पश्चिम बंगाल हिंसा: कलकत्ता हाईकोर्ट से ISF उम्मीदवार मौलाना शाहजहाँ अली को झटका, अदालत ने जमानत याचिका की खारिज

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मोथाबारी में चुनाव संशोधन प्रक्रिया के दौरान हुई हिंसा के मामले में आरोपी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के उम्मीदवार मौलाना शाहजहाँ अली (उर्फ मौलाना सहजन अली) को जमानत देने से साफ़ इनकार कर दिया है। यह मामला मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त संशोधन (SIR) के लिए तैनात न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को खतरे में डालने से जुड़ा है।

जस्टिस देवांशु बसाक और जस्टिस मोहम्मद शब्बार रशीदी की खंडपीठ ने १८ मई को सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा जांचे जा रहे इस गंभीर मामले में आरोपी की संलिप्तता के प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हैं, जिसके चलते उन्हें फिलहाल राहत नहीं दी जा सकती।

क्या है पूरा मामला और क्यों हस्तक्षेप करना पड़ा सुप्रीम कोर्ट को?

यह पूरा विवाद मालदा जिले के मोथाबारी विधानसभा क्षेत्र से शुरू हुआ, जहाँ २ अप्रैल को मोथाबारी पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी। इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा १२१ (देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना), धारा १३२ (विद्रोह के लिए उकसाना), और धारा ३५१(२) (अपराधिक बल का प्रयोग) के साथ-साथ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के निवारण अधिनियम की गंभीर धाराएं जोड़ी गई थीं।

चूंकि यह हिंसा सीधे तौर पर मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त संशोधन (SIR) कार्य में लगे न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी थी, इसलिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लिया। ६ अप्रैल २०२६ को शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच केंद्रीय एजेंसी NIA को सौंपने का निर्देश दिया। इसके बाद स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए आईएसएफ प्रत्याशी मौलाना शाहजहाँ अली को NIA ने अपनी हिरासत में ले लिया था।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

बचाव पक्ष (याचिकाकर्ता) का तर्क:

याचिकाकर्ता मौलाना शाहजहाँ अली की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने दलील दी कि आरोपी को लंबे समय से हिरासत में रखा गया है जो कि न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच NIA को सौंपी है, जबकि कथित अपराध एनआईए अधिनियम, २००८ की तय सूची के अंतर्गत नहीं आते हैं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस मामले की जांच व्यावहारिक रूप से पूरी हो चुकी है और अपराधों की प्रकृति ऐसी नहीं है जिसके लिए आरोपी को और अधिक समय तक जेल में रखा जाए।

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जांच एजेंसी (NIA) का विरोध:

वहीं दूसरी ओर, एनआईए के विशेष लोक अभियोजक अरुण कुमार मैती ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पीठ को याद दिलाया कि देश की शीर्ष अदालत ने इस मामले में दखल ही इसलिए दिया था क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनावी ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा दांव पर लगी थी।

अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि ११ मई २०२६ को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एनआईए को इस मामले की जांच जल्द से जल्द (अधिमानतः दो महीने के भीतर) पूरी कर संबंधित अदालत में रिपोर्ट पेश करने की अनुमति दी है। चूंकि अभी जांच सक्रिय रूप से जारी है और अंतिम रिपोर्ट आनी बाकी है, इसलिए आरोपी को जमानत पर रिहा करना ठीक नहीं होगा।

केस डायरी के सबूतों ने बिगाड़ा खेल

कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले से जुड़ी केस डायरी और सबूतों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत मौजूद हैं। जांचकर्ताओं द्वारा जुटाए गए मुख्य साक्ष्य इस प्रकार हैं:

  • गवाहों के बयान: दो संरक्षित (protected) गवाहों ने घटना के समय और स्थान पर आरोपी मौलाना शाहजहाँ अली की मौजूदगी और उनकी सक्रिय भूमिका की पुष्टि की है।
  • पुलिस की गवाही: ड्यूटी पर तैनात एक पुलिसकर्मी ने भी बयान दर्ज कराया है कि घटना के वक्त आरोपी मौके पर ही मौजूद था।
  • तकनीकी साक्ष्य: केस डायरी में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साक्ष्य गवाहों और पुलिसकर्मियों के बयानों का पूरी तरह समर्थन करते हैं।
  • कॉल डिटेल्स (CDR): आरोपी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि वह घटना के समय अन्य सह-आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में था।
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पीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:

“ये घटनाएं राज्य में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त संशोधन (SIR) के काम के लिए प्रतिनियुक्त न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़ी हैं। स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद एनआईए ने जांच अपने हाथ में ली और आरोपी को हिरासत में लिया। केस डायरी के दस्तावेज स्पष्ट रूप से इन कथित अपराधों में याचिकाकर्ता की संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं।”

अदालत का अंतिम फैसला

न्यायालय ने अपराध की असाधारण गंभीरता, केस डायरी में दर्ज पुख्ता सबूतों, आरोपी की हिरासत की अवधि और एनआईए की जांच अभी जारी होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए मौलाना शाहजहाँ अली की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि जब तक केंद्रीय एजेंसी की जांच पूरी नहीं हो जाती, आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।

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