गंभीर अपराधों में केवल जांच के दौरान गिरफ्तारी न होना अग्रिम जमानत का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

बच्चों की तस्करी को समाज पर गंभीर प्रभाव डालने वाला अपराध बताते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने ढाई महीने के बच्चे की अवैध बिक्री में शामिल एक नर्सिंग ऑफिसर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट किया कि भले ही आरोपी को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया था, लेकिन जमानत की याचिका पर फैसला मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शास्त्री पार्क पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 24/2025 से संबंधित है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2), 143(4), 143(7), 61, 3(5) और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 81 के तहत आरोप लगाए गए हैं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 4 जून 2025 को सीलमपुर मेट्रो स्टेशन के पास रहने वाली एक महिला का ढाई महीने का बेटा चोरी हो गया था। आरोप है कि सह-आरोपी देवकी ने बच्चे का अपहरण किया और उसे बेचने के लिए मांडवली स्थित एक मैटरनिटी सेंटर की नर्सिंग ऑफिसर शर्ली जॉन (आवेदक) से संपर्क किया। आरोप है कि शर्ली जॉन ने अपनी घरेलू सहायिका शीला के माध्यम से बच्चे को धीर सिंह और बनीता नामक दंपत्ति को ₹1.5 लाख में बेचने का सौदा कराया। 24 नवंबर 2025 को पुलिस ने बच्चे को उक्त दंपत्ति के पास से बरामद किया।

पक्षों की दलीलें

शर्ली जॉन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि वह एक लोक सेवक है और जांच में पूरा सहयोग करती रही है। पुलिस ने जांच के दौरान उसे गिरफ्तार नहीं किया था क्योंकि उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था। वकील ने यह भी कहा कि न तो बच्चा उसके पास से मिला और न ही उसके पास से कोई पैसा बरामद हुआ है।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से पेश एपीपी (APP) ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि शर्ली जॉन एक नर्सिंग ऑफिसर होने के नाते गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया से भली-भांति परिचित थी, फिर भी उसने अवैध तरीके से बच्चे की बिक्री में सक्रिय भूमिका निभाई। अभियोजन ने साक्ष्य के रूप में उन तस्वीरों का हवाला दिया जो कथित तौर पर शर्ली जॉन के अस्पताल स्थित कार्यालय के अंदर ली गई थीं, जिनमें बच्चे को सौंपते हुए दिखाया गया है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण: गिरफ्तारी न होना और जमानत के गुण-दोष

कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि जांच के दौरान गिरफ्तारी न होने से आरोपी स्वतः ही जमानत का हकदार हो जाता है। सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) मामले का संदर्भ देते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा:

“शुरुआत में, हालांकि इस तथ्य पर विवाद नहीं है कि वर्तमान आवेदक शर्ली जॉन को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया था, फिर भी चार्जशीट दाखिल होने के बाद जमानत की प्रार्थना पर जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री के आलोक में इसके गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाना आवश्यक है… क्योंकि वर्तमान मामले में कथित अपराध सात साल से अधिक कारावास से दंडनीय हैं।”

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कोर्ट ने पाया कि परिस्थितियों की कड़ियां पूरी तरह से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। अस्पताल के प्रभारी के बयान ने भी पुष्टि की कि बच्चे को सौंपने वाली तस्वीरें शर्ली जॉन के ही केबिन की हैं।

बाल तस्करी पर कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस शर्मा ने बाल तस्करी की गंभीरता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट के पिंकी बनाम राज्य (2025 INSC 482) मामले का उल्लेख किया:

“यह अदालत माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उन अवलोकनों को नजरअंदाज नहीं कर सकती… जिसमें यह कहा गया था कि बच्चों की तस्करी और अवैध बिक्री से संबंधित अपराध गंभीर सामाजिक प्रभाव वाले अपराध हैं और जमानत की याचिका पर विचार करते समय इन्हें पूरी गंभीरता के साथ देखा जाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने माना कि एक लोक सेवक द्वारा अपने पद और कार्यालय का उपयोग अवैध गतिविधियों के लिए करना एक गंभीर चिंता का विषय है।

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अदालत का निर्णय

आरोपों की प्रकृति, आवेदक की पेशेवर भूमिका और एफएसएल (FSL) रिपोर्ट के लंबित होने को देखते हुए, हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने शर्ली जॉन को सात दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

मामले का विवरण

केस टाइटल: शर्ली जॉन बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली)

केस नंबर: बीएआईएल अप्लन. 1671/2026 और सीआरएल.एम.ए. 13447/2026

पीठ: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

दिनांक: 07 मई, 2026

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