‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’: सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर फ्लैट विवाद में बुजुर्ग महिला के हक में दिया फैसला, कहा- ‘तकनीकी कमियां न्याय का रास्ता नहीं रोक सकतीं’

दशकों से चले आ रहे एक पारिवारिक संपत्ति विवाद को “कॉमेडी ऑफ एरर्स” (भूलों का तमाशा) करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तकनीकी पेचीदगियों के कारण किसी को उसके कानूनी अधिकारों और न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की खंडपीठ ने जबलपुर में स्थित एक फ्लैट की नीलामी और उसके बंटवारे की रुकी हुई कानूनी प्रक्रिया (execution proceedings) को तुरंत बहाल करने का आदेश दिया है। महिला की अधिक उम्र को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने ट्रायल कोर्ट को सख्त निर्देश दिया है कि इस पूरी प्रक्रिया और नीलामी के पैसों के बंटवारे को अगले दो महीनों के भीतर पूरा किया जाए।

इस विवाद की शुरुआत साल 1980 में इस दंपत्ति की शादी के साथ हुई थी। साल 1991 में दोनों ने अपनी जमा-पूंजी और कमाई को मिलाकर मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक फ्लैट खरीदा। हालांकि, कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में दरार आ गई, जो साल 2003 में कानूनी अलगाव में बदल गई। साल 2004 में अदालत ने इस अलगाव पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी।

अलग होने के बाद फ्लैट पर पति का कब्जा रहा, जबकि पत्नी ने अपने हिस्से के लिए अदालत में विभाजन (partition) का मुकदमा दायर किया। 13 अप्रैल 2012 को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने एक फैसला सुनाया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि फ्लैट पर पति और पत्नी दोनों का 50-50 प्रतिशत मालिकाना हक है। इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला को उसके हिस्से का कब्जा दिया जाए और पति द्वारा उसे ₹1,500 प्रति माह का ‘मेसने प्रॉफिट’ (अवैध कब्जे के मुआवजे के रूप में हर्जाना) दिया जाए। इस फैसले में यह भी साफ था कि यदि फ्लैट का भौतिक रूप से बंटवारा मुमकिन न हो, तो इसे बेचकर आधी-आधी रकम बांट ली जाए।

साल 2012 के फैसले के बाद न्याय मिलने के बजाय अगले एक दशक तक चलने वाला कानूनी दांवपेंच शुरू हो गया।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक के रूप में मां की भूमिका की पुष्टि की

जब महिला ने साल 2013 में अदालती फैसले को लागू कराने के लिए याचिका लगाई, तो अदालतों ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि 2012 का फैसला केवल एक “प्रारंभिक डिक्री” (preliminary decree) थी। इसके बाद जब महिला ने “अंतिम डिक्री” के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की, तो इसी दौरान 26 मार्च 2014 को उसके पूर्व पति का निधन हो गया।

पति की मृत्यु के बाद मामला और उलझ गया, जब एक अन्य रिश्तेदार ने 22 मार्च 2015 की एक रजिस्टर्ड वसीयत का हवाला देते हुए फ्लैट पर अपना दावा ठोक दिया और वहां रहने लगा।

साल 2019 में कोर्ट द्वारा नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर ने फ्लैट का मुआयना किया और रिपोर्ट दी कि फ्लैट आकार में बहुत छोटा है, इसलिए इसका भौतिक रूप से दो हिस्सों में बंटवारा नहीं किया जा सकता। इसके बाद कोर्ट ने फ्लैट की सार्वजनिक नीलामी का आदेश दिया ताकि बिक्री से मिली रकम को आपस में बांटा जा सके।

लेकिन साल 2023 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने पति के रिश्तेदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि चूंकि 2012 का आदेश सिर्फ एक “प्रारंभिक डिक्री” था, इसलिए महिला को नीलामी कराने से पहले एक पूरी तरह से अलग “अंतिम डिक्री” हासिल करनी होगी। इस झटके के खिलाफ महिला ने साल 2026 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

READ ALSO  हेट स्पीच मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जितेंद्र त्यागी उर्फ़ वसीम रिज़वी को जमानत देने से किया इनकार

जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो दोनों पक्षों के वकीलों ने 2012 के अदालती आदेश की व्याख्या को लेकर अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं:

  • महिला (याचिकाकर्ता) की ओर से: एडवोकेट अभिषेक गुलाटी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने केवल “प्रारंभिक डिक्री” शब्द पर ध्यान केंद्रित करके एक बुनियादी भूल की है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि नीलामी की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी और दोनों पक्षों ने इसमें बढ़-चढ़कर बोलियां भी लगाई थीं। ऐसे में दोबारा अंतिम डिक्री के लिए आवेदन करने की मांग करना केवल एक औपचारिक और व्यर्थ कागजी कार्रवाई है।
  • पति के रिश्तेदार (प्रतिवादी) की ओर से: एडवोकेट सिद्धार्थ आर. गुप्ता ने दलील दी कि कानून के तहत किसी भी प्रारंभिक डिक्री को सीधे तौर पर लागू नहीं कराया जा सकता क्योंकि यह केवल अधिकारों की घोषणा करती है। जब तक अंतिम डिक्री पारित नहीं होती, तब तक नीलामी की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस लंबी देरी के लिए महिला स्वयं जिम्मेदार है, इसलिए वह किसी भी तरह के हर्जाने (mesne profits) की हकदार नहीं है।
READ ALSO  कंपनी चेक पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति धारा 148 एनआई अधिनियम के तहत मुआवजे के लिए उत्तरदायी नहीं हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जब एक बार अधिकारों का अंतिम रूप से निर्धारण हो चुका हो, तो दोबारा आवेदन करने को कहना पूरी तरह से गैर-जरूरी और अवांछित है।

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “मामले का कानूनी समाधान भले ही सीधा दिखे, लेकिन यह दीवानी अपील वास्तव में ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ (भूलों का तमाशा) का जीवंत उदाहरण है।”

सालों से लटके इस विवाद का हमेशा के लिए अंत करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ट्रायल कोर्ट तुरंत फ्लैट की सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया शुरू करे। इस नीलामी में बुजुर्ग महिला और मृत पति का रिश्तेदार दोनों ही बाहरी खरीदारों के साथ खुद भी बोली लगाने के लिए पात्र होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि नीलामी से मिलने वाली कुल राशि में से महिला के हिस्से का बकाया हर्जाना (mesne profits) काटकर उसे सौंप दिया जाए, और पति के हिस्से की बची हुई राशि उसके दावेदार रिश्तेदार को दे दी जाए। महिला की उम्र (70 वर्ष से अधिक) का सम्मान करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी कानूनी प्रक्रिया को दो महीने की सख्त समयसीमा के भीतर समाप्त करने का आदेश दिया है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles