सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अरावली पहाड़ियों में खनन (माइनिंग) गतिविधियों को लेकर बेहद कड़ी रुख अपनाया है। कोर्ट ने खनन पट्टा धारकों को किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि पहाड़ियों से मिल रहा फीडबैक ‘काफी परेशान करने वाला’ (Quite Disturbing) है, जिसके चलते अदालत फिलहाल कोई भी रियायत देने के पक्ष में नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक वह पारिस्थितिक तंत्र (ecology) की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाती, तब तक किसी भी तरह की गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट “इन रे: अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा” (In Re: Definition of Aravalli hills and ranges) नामक एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रहा था। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, “वहां बहुत कुछ हो रहा है। हमें जो जानकारी मिल रही है वह विचलित करने वाली है। हम इस मामले की टुकड़ों में सुनवाई नहीं करेंगे।”
जब खनन से जुड़े वकीलों ने राहत की मांग की, तो पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यदि किसी का खनन पट्टा रद्द किया जाता है, तो संबंधित पक्ष उसे अलग से चुनौती दे सकता है, लेकिन कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई सामान्य अनुकूल आदेश जारी नहीं करेगा।
अरावली पहाड़ियों का विस्तार दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक है। मुख्य विवाद इस बात पर है कि कानूनी तौर पर ‘पहाड़ी’ और ‘रेंज’ किसे माना जाए। इसी परिभाषा पर तय होता है कि किस क्षेत्र को सुरक्षा मिलेगी और कहां खनन हो सकेगा।
- 20 नवंबर 2025: कोर्ट ने एक परिभाषा स्वीकार की थी, जिसमें 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों और उनके बीच 500 मीटर से कम के अंतर को ‘रेंज’ माना गया था।
- 29 दिसंबर 2025: पर्यावरणविदों के विरोध के बाद इस परिभाषा को स्थगित (Abeyance) कर दिया गया। विशेषज्ञों का तर्क है कि इस संकरी परिभाषा से अरावली का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा।
- वर्तमान स्थिति: कोर्ट ने कहा है कि परिभाषा में “गंभीर अस्पष्टताओं” को दूर करने की जरूरत है ताकि भविष्य में कोई कानूनी खामी न रहे।
अदालत ने पर्यावरण मंत्रालय और अन्य हितधारकों से विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है। यह नया पैनल अरावली की एक वैज्ञानिक और सटीक परिभाषा तैयार करेगा।
तब तक, सुप्रीम कोर्ट का 9 मई 2024 का आदेश लागू रहेगा। इसके अनुसार, अगस्त 2010 की फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) रिपोर्ट में परिभाषित अरावली क्षेत्र में बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के कोई भी खनन गतिविधि नहीं की जा सकेगी।
अदालत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया की इस सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को और नुकसान न पहुंचे, क्योंकि यह क्षेत्र रेगिस्तान को रोकने के लिए भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक दीवार है।

