सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि केनरा बैंक अधिकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) विनियम, 1976 का विनियमन 10 ‘निर्देशात्मक’ (directory) प्रकृति का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक ही मामले में एक से अधिक कर्मचारी शामिल हों, तो बैंक प्रबंधन के पास यह तय करने का विवेकाधिकार है कि उनके खिलाफ संयुक्त जांच (common proceeding) की जाए या स्वतंत्र अनुशासनात्मक कार्यवाही। हालांकि, कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें संयुक्त कार्यवाही को अनिवार्य माना गया था, लेकिन साक्ष्यों के अभाव और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर एक मृत वरिष्ठ प्रबंधक के खिलाफ सजा के आदेश को रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद केनरा बैंक द्वारा दायर एक अपील से उत्पन्न हुआ, जो कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थी जिसमें प्रेम लता उप्पल (अब मृत, कानूनी वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व) को दी गई सजा को रद्द कर दिया गया था। उप्पल, जो नई दिल्ली में बैंक की डिप्लोमैटिक एनक्लेव शाखा में वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में कार्यरत थीं, उन्हें 2006 में अनुशासनात्मक कार्यवाही के बाद SMG स्केल-IV से MMG स्केल-III में पदावनत (demote) कर दिया गया था। यह कार्रवाई ‘मैसर्स अमन ट्रेडिंग कंपनी’ और ‘मैसर्स क्रिएटिव ट्रेडिंग कंपनी’ को ऋण स्वीकृत करने में कथित लापरवाही और मिलीभगत के कारण की गई थी।
बैंक ने आरोप लगाया था कि उप्पल ने ऋण लेने वाली फर्मों के अस्तित्व की पुष्टि नहीं की और सुरक्षा के रूप में दी गई संपत्तियों के स्वामित्व की जांच में कोताही बरती। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 2013 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन बाद में एक डिवीजन बेंच ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए सजा के आदेश को रद्द कर दिया और विनियमन 10 को अनिवार्य माना था।
पक्षों के तर्क
केनरा बैंक (अपीलकर्ता): बैंक की ओर से तर्क दिया गया कि डिवीजन बेंच ने साक्ष्यों की फिर से समीक्षा (re-appreciation of evidence) करके न्यायिक समीक्षा के स्थापित दायरे का उल्लंघन किया है। विनियमन 10 की व्याख्या पर बैंक ने कहा कि ‘May’ शब्द का प्रयोग प्रबंधन को लचीलापन प्रदान करने के लिए किया गया है, ताकि विभिन्न पदों और जिम्मेदारियों वाले कर्मचारियों के मामलों को परिस्थितियों के अनुसार निपटाया जा सके।
उत्तरदाता (प्रेम लता उप्पल के कानूनी वारिस): उत्तरदाताओं ने दलील दी कि पूरी जांच प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ थी। उन्होंने तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने उन अधिकारियों के प्रारंभिक बयानों पर भरोसा किया जिन्हें मुख्य जांच के दौरान गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया गया था। इस कारण उप्पल को उनसे जिरह (cross-examine) करने का मौका नहीं मिला। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा नहीं की, बल्कि केवल यह पहचाना कि आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने अनुशासनात्मक मामलों में न्यायिक समीक्षा के दायरे और विनियमन 10 की भाषाई व्याख्या की जांच की।
जांच की गुणवत्ता पर: कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने उन गवाहों (MW2 और MW3) के बयानों को आधार बनाया जो केवल प्रारंभिक जांच के दौरान दर्ज किए गए थे। चूंकि इन व्यक्तियों को विभागीय जांच में गवाह के रूप में नहीं बुलाया गया, इसलिए उनके बयानों को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“जांच अधिकारी के निष्कर्ष साक्ष्यों के अभाव (want of a semblance of evidence) के कारण त्रुटिपूर्ण थे… मेरिट के आधार पर हाईकोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों में कानून की स्थापित स्थिति से कोई विचलन नहीं है।”
विनियमन 10 और ‘May’ बनाम ‘Shall’ की व्याख्या: कोर्ट ने ‘May’ शब्द के अर्थ पर स्पष्टता प्रदान करते हुए कहा:
“जब तक अंग्रेजी भाषा अपना अर्थ बरकरार रखती है, तब तक ‘May’ को ‘Must’ के रूप में नहीं समझा जा सकता… सक्षम शब्दों को केवल तभी अनिवार्य माना जाता है जब उस प्राधिकरण का उद्देश्य किसी कानूनी अधिकार को प्रभावी बनाना हो।”
बेंच ने फैसला सुनाया कि विनियमन 10 किसी आरोपी अधिकारी को संयुक्त जांच की मांग करने का अधिकार नहीं देता है। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के टी. बाबा प्रसाद बनाम आंध्र बैंक मामले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हमारे विचार में, 1976 के नियमों के विनियमन 10 में ‘May’ शब्द हर दृष्टिकोण से निर्देशात्मक (directory) है। इसे अनिवार्य (mandatory) मानने से नियोक्ता के पास उपलब्ध विवेकाधिकार समाप्त हो जाएगा।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस हिस्से को रद्द कर दिया जिसमें विनियमन 10 को अनिवार्य बताया गया था। हालांकि, मामले के तथ्यों और साक्ष्यों की कमी को देखते हुए, कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश की पुष्टि की जिसमें उप्पल की सजा को रद्द कर दिया गया था।
कोर्ट ने केनरा बैंक को निर्देश दिया है कि वह इस फैसले के आलोक में मृत उत्तरदाता के खातों का निपटान छह सप्ताह के भीतर पूरा करे।
केस विवरण:
- केस टाइटल: केनरा बैंक बनाम प्रेम लता उप्पल (मृत) कानूनी वारिसों के माध्यम से
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या [X] ऑफ 2026 (@SLP (C) No. 10226 of 2023)
- बेंच: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस विजय बिश्नोई
- तारीख: 12 मई, 2026

