एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में, दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को सत्र न्यायालय (सेशंस कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसने राजनीतिक टिप्पणीकार अभिजीत अय्यर मित्रा के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने पर रोक लगा दी थी। यह पूरा मामला ऑनलाइन मीडिया आउटलेट ‘न्यूजलॉन्ड्री’ की महिला पत्रकारों के खिलाफ कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक और यौन-उत्पीड़न जैसी सोशल मीडिया टिप्पणियों से जुड़ा है।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने सेशंस कोर्ट द्वारा बिना कोई लिखित कारण बताए जल्दबाजी में स्टे देने पर गहरी असहमति जताई। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “इस तरह का स्टे संतुष्ट नहीं करता।” अदालत ने अब इस मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस सत्र न्यायालय भेज दिया है और चार सप्ताह के भीतर दोनों पक्षों को सुनकर एक तार्किक और स्पष्ट आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
इस कानूनी विवाद की शुरुआत ‘न्यूजलॉन्ड्री’ की संपादकीय निदेशक मनीषा पांडे की शिकायत से हुई थी। उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि अभिजीत अय्यर मित्रा ने सोशल मीडिया पर उन्हें और उनकी सहयोगी आठ अन्य महिला पत्रकारों को निशाना बनाते हुए अत्यंत अभद्र पोस्ट किए थे।
शिकायत में मुख्य रूप से दो पोस्ट का ब्योरा दिया गया था:
- 8 फरवरी 2025 का एक ट्वीट, जिसमें कथित तौर पर महिला पत्रकारों के खिलाफ यौन रूप से अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।
- 28 अप्रैल 2025 का एक अन्य ट्वीट, जिसमें कथित तौर पर आगे भी ऐसी ही आपत्तिजनक बातें कही गई थीं।
23 अप्रैल को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने माना कि ये ट्वीट प्रथम दृष्टया किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से की गई अभद्र टिप्पणियां थीं। कोर्ट ने इसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75 (यौन उत्पीड़न) और धारा 79 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला शब्द या कृत्य) के तहत संज्ञेय अपराध मानते हुए पुलिस को तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया था।
मजिस्ट्रेट कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद, पुलिस ने 12 दिनों तक एफआईआर दर्ज नहीं की। इसी बीच, मित्रा ने सत्र न्यायालय में एक पुनरीक्षण याचिका (revision petition) दायर कर दी। 4 मई 2026 को सुनवाई के पहले ही दिन, सेशंस कोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश पर 28 मई तक के लिए रोक लगा दी थी, जिसे मनीषा पांडे ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट में मनीषा पांडे की पैरवी कर रही वरिष्ठ वकील ने सत्र न्यायालय के रुख पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि:
- सेशंस कोर्ट ने सुनवाई के पहले ही दिन, दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने का मौका दिए बिना, मनमाने ढंग से एफआईआर पर रोक लगा दी।
- कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद स्थानीय पुलिस 12 दिनों तक एफआईआर दर्ज करने में नाकाम रही, जो उनकी कर्तव्यहीनता को दर्शाता है।
अभिजीत अय्यर मित्रा की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने भी अदालत की गरिमा और कानूनी प्रक्रिया के तहत “पूरी निष्पक्षता के साथ” यह स्वीकार किया कि बिना कोई लिखित कारण दर्ज किए सेशंस कोर्ट के इस स्टे ऑर्डर को सही नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और टिप्पणी
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने सत्र न्यायालय की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब भी अदालतें किसी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर रोक लगाती हैं, तो उनके फैसले के पीछे एक पारदर्शी, स्पष्ट और कानूनी रूप से तार्किक कारण दर्ज होना अनिवार्य है।
अदालत ने कहा कि सुनवाई के पहले ही दिन बिना किसी कारण के सीधे रोक लगा देना उच्च न्यायपालिका को बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं करता। जब दोनों पक्षों के वकील इस बात पर सहमत हो गए कि 4 मई का वह आदेश बिना किसी कानूनी आधार (unreasoned) के दिया गया था, तो हाईकोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप करना आवश्यक समझा।
अदालत का अंतिम फैसला और निर्देश
दोनों पक्षों की आपसी सहमति के बाद, दिल्ली हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के 4 मई 2026 के विवादित स्टे ऑर्डर को खारिज करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
मामले को वापस निचली अदालत में भेजते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- सत्र न्यायालय को अब मित्रा के स्टे आवेदन पर नए सिरे से विचार करना होगा।
- दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा और निष्पक्ष अवसर दिया जाना चाहिए।
- सुनवाई के बाद ही सेशंस कोर्ट को एक विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पारित करना होगा।
- हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय से इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करते हुए अधिकतम चार सप्ताह के भीतर मामला निपटाने का अनुरोध किया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे अपनी दलीलें दोबारा शुरू करने के लिए 22 मई 2026 को सत्र न्यायालय के समक्ष उपस्थित हों।

