22 एफआईआर वाले आरोपी को अग्रिम जमानत देना गलत; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आपराधिक इतिहास ही राहत न देने के लिए काफी

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत 22 आपराधिक मामलों (FIR) का सामना कर रहे एक आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई थी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी का व्यापक आपराधिक इतिहास अपने आप में हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत की याचिका खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शिकायतकर्ता शरद सहगल द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से शीर्ष अदालत के समक्ष आया। याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 28 जनवरी, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें प्रतिवादी संख्या 2 (मूल आरोपी) की अग्रिम जमानत अर्जी (Criminal Miscellaneous Anticipatory Bail Application No. 10864 of 2025) स्वीकार कर ली गई थी।

आरोपी के खिलाफ जिला बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाने में केस क्राइम नंबर 780/2025 दर्ज था। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग करना) के तहत दर्ज किया गया था।

दलीलें और अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि प्रतिवादी संख्या 2 को इस अपील का नोटिस बुलंदशहर जिला जेल में तामील कराया गया था, क्योंकि वह किसी अन्य अपराध के सिलसिले में न्यायिक हिरासत में है। इसके बावजूद, आरोपी ने न तो स्वयं और न ही किसी अधिवक्ता के माध्यम से अदालत में उपस्थित होकर इस अपील का विरोध करना उचित समझा।

अपीलकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि आरोपी के आपराधिक इतिहास (22 एफआईआर) की जानकारी हाईकोर्ट के समक्ष स्पष्ट रूप से रखी गई थी। इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने आरोपी के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग करते हुए उसे राहत प्रदान की।

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हाईकोर्ट के इस निर्णय पर नाखुशी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाईकोर्ट ने एक ऐसे आरोपी को अग्रिम जमानत पर रिहा करना उचित समझा, जिसके खिलाफ विभिन्न अपराधों के लिए 22 एफआईआर दर्ज हैं। आज की तारीख में भी वह किसी अपराध के सिलसिले में न्यायिक हिरासत में है।”

पीठ ने आगे जोर देते हुए कहा कि आरोपी का रिकॉर्ड ही जमानत खारिज करने का मुख्य आधार होना चाहिए था:

“प्रतिवादी संख्या 2 का आपराधिक इतिहास अपने आप में हाईकोर्ट के लिए अग्रिम जमानत से इनकार करने के लिए पर्याप्त था।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने आरोपी के रिकॉर्ड को देखते हुए उसे राहत देने में गलती की है। इसी के साथ, अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 28 जनवरी, 2026 के आदेश को रद्द कर दिया।

केस विवरण ब्लॉक:

  • केस का शीर्षक: शरद सहगल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 5309/2026 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • तारीख: 27 अप्रैल, 2026

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