इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को स्वीकार करते हुए एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत को अवैध घोषित कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तारी के समय लिखित आधार (Written Grounds) उपलब्ध नहीं कराए थे। इसे माननीय सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक आदेशों का “घोर उल्लंघन” मानते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10,00,000 रुपये (दस लाख रुपये) का अनुकरणीय हर्जाना (Exemplary Cost) लगाया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को थाना असीवन, जिला उन्नाव में दर्ज मुक़दमा अपराध संख्या 244/2024 के संबंध में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी मेमो में ‘गिरफ्तारी के कारण’ वाले कॉलम में केवल मुक़दमे की अपराध संख्या दर्ज की गई थी। इसके बाद, 28 जनवरी 2026 को मजिस्ट्रेट ने आरोपी की रिमांड मंजूर कर ली। याचिकाकर्ता ने अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को हाईकोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं बताए गए, जो एक अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन है।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वकील अखिलेश कुमार त्रिपाठी और प्रशांत तिवारी पेश हुए। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य प्रतिवादियों का पक्ष सरकारी अधिवक्ता (G.A.) ने रखा।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) का हवाला दिया। कोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया गया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) राज्य पर यह “अनिवार्य और अपवादात्मक कर्तव्य” डालता है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के लिखित आधार प्रदान करे। ऐसा न करना गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड को अवैध बना देता है।
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक सिद्धांतों से असहमति नहीं जताई, लेकिन अपर मुख्य सचिव (गृह) का व्यक्तिगत हलफनामा पेश किया। हलफनामे में कहा गया कि राज्य अधिकारियों द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इसमें इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं था कि अवैध कारावास के लिए अनुकरणीय हर्जाना क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अवलोकन किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 6 नवंबर 2025 को मिहिर राजेश शाह मामले में फैसला सुनाए जाने के बाद से, अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में दिए जाएं।
हाईकोर्ट ने नोट किया:
“गिरफ्तारी के आधार… केवल मुक़दमा अपराध संख्या की ओर इशारा करते हैं… बिना यह बताए कि याचिकाकर्ता को किन आधारों पर गिरफ्तार किया जा रहा है।”
सुप्रीम कोर्ट के डॉ. राजिंदर राजन बनाम भारत संघ (2026) के फैसले का उल्लेख करते हुए बेंच ने दोहराया:
“उपरोक्त सिद्धांत से किसी भी तरह का विचलन आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने के लिए पर्याप्त है, जिससे वह तत्काल रिहा होने का हकदार हो जाता है।”
24 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट द्वारा दिए गए पिछले आदेश के बावजूद याचिकाकर्ता को जेल में रखने पर कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) के जवाब पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। हाईकोर्ट ने कहा:
“व्यक्तिगत हलफनामे में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि अनुकरणीय हर्जाना क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए। यदि गृह विभाग के सर्वोच्च अधिकारी के स्तर पर इस तरह से दिमाग का प्रयोग नहीं किया जा रहा (Non-application of mind), तो हम समझ सकते हैं कि राज्य के अन्य अधिकारी कैसे काम कर रहे हैं!!!”
हाईकोर्ट ने रिनी जोहर बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) के मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने वैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन में स्वतंत्रता में कटौती के लिए मुआवजे का आदेश दिया था।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की और मनोज कुमार की गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए 28 जनवरी 2026 के रिमांड आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि:
- याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा किया जाए, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है।
- तीन महीने से अधिक के अवैध कारावास के लिए राज्य अधिकारियों पर 10,00,000 रुपये का अनुकरणीय हर्जाना लगाया जाता है।
- राज्य सरकार को यह राशि चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को भुगतान करने का निर्देश दिया गया है, साथ ही सरकार को दोषी अधिकारियों से इस राशि की वसूली करने की छूट दी गई है।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: मनोज कुमार द्वारा पुत्र मुदित कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा प्रमुख सचिव गृह विभाग व 4 अन्य
- केस संख्या: बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 137 वर्ष 2026
- बेंच: जस्टिस अब्दुल मोईन, जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
- दिनांक: 29 अप्रैल, 2026

