मुख्य अभियुक्त के साथ केवल उपस्थिति धारा 34 IPC के तहत दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं, ‘समान इरादे’ का सबूत अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1987 के एक दोहरे हत्याकांड में अभियुक्त करन सिंह की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 34 (समान इरादा) के तहत सजा के लिए अभियोजन पक्ष को “मस्तिष्क का पूर्व मिलन” (prior meeting of minds) या “पूर्व-नियोजित योजना” साबित करना आवश्यक है, जो इस मामले में नदारद था।

हाईकोर्ट ने पाया कि करन सिंह, जो मुख्य अभियुक्त का “हेल्पर” था, की हत्याओं में कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी और घटनास्थल पर उसकी उपस्थिति “अत्यधिक संदिग्ध” थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 14 जून 1987 को रामपुर जिले में हुई एक घटना से संबंधित है। लिखित रिपोर्ट (प्रदर्श का-1) के अनुसार, मृतक रोहताश सिंह और उनके भाई हवाई सिंह उर्फ हरि सिंह के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि हवाई सिंह अपनी बंदूक लेकर आया और करन सिंह के साथ मिलकर छत पर मौजूद रोहताश और उनकी पत्नी अंचली देवी पर गोलियां चला दीं।

अभियोजन पक्ष का दावा था कि गोलियां लगने के बाद दोनों अभियुक्त छत पर गए, जहां हवाई सिंह ने दोबारा फायरिंग की। यह भी आरोप लगाया गया कि करन सिंह ने अंचली देवी के शव को घसीटकर हवाई सिंह के घर पहुँचाया। ट्रायल कोर्ट ने 9 जून 1988 को दोनों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे करन सिंह ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील: अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि करन सिंह को केवल मुख्य अभियुक्त का सहायक होने के कारण फंसाया गया है। घटना के समय उसके पास कोई हथियार नहीं था, न ही उसने कोई अभद्र भाषा का प्रयोग किया या उकसाया। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट उस दावे का खंडन करती है जिसमें कहा गया था कि अभियुक्त ने शव को घसीटा था।

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राज्य सरकार के वकील: सरकारी वकील (A.G.A.) ने दलील दी कि अभियुक्त घटना की शुरुआत से अंत तक मुख्य आरोपी के साथ मौजूद था, जो उसके ‘समान इरादे’ को दर्शाता है। शव को हटाने में मदद करना ही उसे धारा 34 के तहत दोषी मानने के लिए पर्याप्त है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने चश्मदीद गवाहों चरण सिंह (PW-1) और कुमारी भागो देवी (PW-2) के बयानों का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने नोट किया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार भी करन सिंह के पास कोई हथियार नहीं था और न ही उसने गोली चलाई थी।

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मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास: खंडपीठ ने मौखिक गवाही और मेडिकल साक्ष्यों के बीच बड़े अंतर को रेखांकित किया। डॉ. ए.के. गर्ग (PW-7) ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बताया कि यदि शव को सीढ़ियों से घसीटा जाता, तो शरीर पर रगड़ या खरोंच के निशान अनिवार्य रूप से होते। हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:

“मृतक अंचली देवी के शरीर पर ऐसी कोई चोट नहीं मिली जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि करन सिंह ने शव को घसीटा था। इस बिंदु पर मौखिक और मेडिकल साक्ष्यों में गंभीर अंतर है, जो घटनास्थल पर अपीलकर्ता की उपस्थिति को अत्यधिक संदिग्ध बनाता है।”

धारा 34 IPC की व्याख्या: कोर्ट ने जोर दिया कि धारा 34 के तहत दोषसिद्धि के लिए ‘पूर्व-नियोजित योजना’ साबित होनी चाहिए। ‘कृष्णा गोविंद पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1963)’ और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘कांस्टेबल 907 सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2025)’ में दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“अब यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि धारा 34 की मदद से अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन को मस्तिष्क के पूर्व मिलन को स्थापित करना चाहिए। यह साबित होना चाहिए कि सभी अभियुक्तों ने योजना बनाई थी और मुख्य अभियुक्त के साथ अपराध करने का समान इरादा साझा किया था।”

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कोर्ट का निर्णय

साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए करन सिंह को बरी कर दिया।

“ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में आकलन नहीं किया और धारा 34 के कानूनी तत्वों को नजरअंदाज किया। अपीलकर्ता को धारा 302/34, 307/34 और 449 IPC के आरोपों से दोषमुक्त किया जाता है।”

हाईकोर्ट ने 9 जून 1988 के आदेश को रद्द कर दिया और अभियुक्त के बेल बांड डिस्चार्ज करने के निर्देश दिए।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: करन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1417 ऑफ 1988
  • बेंच: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
  • तारीख: 13.05.2026

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