निकाह अवैध या शून्य होने पर भी वयस्क जोड़े को आर्टिकल 21 के तहत सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सबसे ऊंचे पायदान पर है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी वयस्क जोड़े का निकाह/शादी अवैध या शून्य भी हो, या दोनों के बीच विवाह का अस्तित्व ही न हो, तब भी उनके इस संवैधानिक अधिकार की हर हाल में सुरक्षा की जानी चाहिए।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने सुरक्षा की मांग करने वाले एक बालिक जोड़े की याचिका स्वीकार करते हुए पुलिस को उनके शांतिपूर्ण जीवन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न होने देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने दृढ़ता से कहा कि चूंकि दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं, इसलिए वे अपनी मर्जी से साथ रहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं और शादी की वैधता पर विवाद होने के बावजूद राज्य उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता उनके साथी ने हाईकोर्ट का रुख कर अपने जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सुरक्षा की मांग की थी। उनका कहना था कि वे दोनों बालिग हैं और उन्होंने अपनी स्वतंत्र मर्जी से निकाह किया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि लड़की के पिता (प्रतिवादी संख्या 3) उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं और उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में बाधा डाल रहे हैं।

अपनी उम्र साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने शैक्षणिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए। हाईस्कूल परीक्षा प्रमाण पत्र के अनुसार, पहली याचिकाकर्ता (लड़की) की जन्मतिथि 22 अक्टूबर 2003 है और वह बी.एससी. द्वितीय वर्ष की नियमित छात्रा थी। वहीं दूसरे याचिकाकर्ता (लड़के) की जन्मतिथि शैक्षणिक प्रमाण पत्र के अनुसार 3 मई 1999 है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ‘इंडियन मेजॉरिटी एक्ट’ के तहत बालिग होने के कारण वे अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हैं। उन्होंने अपनी याचिका के साथ निकाहनामे की प्रति संलग्न की थी और यह भी बताया कि उन्होंने अपनी शादी के ऑनलाइन पंजीकरण के लिए आवेदन किया हुआ है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से: याचिकाकर्ताओं के वकील श्री संजय सिंह ने दलील दी कि दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं और कानूनन अपनी मर्जी से निकाह करने के हकदार हैं। उनका निकाह 24 अप्रैल 2024 (कुछ रिकॉर्ड में 24 अप्रैल 2025 भी उल्लेखित है) को संपन्न हुआ था और उनका निकाहनामा पूरी तरह वैध और वास्तविक है।

इस आपत्ति पर कि निकाह के समय लड़की भारत में मौजूद नहीं थी, याचिकाकर्ताओं के वकील ने स्पष्ट किया कि यह निकाह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संपन्न हुआ था। लड़की ने दुबई से वीडियो कॉल पर निकाह को स्वीकार किया था और भारत वापस आने के बाद निकाहनामे पर अपने हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने तर्क दिया कि मुस्लिम कानून में निकाह के समय व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है।

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प्रतिवादियों की ओर से: दूसरी ओर, लड़की के पिता (प्रतिवादी संख्या 3) के वकील और राज्य सरकार के अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री अश्वनी कुमार त्रिपाठी ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह निकाह पूरी तरह अमान्य है।

विपक्षियों ने पासपोर्ट की प्रति प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि कथित निकाह की तारीख पर लड़की भारत से बाहर थी और वह 23 जनवरी 2025 से 21 मई 2025 तक दुबई में रह रही थी। उन्होंने कहा कि काजी और गवाहों ने भी यह स्वीकार किया है कि निकाह के समय लड़की दुबई में थी। हालांकि रामपुर के जिलाधिकारी की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया कि वीडियो में लड़की दिखाई दे रही थी, परंतु उस वीडियो की प्रामाणिकता सत्यापित नहीं थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण: निकाह की वैधता से इतर व्यक्तिगत स्वतंत्रता

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सिदरा परवीन स्वयं कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुईं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वह बालिग हैं, उन्होंने दुबई में रहते हुए वीडियो कॉल के जरिए निकाह स्वीकार किया था और भारत लौटने पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने कोर्ट में अपनी जान को पिता से खतरा होने की आशंका भी जताई।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि कोर्ट इस स्तर पर निकाहनामे की वैधता या उसकी प्रामाणिकता की जांच नहीं कर रहा है, क्योंकि मुख्य मुद्दा याचिकाकर्ताओं के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा:

“निश्चित रूप से, दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और अपनी मर्जी से काम करने तथा अपने कृत्यों के लिए जिम्मेदार होने के पात्र हैं, इसलिए प्रतिवादी संख्या 3 उनके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, भले ही उन्होंने वैध निकाह न किया हो या वे लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रह रहे हों।”

