‘डिजिटल अरेस्ट’ और डेटा चोरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: विदेशी सर्वर से भारतीयों का डेटा नष्ट करने के लिए MeitY को दिया निर्देश

देश में तेजी से पैर पसारते साइबर अपराध और ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) के खतरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को उस जनहित याचिका (PIL) पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है, जिसमें विदेशी सर्वरों पर मौजूद भारतीयों के चोरी हुए संवेदनशील डेटा को वापस पाने या उसे पूरी तरह नष्ट करने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय तंत्र बनाने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता को सीधे सरकार से संपर्क करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह बेहद जटिल तकनीकी मामला है, जो न्यायिक नहीं बल्कि प्रशासनिक और तकनीकी क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

यह जनहित याचिका साइबर सुरक्षा सलाहकार नीतीश कुमार द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने खुद अदालत में अपना पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान कुमार ने देश के सामने खड़े एक गंभीर सुरक्षा संकट की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि कम से कम पांच विदेशी देशों में सक्रिय अपराधियों ने फिंगरप्रिंट और अन्य व्यक्तिगत पहचानकर्ताओं (Personal Identifiers) सहित भारतीयों के संवेदनशील डेटा को चुरा लिया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इस चोरी किए गए डेटा को अब भारतीय नागरिकों के खिलाफ “हथियार” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी डेटा के बल पर विदेशी धरती से ‘डिजिटल अरेस्ट’ और जबरन वसूली (extortion) जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है।

जब कोर्ट ने भौगोलिक सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय कानूनी जटिलताओं का जिक्र करते हुए कहा, “जब तक किसी देश के साथ प्रत्यर्पण संधि (extradition treaty) न हो,” तब तक विदेशी अपराधियों को भारत लाना मुश्किल होता है। इस पर नीतीश कुमार ने व्यावहारिक सुझाव देते हुए कहा, “यदि हम डेटा को वापस नहीं ला सकते, तो कम से कम हम इसे पुनर्गठित करके सुरक्षित तो कर ही सकते हैं।”

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डेटा चोरी और साइबर सुरक्षा की गंभीरता को स्वीकार करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस याचिका पर सीधे कोई कानूनी आदेश देने से परहेज किया। अदालत का मानना था कि यह पूरी तरह से सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है।

पीठ ने टिप्पणी की, “चूंकि यह मुद्दा अत्यधिक तकनीकी प्रकृति का है, इसलिए हमें लगता है कि इसके समाधान के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) के पास जाना ही सबसे सही और प्रभावी तरीका होगा। इस याचिका को एक पूरक प्रतिवेदन (supplementary representation) के रूप में सरकार को सौंपा जाए और वे इस पर विचार करें।”

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अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए नीतीश कुमार को स्वतंत्रता दी कि वे अपने तकनीकी सुझावों को सीधे आईटी मंत्रालय के सामने पेश करें, ताकि नीति निर्माता इस पर ठोस कदम उठा सकें।

याचिकाकर्ता ने देश के नागरिकों की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार से कुछ बेहद महत्वपूर्ण सुधारों की मांग की है:

  • डेटा रिकवरी और विनाश: विदेशी सर्वरों पर मौजूद भारतीयों के चोरी हुए डेटा को वापस पाने या उसे नष्ट करने के लिए एक वैश्विक कानूनी व तकनीकी ढांचा तैयार किया जाए।
  • DPDP एक्ट को तुरंत लागू करना: डेटा लीक और उससे जुड़ी ब्लैकमेलिंग को रोकने के लिए ऐतिहासिक ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023’ को तत्काल पूर्ण रूप से प्रभाव में लाया जाए।
  • विशेष जांच दल (SIT) का गठन: देश में बड़े पैमाने पर हो रही डेटा चोरी और अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट्स की जांच के लिए एक समर्पित एसआईटी (SIT) बनाई जाए।
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सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि याचिकाकर्ता पहले भी इस संबंध में केंद्र सरकार को प्रतिवेदन दे चुके हैं। अब उम्मीद की जा रही है कि मंत्रालय इस पूरक प्रतिवेदन पर गंभीरता से विचार करते हुए भविष्य में डेटा सुरक्षा को मजबूत करने और चोरी हुए डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगा।

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