बच्चों की शिक्षा और धार्मिक संस्थानों की निगरानी पर सुप्रीम कोर्ट का रुख: याचिकाकर्ता को केंद्र के पास जाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण और निगरानी की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को भारत सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने इस तरह के मामलों में कार्यपालिका की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि सरकार को इस मुद्दे की समीक्षा करने का अवसर मिलने से पहले न्यायिक हस्तक्षेप में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा एडवोकेट अश्वानी दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में विशेष रूप से सीमावर्ती जिलों में बिना पंजीकरण के चल रहे संस्थानों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि निगरानी की कमी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। याचिका में कहा गया कि कम उम्र के बच्चे काफी “भोले-भाले” होते हैं और बिना किसी नियमन के चल रहे इन संस्थानों में उनका “ब्रेनवाश” या शोषण किया जा सकता है।

उपाध्याय ने दावा किया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया, जहां कथित तौर पर कई ऐसे संस्थान संचालित पाए गए जिनके पास न तो कोई मान्यता है और न ही उन पर सरकार का कोई नियंत्रण है।

याचिका का एक प्रमुख कानूनी पहलू संविधान के अनुच्छेद 30 की व्याख्या से जुड़ा था, जो अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार देता है। याचिका में मांग की गई कि कोर्ट यह घोषित करे कि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों के अलावा कोई “अतिरिक्त अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार” नहीं देता है।

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याचिका में कोर्ट से अपील की गई कि वह राज्य को इन संस्थानों की निगरानी और पंजीकरण के लिए निर्देश दे, ताकि निम्नलिखित संवैधानिक प्रावधानों का पालन हो सके:

  • अनुच्छेद 21A: मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
  • अनुच्छेद 39(f): बच्चों को स्वस्थ तरीके से विकसित होने के अवसर सुनिश्चित करना।
  • अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का प्रावधान।
  • अनुच्छेद 51-A(k): माता-पिता का यह मौलिक कर्तव्य कि वे बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें।
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सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने तत्काल न्यायिक दिशा-निर्देशों के लिए दबाव डाला, तो बेंच ने न्यायिक दायरे की सीमाओं पर अपनी टिप्पणी की।

बेंच ने कहा, “आप ऐसी बेंच के सामने हैं जिसके जज बहुत ही रूढ़िवादी और पारंपरिक हैं। हम जल्दबाजी नहीं करते।” शक्तियों के पृथक्करण के महत्व को रेखांकित करते हुए जजों ने आगे कहा, “न्याय एकतरफा रास्ता नहीं है। इसमें कार्यपालिका की भी भूमिका होती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार (प्रतिवादी संख्या 1) को निर्देश दिया कि वह 4 फरवरी, 2026 को उपाध्याय द्वारा दिए गए प्रतिवेदन की जांच करे।

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कोर्ट ने आदेश दिया, “हम इस रिट याचिका को प्रतिवादी संख्या 1 (केंद्र) को यह निर्देश देते हुए निपटाते हैं कि वह याचिकाकर्ता के 4 फरवरी, 2026 के प्रतिवेदन पर विचार करे और उस पर उचित निर्णय ले। जो भी निर्णय लिया जाएगा, उससे याचिकाकर्ता को अवगत कराया जाए।”

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