मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 148 के तहत मुआवजे की 20% राशि जमा करने की शर्त कोई अनिवार्य नियम नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि असाधारण मामलों में इस राशि को कम किया जा सकता है या पूरी तरह से छूट भी दी जा सकती है, बशर्ते अपीलीय अदालत इसके लिए ठोस कारण बताए। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने कन्याकुमारी के प्रधान सत्र न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें 20% राशि जमा करने की शर्त लगाई गई थी और मामले को दोबारा विचार के लिए भेज दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता शाजिन के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर II, कुझिथुरै में धारा 138 (चेक बाउंस) के तहत मामला (STC No.142 of 2018) दर्ज था। 2 दिसंबर, 2025 को ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दोषी करार देते हुए छह महीने की साधारण कैद और 3,00,000 रुपये का मुआवजा देने की सजा सुनाई थी। मुआवजा न देने पर एक महीने की अतिरिक्त कैद का भी प्रावधान था।
इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने प्रधान सत्र न्यायाधीश, कन्याकुमारी के समक्ष अपील (C.A.No.35 of 2026) दायर की और सजा के निलंबन (Suspension of Sentence) के लिए आवेदन किया। 16 अप्रैल, 2026 को निचली अपीलीय अदालत ने सजा तो निलंबित कर दी, लेकिन शर्त रखी कि याचिकाकर्ता को मुआवजे का 20% यानी 60,000 रुपये जमा करने होंगे। याचिकाकर्ता ने इसी शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि निचली अपीलीय अदालत ने मामले के तथ्यों पर गौर किए बिना “यांत्रिक तरीके से” 20% राशि जमा करने की शर्त थोप दी। कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता ने पहले ही दिवालियापन याचिका (Insolvency Petition) दायर कर रखी थी। आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता को इस बारे में पता होने के बावजूद उसने चेक का दुरुपयोग किया। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किए बिना ही जमा राशि का आदेश दे दिया गया।
प्रतिवादी की ओर से कोई भी अदालत में पेश नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मदुरै बेंच की जस्टिस एस. श्रीमती ने NI एक्ट की धारा 148 के प्रावधानों की समीक्षा की। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘जम्बू भंडारी बनाम मप्र स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य [2023 (3) MWN (Cr.) DCC 104 (SC)]’ मामले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि:
“मुआवजे की राशि का 20% जमा करना कोई पूर्ण नियम (Absolute Rule) नहीं है। असाधारण मामलों में कारण बताते हुए इसे कम किया जा सकता है या इससे छूट दी जा सकती है।”
हाईकोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के ‘बैजू बनाम केरल राज्य’ मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि 20% राशि जमा करने का निर्देश देते समय अदालत को ठोस कारण बताने चाहिए।
जस्टिस श्रीमती ने टिप्पणी की कि ऐसी शर्त लगाते समय “विवेक का इस्तेमाल” (Application of Mind) करना आवश्यक है। यदि आरोपी राशि कम करने या छूट देने का कोई आधार प्रस्तुत करता है, तो अपीलीय अदालत को सजा निलंबित करने या जमानत देने से पहले उस पर विचार करना चाहिए।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने निचली अपीलीय अदालत के सामने छूट के लिए उचित आधार रखा था, जिस पर कोई तर्कसंगत आदेश पारित नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने कहा:
“निचली अपीलीय अदालत को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए इस आधार पर अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था और एक तर्कपूर्ण आदेश देना चाहिए था। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।”
हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए मामले को वापस प्रधान सत्र न्यायाधीश, कन्याकुमारी को भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई छूट के मुद्दे पर चार सप्ताह के भीतर दोबारा विचार किया जाए और मेरिट के आधार पर आदेश पारित किया जाए।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: शाजिन बनाम गोपालधस
- केस संख्या: CRL OP(MD).No.9164 of 2026
- पीठ: जस्टिस एस. श्रीमती
- दिनांक: 07.05.2026