आर्टिकल 21 की सर्वोच्चता को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“मुझे यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत संवैधानिक मौलिक अधिकार कहीं ऊंचे पायदान पर है। संवैधानिक ढांचे के तहत पवित्र होने के कारण इसकी सुरक्षा की जानी चाहिए, चाहे शादी/निकाह अवैध या शून्य हो या दोनों पक्षों के बीच किसी भी तरह की शादी न हुई हो।”

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संदिग्ध दस्तावेजों के दावों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“केवल यह तथ्य कि निकाहनामा एक संदिग्ध दस्तावेज प्रतीत होता है, याचिकाकर्ताओं को भारत के नागरिक होने के नाते संविधान में परिकल्पित उनके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं करेगा।”

पूर्व के ऐतिहासिक फैसलों का संदर्भ

अपने इस दृष्टिकोण के समर्थन में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया:

  1. शाफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. (2018) 16 SCC 368: कोर्ट ने उल्लेख किया कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करना आर्टिकल 21 का अभिन्न अंग है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत किया:
    “एक वयस्क की पसंद को स्वीकार न करना सीधे तौर पर एक संवैधानिक न्यायालय द्वारा संवैधानिक अधिकार को बाधित करने जैसा होगा, जिसका मुख्य कार्य मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है… सामाजिक मूल्यों और नैतिकता का अपना स्थान है, लेकिन वे संवैधानिक रूप से गारंटीकृत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हैं।” कोर्ट ने इसी मामले में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की टिप्पणी को भी उद्धृत किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पसंद का जीवनसाथी चुनना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सार है और इसमें राज्य या कानून हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
  2. उम्मु सबीना बनाम केरल राज्य (2011) 10 SCC 781: इस मामले के जरिए कोर्ट ने रेखांकित किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) जैसी रिट के माध्यम से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना न्यायाधीशों का प्राथमिक कर्तव्य है।
  3. सोनी गेरी बनाम गेरी डगलस (2018) 2 SCC 197: वयस्कों के अधिकारों पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण को उद्धृत किया:
    “एक बालिग होने के नाते वह अपनी पसंद और स्वतंत्रता का आनंद लेने की हकदार है। कोर्ट को मां की किसी भावना या पिता के अहंकार से प्रभावित होकर ‘सुपर गार्जियन’ (super guardian) की भूमिका में नहीं आ जाना चाहिए।”
  4. शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) 7 SCC 192: ‘ऑनर किलिंग’ जैसी कुप्रथा की निंदा करते हुए सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को उद्धृत किया गया:
    “व्यक्ति की पसंद उसकी गरिमा का अभिन्न हिस्सा है। यदि अपनी पसंद व्यक्त करने के अधिकार में बाधा डाली जाती है, तो गरिमा की कल्पना करना बेहद कठिन होगा… जब दो वयस्क अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो वे अपना रास्ता खुद चुनते हैं और उनके इस अधिकार का हनन एक संवैधानिक उल्लंघन है।”
  5. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) 10 SCC 1: निजता के अधिकार को गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का अभिन्न हिस्सा मानने के संबंध में उद्धृत किया गया।
  6. कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): व्यक्तिगत स्वायत्तता के अंतर्गत अपनी पसंद के साथी से प्यार करने और उसके साथ रहने के अधिकार को दोहराया गया।
  7. लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) और भगवान दास बनाम राज्य (2011): इन मामलों के जरिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए थे कि वे अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले बालिग जोड़ों को किसी भी प्रकार की हिंसा या प्रताड़ना से बचाएं।
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कोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि दोनों याचिकाकर्ता एक साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं और कोई भी व्यक्ति उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

कोर्ट ने आदेश दिया:

“यदि याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण जीवन में कोई भी बाधा उत्पन्न की जाती है, तो वे संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस अधीक्षक (SP) से संपर्क कर सकते हैं, जो मामले की जांच कर उन्हें तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे।”

इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि किसी भी ऐसे निर्दोष व्यक्ति को परेशान न किया जाए जिसने याचिकाकर्ताओं के जीवन में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं किया है।

हालांकि, कोर्ट ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि इस आदेश के जरिए उसने याचिकाकर्ताओं की शादी की वैधता, निकाहनामे की सच्चाई या उनकी सही उम्र पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सुरक्षात्मक आदेश याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कानून के अनुसार शुरू की गई किसी भी अन्य जांच या कानूनी कार्यवाही में बाधा नहीं बनेगा।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: श्रीमती सिदरा परवीन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या 42672 वर्ष 2025
  • पीठ: जस्टिस विवेक कुमार सिंह
  • दिनांक: 14 मई, 2026

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