वकालत और डॉक्टरी एक साथ नहीं: केरल हाई कोर्ट ने कहा— कानून एक ‘ईर्ष्यालु प्रेमिका’ है, पहले मेडिकल रजिस्ट्रेशन रद्द कराएं

केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि एक ही समय पर दो अलग-अलग गरिमापूर्ण पेशों में पैर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने साफ किया है कि कोई भी पंजीकृत होम्योपैथी चिकित्सक तब तक वकील के रूप में अपना नामांकन (Enrollment) नहीं करा सकता, जब तक वह अपना मेडिकल रजिस्ट्रेशन पूरी तरह से रद्द नहीं करवा लेता।

18 मई को दिए अपने आदेश में, न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने एक होम्योपैथी डॉक्टर की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने बार काउंसिल ऑफ केरल (BCK) के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत वकालत के पेशे में प्रवेश के लिए उनका मेडिकल लाइसेंस रद्द करने की शर्त रखी गई थी।

अदालत ने अपने आदेश में वकालत के प्रति पूर्ण समर्पण की आवश्यकता पर जोर देते हुए टिप्पणी की, “अपनी पेशेवर आत्मा को दो स्वामियों के बीच बांटने से दोनों ही पेशों से ध्यान भटक सकता है। कानून के पेशे में इस तरह की विभाजित वफादारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस पेशे को हमेशा से एक ‘ईर्ष्यालु प्रेमिका’ (Jealous Mistress) माना गया है।”

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता, जो कि एक होम्योपैथी डॉक्टर हैं, उन्होंने होम्योपैथी का अभ्यास करने के बाद कानून (LLB) की डिग्री हासिल की और ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) भी पास कर लिया। इसके बाद उन्होंने वकील के रूप में वकालत करने के लिए बार काउंसिल में आवेदन किया।

वकालत की शुरुआत करने के लिए उन्होंने अपना निजी क्लीनिक भी बंद कर दिया और एक शपथ पत्र (Undertaking) सौंपा कि वह वकील बनने के बाद चिकित्सा का अभ्यास नहीं करेंगी। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ केरल (BCK) अपनी मांग पर अड़ा रहा कि उन्हें पहले अपना मेडिकल रजिस्ट्रेशन पूरी तरह रद्द कराना होगा।

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इस शर्त के खिलाफ डॉक्टर ने हाई कोर्ट का रुख किया। उनकी दलील थी कि बार काउंसिल के प्रतिबंध केवल वकील के रूप में नामांकित होने के बाद लागू होने चाहिए, न कि नामांकन से पहले ही प्रवेश रोकने के लिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उन्हें नामांकन से रोकना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उनके मनपसंद पेशा चुनने के मौलिक अधिकार का हनन है।

मौलिक अधिकार असीमित नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी पेशे को अपनाने का मौलिक अधिकार असीमित या निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(6) इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।

अदालत ने माना कि कानून की डिग्री लेने और बार परीक्षा पास करने के बाद कोई भी व्यक्ति वकील बनने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन बार काउंसिल के नियमों के तहत यदि कोई आवेदक पहले से “किसी अन्य पेशे में सक्रिय” है, तो उसके प्रवेश पर कानूनी रूप से रोक लगाई जा सकती है।

न्यायमूर्ति थॉमस ने ‘केरल राज्य चिकित्सा व्यवसायी अधिनियम, 2021’ (Kerala State Medical Practitioners Act, 2021) का हवाला देते हुए कहा कि जब तक किसी व्यक्ति का नाम मेडिकल काउंसिल के रजिस्टर में दर्ज है, वह काउंसिल की अनुमति या पंजीकरण रद्द कराए बिना कोई अन्य पेशा नहीं अपना सकता।

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कोर्ट ने कहा कि केवल क्लीनिक बंद कर देना या शपथ पत्र दे देना कानून की नजर में काफी नहीं है। जब तक याचिकाकर्ता का नाम आधिकारिक मेडिकल रजिस्टर में है, तब तक दुनिया की नजर में वह एक सक्रिय चिकित्सक ही हैं।

नामांकन के स्तर पर ही ‘छंटनी’ का अधिकार

बार काउंसिल ऑफ केरल ने अदालत में अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है ताकि कोई भी व्यक्ति एक साथ दो बेहद व्यस्त और जिम्मेदारी भरे पेशों में काम न करे। बार काउंसिल ने यह भी स्पष्ट किया कि यह रोक स्थायी नहीं है। यदि याचिकाकर्ता भविष्य में दोबारा चिकित्सा क्षेत्र में लौटना चाहें, तो वे वकालत का लाइसेंस सरेंडर कर आसानी से अपना मेडिकल रजिस्ट्रेशन फिर से शुरू करवा सकती हैं।

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इस रुख का समर्थन करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’ के तहत बार काउंसिल के पास व्यापक अधिकार हैं। काउंसिल का काम न केवल पेशेवर मानकों को ऊंचा बनाए रखना है, बल्कि नामांकन के स्तर (pre-entry stage) पर ही ऐसे लोगों की पहचान करना और उन्हें बाहर करना (weed out) भी है जो इस पेशे के अनुकूल नहीं हैं। यदि कोई आवेदक किसी अन्य पेशे को जारी रखने का कानूनी अधिकार रखता है, तो बार काउंसिल उसे नामांकित करने से मना करने का पूरा अधिकार रखती है।

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