होना आवश्यक नहीं है।

PSPCL की ओर से श्री शुभम आर्य ने इन दलीलों का समर्थन करते हुए कहा कि जुर्माने की इस राशि का लाभ अंततः उपभोक्ताओं को मिलता है क्योंकि इससे बिजली की दरों में कमी आती है।

प्रतिवादी (तलवंडी साबो पावर लिमिटेड – TSPL) की दलीलें

TSPL की ओर से श्री साजन पूवैय्या ने तर्क दिया कि पिछले 9 वर्षों में उनका ट्रैक रिकॉर्ड बिल्कुल साफ रहा है। उन्होंने कहा कि जिन तारीखों पर आरोप लगाए गए हैं, उन दिनों में भी कई अन्य टाइम ब्लॉक्स में घोषित क्षमता के अनुरूप बिजली दी गई थी, जो साबित करता है कि उनके पास पर्याप्त कोयला था और संयंत्र पूरी तरह चालू स्थिति में था।

TSPL ने निम्नलिखित प्रमुख दलीलें दीं:

  1. कोई समय सीमा नहीं: रेगुलेशन 11.3.13 में क्षमता प्रदर्शित करने के लिए कोई विशिष्ट टाइम ब्लॉक या समय सीमा तय नहीं है, इसलिए प्रदर्शन उसी दिन किसी भी समय किया सकता था।
  2. गेमिंग की मंशा आवश्यक: कोड के तहत जुर्माना तभी लग सकता है जब रेगुलेशन 11.3.12 के तहत ‘गेमिंग’ की पुष्टि हो, जिसके लिए अनुचित लाभ कमाने की गलत मंशा साबित होनी चाहिए।
  3. भेदभाव का आरोप: उन्होंने Nabha Power Limited का उदाहरण देते हुए दावा किया कि उस संयंत्र ने भी कई बार घोषित क्षमता से कम बिजली दी थी, लेकिन उस पर कोई जुर्माना नहीं लगाया गया।
  4. न्यायिक दृष्टांत: उन्होंने TPDDL बनाम PPCL मामले का हवाला देते हुए कहा कि गलत घोषणा तभी मानी जा सकती है जब कोयले की कमी हो या तकनीकी खराबी के कारण संयंत्र बंद हो। साथ ही PSEB बनाम CERC के आधार पर तर्क दिया कि 1% से कम का विचलन व्यावहारिक सीमाओं के भीतर है और इसे गेमिंग नहीं माना जा सकता।
  5. दोहरी व्याख्या का नियम: एक्सेल क्रॉप केयर लिमिटेड बनाम CCI मामले के आधार पर उन्होंने कहा कि यदि किसी दंडात्मक प्रावधान की दो व्याख्याएं संभव हों, तो अदालत को वह व्याख्या अपनानी चाहिए जो जुर्माना लगाने से बचाती हो।
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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे कानूनी ढांचे का गहराई से अध्ययन किया और ग्रिड कोड के तहत उल्लंघनों, 4th टाइम ब्लॉक के नियम और दीवानी दायित्व की प्रकृति को स्पष्ट किया।

1. ग्रिड कोड के तहत उल्लंघन के चार अलग-अलग पहलू

अदालत ने कहा कि ग्रिड कोड और शेड्यूलिंग नियमों के तहत उत्पादकों द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनके कानूनी परिणाम अलग-अलग हैं:

  1. ओवर-इजेक्शन और अंडर-इजेक्शन: यह अनशेड्यूल्ड इंटरचेंज (UI) रेगुलेशन के तहत आता है।
  2. विचलन (Deviation): यह DSM रेगुलेशन, 2014 के तहत आता है।
  3. गेमिंग (Gaming): रेगुलेशन 11.3.4 और 11.3.12 के तहत, जिसमें अनुचित लाभ कमाने का गलत इरादा साबित करना अनिवार्य है।
  4. घोषित क्षमता का प्रदर्शन (Demonstration of Declared Capability): रेगुलेशन 11.3.13 के तहत, जिसमें विफलता पर सख्त दीवानी जुर्माना लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने SERC और APTEL दोनों के निष्कर्षों को खारिज कर दिया, जिन्होंने ‘गेमिंग’ और ‘क्षमता प्रदर्शन’ की अवधारणाओं को आपस में मिला दिया था। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा:

