40 साल बाद न्याय: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 के उन्नाव हत्या मामले में बरी किए जाने का फैसला पलटा, दो को दोषी ठहराया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 1986 में आए एक फैसले को पलटते हुए 1984 के एक मामले में दो व्यक्तियों को ‘गैर-इरादतन हत्या’ (दोषपूर्ण मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता) का दोषी पाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा “आत्मरक्षा” के आधार पर दिया गया फैसला पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण था, क्योंकि पानी की निकासी जैसे मामूली विवाद में किसी की जान लेना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला उन्नाव जिले के माखी थाना क्षेत्र का है, जहाँ 15 जून 1984 को एक विवाद हुआ था। घटना तब शुरू हुई जब मृतक जमुना प्रसाद अपने घर की छत पर नाली का निर्माण करा रहे थे। तुलसी राम, लक्ष्मी नारायण, जगत पाल और हरनाम नाम के चार व्यक्तियों ने इस निर्माण का विरोध किया, जिससे विवाद बढ़ गया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह कहासुनी हिंसक झड़प में बदल गई और आरोपियों ने जमुना प्रसाद और उनके भाई अमृत लाल पर लाठियों और बल्लम से हमला कर दिया। इस हमले में जमुना प्रसाद गंभीर रूप से घायल हो गए और अस्पताल ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई।

1986 में ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया था। निचली अदालत ने उनके “आत्मरक्षा” के दावे को स्वीकार कर लिया था, क्योंकि संघर्ष के दौरान आरोपियों को भी चोटें आई थीं। ट्रायल कोर्ट का मानना था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों को लगी चोटों का स्पष्टीकरण देने में विफल रहा, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि उन्होंने अपनी सुरक्षा में कदम उठाए थे।

राज्य सरकार ने 1986 के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील के लंबित रहने के दौरान चार आरोपियों में से दो की मृत्यु हो गई, जिसके बाद केवल तुलसी राम और लक्ष्मी नारायण के खिलाफ मामला आगे बढ़ा।

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने साक्ष्यों का पुनः परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने आत्मरक्षा के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि विवाद के कारण की तुलना में की गई हिंसा का पैमाना बहुत अधिक था।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष “पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण” थे। अदालत ने कहा कि पानी की निकासी जैसे छोटे मुद्दे पर सशस्त्र हमला करना, जिससे किसी की जान चली जाए, कानूनी रूप से आत्मरक्षा नहीं माना जा सकता। इसके बाद, बेंच ने आरोपों को हत्या से बदलकर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत गैर-इरादतन हत्या में संशोधित कर दिया।

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हाईकोर्ट ने राज्य की अपील स्वीकार करते हुए जीवित बचे दोनों आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों को तत्काल हिरासत में लिया जाए और सजा की अवधि (quantum of sentence) पर सुनवाई के लिए 11 मई को कोर्ट के समक्ष पेश किया जाए।

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