हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मनाली नगर परिषद द्वारा 300 किलोमीटर से अधिक दूर हरियाणा के अंबाला में बिना उपचारित किए गीले कचरे को ले जाने की प्रक्रिया पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस अव्यावहारिक कदम से राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway) पर केवल प्रदूषण ही बढ़ेगा।
मनाली के रंगरी में ठोस और लेगेसी कचरे के अवैज्ञानिक तरीके से निपटान से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मनाली नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी और कचरा प्रबंधन करने वाली निजी फर्म के अधिकृत प्रतिनिधि को अगली सुनवाई की तारीख, 8 जुलाई 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए हैं।
यह अदालती कार्रवाई मनाली से करीब 3 किलोमीटर दूर रंगरी में ठोस और लेगेसी कचरे के असुरक्षित और अवैज्ञानिक निपटान को लेकर दायर की गई तीन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई।
हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HPSPCB) की 13 अप्रैल की निरीक्षण रिपोर्ट में इस साइट पर गंभीर खामियां उजागर हुई थीं। रंगरी स्थित कचरा प्रबंधन संयंत्र का संचालन मनाली नगर परिषद और हरियाणा की एक निजी कंपनी ‘मेसर्स सनटैन लाइफ प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, रंगरी प्लांट में विभिन्न हॉटस्पॉट से अत्यधिक मिश्रित (बिना छांटा हुआ) कचरा आ रहा था, जिससे उचित गंध व मक्खी नियंत्रण प्रणाली न होने के कारण पूरे इलाके में भारी दुर्गंध फैल रही थी। निरीक्षण में यह भी सामने आया कि साइट पर कुल एकत्रित 78,464 टन लेगेसी कचरे में से निजी कंपनी जनवरी 2026 तक केवल 32,778.46 टन का ही निस्तारण कर सकी थी। इसके अलावा, प्लांट में आने वाले कचरे का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा मिश्रित था और केवल 15 प्रतिशत कचरा ही स्रोत (सोर्स) पर अलग किया जा रहा था।
निजी कंपनी का तर्क
कचरे को इतनी दूर भेजने के फैसले का बचाव करते हुए मेसर्स सनटैन लाइफ प्राइवेट लिमिटेड के एक अधिकारी ने स्पष्टीकरण दिया कि गीले कचरे को मनाली में ही एक महीने की अवधि में खाद में बदला जाता है और फिर उसे अंबाला ले जाया जाता है। कंपनी प्रतिनिधि का कहना था:
“हम कचरे को खाद के रूप में मनाली से हरियाणा के अंबाला ले जाते हैं क्योंकि हमारे पास मनाली में कचरे को 6 मिलीमीटर के आकार में छानने की क्षमता नहीं है, जो कि कृषि उपयोग के लिए सबसे सही आकार माना जाता है। खाद के रूप में यह गीला कचरा हर दिन नहीं भेजा जाता। कचरे को खाद में बदलने में करीब एक महीना लगता है और फिर इसे अंबाला भेजा जाता है। अंबाला और उसके आसपास के क्षेत्रों में कृषि कार्यों के लिए इस प्रसंस्कृत खाद की भारी मांग है।”
सुनवाई के दौरान नगर परिषद और निजी कंपनी के वकीलों ने लेगेसी कचरे के बोझ को कम करने के लिए प्रस्तावित उपायों का ब्योरा देते हुए एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अदालत से और समय मांगा है।
अदालत की सख्त टिप्पणियां और पर्यावरण को नुकसान
खंडपीठ ने कचरे को एक राज्य से दूसरे राज्य में इतनी लंबी दूरी तय कराकर ले जाने के तार्किक औचित्य पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की:
“हम मनाली नगर परिषद द्वारा गीले कचरे को अंबाला ले जाने की कार्रवाई की बिल्कुल सराहना नहीं करते, जो यहाँ से लगभग 300 किलोमीटर से अधिक दूर है। गीले कचरे को अंबाला ले जाने से पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रदूषण और बढ़ेगा।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि मनाली नगर परिषद ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के तहत निर्धारित वैधानिक मानकों का खुलेआम उल्लंघन कर रही है। अदालत ने दर्ज किया:
“मनाली नगर परिषद ने संबंधित क्षेत्रों से ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार 100 प्रतिशत स्रोत पृथक्करण (सोर्स सेग्रिगेशन) हासिल नहीं किया है। गीला कचरा बिना किसी उपचार के खुले क्षेत्र में पड़ा हुआ था, जिससे जहरीला तरल (लीचेट) रिस रहा था और लीचेट के लिए बनाया गया गड्ढा भी काम नहीं कर रहा था। यह बताया गया कि यूनिट गीले कचरे को अंबाला जिले के नारायणगढ़ उपमंडल के अंतर्गत आने वाले जटवार गांव के बायो-गैस प्लांट में भेज रही है… मनाली ने गीले कचरे के उपचार के लिए खुद का प्लांट स्थापित नहीं किया है।”
अदालत ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि अनुपचारित लीचेट और कचरा ब्यास नदी के करीब स्थित ‘गौ सदन’ के पास फेंका जा रहा था, जिससे यह प्रदूषित तरल सीधे नदी के पानी में मिल रहा था। निरीक्षण में पाया गया कि लीचेट संग्रह गड्ढे पूरी तरह खाली पड़े थे और बायो-माइनिंग की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के विरुद्ध पूरी तरह अवैज्ञानिक तरीके से की जा रही थी।
नगर परिषद पर लगा करोड़ों का जुर्माना
गंभीर पर्यावरणीय उल्लंघनों के कारण मनाली नगर परिषद पर भारी जुर्माना लगाया गया है, जिसमें शामिल हैं:
- ब्यास नदी में अनुपचारित लीचेट बहाने के लिए 15.30 लाख रुपये का पर्यावरण मुआवजा।
- निर्धारित स्थलों पर ठोस कचरे के अवैज्ञानिक निपटान के लिए 2,83,07,591 रुपये (लगभग 2.83 करोड़ रुपये) का जुर्माना।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि 26 फरवरी 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्पष्ट आदेश दिए जाने के बावजूद नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी और निजी कंपनी के प्रतिनिधियों ने अभी तक इस मुआवजे की राशि को सरकारी खाते में जमा नहीं कराया है। इसी लापरवाही को देखते हुए अदालत ने दोनों पक्षों के जिम्मेदार अधिकारियों को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत हाजिरी का सख्त निर्देश दिया है।
इस मामले की अगली सुनवाई अब 8 जुलाई, 2026 को होगी।

