गुवाहाटी ने उत्तरी कछार (NC) हिल्स स्वायत्त परिषद को एक बड़ा कानूनी झटका देते हुए उसके 2017 के दलबदल विरोधी कानून को ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिषद के पास इस तरह का कानून बनाने का कोई कानूनी अधिकार या क्षमता नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने 7 मई को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने NC हिल्स स्वायत्त परिषद (42वां संशोधन) अधिनियम, 2017 की धारा 18A को अमान्य घोषित कर दिया है।
यह कानूनी चुनौती दीमा हसाओ जिले के कुछ निवासियों द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने परिषद की उस शक्ति पर सवाल उठाया था जिसके तहत वह दलबदल के आधार पर अपने सदस्यों को अयोग्य घोषित कर सकती थी। विवादित नियम 18A के तहत, यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता था या परिषद के भीतर पार्टी के ‘व्हिप’ (निर्देश) के खिलाफ मतदान करता था, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती थी।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि NC हिल्स स्वायत्त परिषद कोई पूर्ण विधायी संस्था (Plenary Legislative Body) नहीं है। हालांकि संविधान की छठी अनुसूची परिषद को जनजातीय क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए विशेष शक्तियां प्रदान करती है, लेकिन अदालत ने माना कि दलबदल विरोधी कानून बनाना इस दायरे से पूरी तरह बाहर है।
बेंच ने टिप्पणी की, “नियम 18A मूल रूप से एक दलबदल विरोधी कानून है, जो छठी अनुसूची के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।” अदालत ने आगे जोर देकर कहा कि दलबदल से जुड़े मामलों के लिए संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ पहले से ही एक पूर्ण कोड के रूप में मौजूद है, और परिषद का यह प्रयास उस संवैधानिक ढांचे का उल्लंघन है।
सरकार, परिषद और याचिकाकर्ताओं के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“NC हिल्स स्वायत्त परिषद (42वां संशोधन) अधिनियम, 2017 द्वारा पेश किया गया नियम 18A अवैध और शून्य घोषित किया जाता है। परिषद के पास दलबदल जैसे विषय पर कानून बनाने की कोई क्षमता नहीं है।”
इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही, परिषद के पास अब अपने सदस्यों को पार्टी बदलने या व्हिप उल्लंघन के आधार पर अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं रह गया है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि ऐसे विधायी अधिकार केवल उच्च संवैधानिक निकायों के पास ही सुरक्षित हैं।