“रेगुलेशन 11.3.13 के तहत घोषित क्षमता का प्रदर्शन एक स्वतंत्र प्रावधान है, और इसके लिए दंड उसी में निहित है। गेमिंग और घोषित क्षमता के प्रदर्शन की अवधारणाओं को आपस में मिलाने का कोई कारण नहीं है, भले ही शाब्दिक रूप से दोनों गलत घोषणाएं हों। गेमिंग के लिए ‘मेन्स रिया’ (आपराधिक मंशा) आवश्यक है, जबकि क्षमता प्रदर्शित न करने पर सख्त दायित्व (Strict Liability) लागू होता है।”

2. ‘चौथी टाइम ब्लॉक’ का महत्व

अदालत ने APTEL के इस निष्कर्ष को नामंजूर कर दिया कि प्रदर्शन के लिए कोई समय सीमा नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेगुलेशन 11.5(xi) के तहत, यदि SLDC ग्रिड के बेहतर संचालन के लिए बिजली कार्यक्रम में संशोधन करता है, तो वह चौथी टाइम ब्लॉक से प्रभावी होता है (नोटिस मिलने वाले ब्लॉक को पहला मानते हुए)।

अदालत ने कहा कि क्षमता प्रदर्शन का उद्देश्य ग्रिड की सुरक्षा और स्थिरता की जांच करना है। इसलिए, नोटिस मिलने के बाद चौथी टाइम ब्लॉक (यानी 45 मिनट के भीतर) में घोषित क्षमता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है।

3. दीवानी दायित्व और ‘मेन्स रिया’ की आवश्यकता का न होना

जुर्माने के लिए मंशा की आवश्यकता पर बात करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने चेयरमैन, सेबी बनाम श्रीराम म्यूचुअल फंड और धर्मेंद्र टेक्सटाइल प्रोसेसर्स के ऐतिहासिक फैसलों पर भरोसा जताया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब जुर्माना किसी दीवानी या संविदात्मक दायित्व के उल्लंघन पर लगाया जाता है, तो उल्लंघनकर्ता की मानसिक स्थिति (मंशा) मायने नहीं रखती। चूंकि बिजली क्षमता को बनाए रखना एक संविदात्मक दायित्व है, इसलिए इसमें विफलता सीधे सख्त दीवानी दायित्व को आकर्षित करती है। अदालत ने निष्कर्ष निकाला:

“रेगुलेशन 11.3.13 के तहत दंड एक दीवानी दायित्व है क्योंकि घोषित क्षमता के अनुसार बिजली उत्पन्न करने का उत्पादक का कर्तव्य संविदात्मक है। इसमें विफलता होने पर बिना किसी अतिरिक्त शर्त के जुर्माना लगाया जाना अनिवार्य है।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल ने TPDDL बनाम PPCL के फैसले की गलत व्याख्या की थी। गलत घोषणा केवल कोयले की कमी या संयंत्र बंद होने तक सीमित नहीं है, बल्कि तब भी होती है जब संयंत्र पूरी तरह चालू होने के बावजूद उत्पादक ऐसी क्षमता घोषित करे जिसे वह समय पर दे ही न सके।

4. अन्य दलीलों और फैसलों का खंडन

  • PSEB बनाम CERC मामला: कोर्ट ने कहा कि यह मामला दोहरे ईंधन वाले संयंत्रों से संबंधित था, जहां गैस की गुणवत्ता के उतार-चढ़ाव के कारण 1% का अंतर व्यावहारिक सीमा के भीतर माना गया था। इसका कोयला आधारित संयंत्रों और क्षमता परीक्षण से कोई लेना-देना नहीं है।
  • रैंप रेट और गवर्नर एक्शन: रेगुलेशन 5.3.8 के तहत 1% रैंप रेट का नियम गवर्नर के तकनीकी संचालन के लिए अनुशंसित है, जिसे क्षमता प्रदर्शन के सामान्य नियम पर लागू नहीं किया जा सकता।
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चार विवादित दिनों का तथ्यात्मक मूल्यांकन

सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक विवादित दिन के परिचालन डेटा और स्प्रेडशीट्स का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया:

  • 15 जनवरी 2017: तीन में से एक यूनिट बंद थी। इसके बावजूद उत्पादक ने घोषित क्षमता बढ़ाकर 1841.40 MW कर दी। SLDC ने सुबह 09:30 से 09:45 के ब्लॉक में नोटिस जारी किया, लेकिन TSPL इस क्षमता को चौथी टाइम ब्लॉक या उसके बाद प्रदर्शित करने में पूरी तरह विफल रहा।
  • 17 जनवरी 2017: केवल एक यूनिट चालू थी, दूसरी शटडाउन पर थी और तीसरी तकनीकी खराबी के कारण बंद थी। घोषित क्षमता 1229.80 MW थी। सुबह 08:15 बजे प्रदर्शन नोटिस मिलने के ठीक बाद, क्षमता प्रदर्शित करने के बजाय TSPL ने सुबह 08:58 बजे (दूसरे ब्लॉक में) अपनी क्षमता घटाकर 250 MW और बाद में 150 MW करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन करने के बजाय नोटिस के बाद क्षमता घटाने की मांग करना नियमों का खुला उल्लंघन है।
  • 24 जनवरी 2017: दिन की शुरुआत 1600 MW की घोषित क्षमता से हुई, जिसमें SLDC ने नौ बार संशोधन किया। कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने पर दोपहर 14:48 बजे नोटिस दिया गया। लेकिन 1650 MW की घोषित क्षमता को चौथी ब्लॉक या उसके बाद कभी भी हासिल नहीं किया जा सका।
  • 31 जनवरी 2017: घोषित क्षमता 1473.12 MW थी। SLDC द्वारा दो नोटिस (सुबह 08:20 और 09:23 बजे) जारी किए गए। उत्पादक पहली नोटिस के चौथी ब्लॉक तक क्षमता साबित करने में विफल रहा, और इसे केवल सातवीं ब्लॉक में ही प्राप्त किया जा सका।

अदालत ने निर्णय दिया:

“इन चारों दिनों में घोषित क्षमता को साबित करने में उत्पादक की विफलता पूरी तरह से स्थापित होती है।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए APTEL के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया और पंजाब SERC के जुर्माने के आदेश को बहाल कर दिया।

अदालत ने SERC के आदेश के उस कानूनी हिस्से में संशोधन किया जिसमें उसने माना था कि:

  1. रेगुलेशन 11.3.13 का उपयोग गेमिंग के मामलों से निपटने के लिए किया जा सकता है (जबकि दोनों अलग-अलग उल्लंघन हैं)।
  2. घोषित क्षमता के प्रदर्शन में विफलता पर जुर्माना लगाने के लिए ‘पैसा कमाने की जानबूझकर की गई मंशा’ आवश्यक है (जबकि यह सख्त दीवानी दायित्व है जिसमें मंशा की जरूरत नहीं होती)।

अदालत ने निर्देश दिया कि इस फैसले के तहत जुर्माने की पुष्टि और ब्याज संबंधी दायित्वों को पूरी तरह लागू किया जाए। APTEL के आदेश के बाद TSPL को जो भी राशि या सरचार्ज का लाभ मिला था, उसे पूरी ब्याज दरों के साथ PSPCL को वापस लौटाया जाए।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम तलवंडी साबो पावर लिमिटेड व अन्य
  • मामला संख्या: सिविल अपील संख्या 7432/2025
  • पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • फैसले की तारीख: 20 मई, 2026

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